अध्यात्मशून्य भौतिक विज्ञानका परिणाम मानवताका नाश

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। भौतिक विज्ञानके क्षेत्रमें मनुष्यने अवश्य ही विलक्षण प्रगति की है और वह निस्संदेह आदरणीय है, पर इस भौतिक विज्ञानसे आध्यात्मिक ज्ञान-विज्ञानपर विषम कुठाराघात हो रहा है। इसीके एक प्रत्यक्ष उदाहरण स्वयं आप हैं, जो शास्त्र, धर्म, अध्यात्म, मुक्ति आदिपर अनास्था-सी प्रकट करते हुए मानवताके गुणोंको भी अनावश्यक-सा बताने लगे हैं। आपमें इतना परिवर्तन भौतिक विज्ञानके पतनकी ओर ले जानेवाली प्रवृत्तिका जीवन्त प्रमाण है। इस भौतिक विज्ञानके साथ जो कामोपभोगपरायण आसुरमस्तिष्क काम कर रहा है, वह जगत‍्में भयानक राग-द्वेष, द्रोह-वैर, हिंसा-हत्या, अभिमान-मद, अत्यन्त सीमित ममता, ‘स्व’ की अत्यन्त संकुचित सीमा संग्राम-संहार आदि अमानवी-आसुरी-राक्षसी वातावरणका विस्तार करके मानवताका संहार कर रहा है। यह विज्ञान मानव-सेवाका नहीं, मानव-संहारका (मानव-शरीरके ही—मानव-धर्मके संहारका) साधन बन रहा है। यदि इसी प्रकार इस भौतिक आसुरी विज्ञानकी प्रगति होती रही तो मानव-जगत् मानवतारहित—पशुओं, राक्षसों, पिशाचोंसे भी नीची श्रेणीके मानव-जन्तुओंसे भरा मूर्तिमान् नरक बन जायगा। इसलिये इस विज्ञानके साथ अध्यात्मका संयोग अवश्य रहना चाहिये; वरं अध्यात्मके नियन्त्रणमें, अध्यात्मकी सेवाके लिये ही इस विज्ञानके अस्तित्वका संरक्षण, इसका पोषण और संवर्धन होना चाहिये। आप विद्वान् हैं, बुद्धिमान् हैं, विज्ञानके भी पंडित हैं एवं अध्यात्मकी ओर भी आपकी बड़ी रुचि तथा प्रगति थी—अब भी उसके संस्कार तो बहुत हैं ही—खूब गहराईसे विचार कीजिये और अपने सिद्धान्त तथा कर्तव्यका निश्चय कीजिये। शेष भगवत्कृपा।