अनन्य श्रद्धाका स्वरूप

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला।

आपके प्रश्नोंका वास्तवमें शब्दोंसे उत्तर नहीं दिया जा सकता। किसी सच्चे अनन्य श्रद्धालु पुरुषका जीवन ही उनका उत्तर होता है, तथापि आपके आग्रहके कारण कुछ विचार नीचे प्रकट कर रहा हूँ। आप उनपर मनन कीजियेगा, यह प्रार्थना है।

श्रद्धाका तब पता लगता है, जब, जिनमें हमारी श्रद्धा हम मानते हैं, उन महानुभावका कोई कार्य हमारे मनसे सर्वथा प्रतिकूल हो रहा हो और हमारी बुद्धिके अनुसार जिससे कोई लोकहित भी न हो और न परमार्थके साधनमें ही सहायता मिलती हो। श्रद्धेय महापुरुषके इस प्रकारके विपरीत निर्णय और आचरणके समय भी हमारे मनमें श्रद्धा अक्षुण्ण बनी रहे। उनका वह कार्य हमें किसी भी प्रकारसे प्रतिकूल तो प्रतीत हो ही नहीं, बल्कि हमारा मन उनके अनुकूल उस कार्यमें योगदान करनेकी इच्छा करे।

हमलोग जिनको महात्मा या महापुरुष मानते हैं, वे यदि वास्तवमें महापुरुष या महात्मा हैं तो उनका कोई कार्य ऐसा नहीं हो सकता, जिससे किसीका परिणाममें अकल्याण हो या जो परमार्थविरोधी हो। जो त्रिगुणजनित विकारों तथा प्राकृतिक द्वन्द्वोंसे परे हैं; जो चराचर सबमें सदा अपने आत्माका अनुभव करते हैं, जो नित्य स्वस्थ (आत्मस्थ) हैं या जो चराचर अखिल विश्वमें सदा श्रीभगवान‍्का अव्यवधान दर्शन-स्पर्श प्राप्त करते हैं, उनके द्वारा सबको सहज ही वैसे ही कल्याण प्राप्त होता है, जैसे अमृतके द्वारा अमरत्व।

ऐसे संत-महापुरुष, भगवान‍्की भाँति सर्वज्ञ नहीं भी होते, तो भी, भविष्यज्ञ—कम-से-कम अपने वातावरणसे सम्बद्ध भविष्यके ज्ञाता तो अवश्य होते हैं, वे भविष्यद्रष्टा या दूरद्रष्टा होते हैं, इसलिये वे बहुत दूरकी चीजको—सुदूर भविष्यके अच्छे-बुरे परिणामको प्रत्यक्षवत् देख सकते हैं। अत: वे जो कुछ निर्णय या कार्य करेंगे, वह सर्वथा कल्याणकारक ही होगा। सम्भव है, उनका वह बाहरी कार्य—आचरण अभी हमारी समझमें न आवे या हम अपनी दृष्टिके अनुसार उसमें दया, प्रीति, समता, त्याग आदि न देखें, हमें उसमें दोष ही दिखायी दे; पर यह हमारी अज्ञानदृष्टि है, महात्माका स्वरूप नहीं। तुलसीदासजी कहते हैं—

जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाईं।

मातु चिराव कठिन की नाईं॥

जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर।

ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर॥

छोटे अज्ञान बच्चेके फोड़ेको माँ बड़ी कठोर हृदयवाली-सी बनकर किसी जर्राहसे चिरवाती है। बच्चा रोता है, माँको भला-बुरा कहता है, पर बच्चेका कल्याण चाहनेवाली माँ अथवा माँके कार्यका अर्थ समझनेवाले समझदार लोग क्या उसे बुरा मानते हैं? बल्कि वे भी माँकी सहायता करते हैं। इसी प्रकार महात्मा पुरुष कभी-कभी ‘वज्रादपि कठोर’ हो जाते हैं, पर उनका वह व्यवहार—आचरण निश्चय ही कल्याणकारी होता है; क्योंकि उनका हृदय सदा ही सहज कल्याणमय और ‘कुसुमादपि मृदु’ है। अत: उनके व्यवहारमें हर हालतमें अनुकूलता देखनेवाला ही वास्तविक श्रद्धालु है।

एक महात्माने दो भक्तोंको, जो सर्वथा निर्दोष माने जाते थे, आश्रमसे निकलवा दिया था। उन दोनोंमें एक अनन्य श्रद्धालु था, उसको तो इससे सहज आनन्दकी उपलब्धि हुई। उसने कहा—‘हमें दूर रखनेमें निश्चय ही हमारा कल्याण है; हम सर्वथा उनके अपने हैं, वे सर्वथा अपना मानते हैं; इसीसे दयापरवश होकर वे हमें दूर भेज रहे हैं। यह उनका प्रेम-पुरस्कार है।’ वह हँसता हुआ गया। दूसरेने सोचा—‘उन्होंने किया तो मेरा कल्याण ही है, जो दण्ड दिया है; परंतु मुझसे ऐसा कौन-सा अपराध हो गया, क्या दोष बन गया, जिसके कारण उन्हें ऐसा करना पड़ा।’ वह संकल्प-विकल्प करता हुआ गया।

कुछ लोगोंको महात्माजीका यह कार्य बुरा लगा, पर उसके कुछ समय बाद एक ऐसी घटना हुई, जिससे यह सिद्ध हो गया कि वे दोनों आश्रममें रहते तो उनका और आश्रमका बहुत ही नुकसान होता। उनके चले जानेसे दोनों ही इस नुकसानसे बच गये। तब लोगोंकी समझमें आया कि महात्माने उनके साथ कड़ा बर्ताव क्यों किया था?

हाँ, जो वास्तवमें महात्मा नहीं हैं, दम्भ करते हैं, वासनाओंके दास हैं, भोगासक्त तथा काम-कलुषित-चित्त हैं—ऐसे नामधारी मिथ्या महात्माकी किसी भी अनुचित बात या क्रियाका कभी समर्थन नहीं करना चाहिये। पर ‘वे महात्मा हैं या नहीं’ यह पता कैसे लगे? इसका उत्तर यह है कि जिसमें सच्ची ‘अनन्य श्रद्धा’ होती है, उसके मनमें न तो संदेह होता है, न पता लगानेकी ही कभी कल्पना होती है; क्योंकि उसकी वह ‘अनन्य श्रद्धा’ उस व्यक्तिका नित्य-निरन्तर निश्चित महात्माके रूपमें ही उसे दर्शन करवाती रहती है और उसकी उस सच्ची श्रद्धाके फलस्वरूप वह व्यक्ति दुरात्मा होनेपर भी भगवद्-विधानसे उसके लिये ‘महात्मा’ ही सिद्ध होता है। यों उसके लिये विष भी अमृत हो जाता है।

जहाँ ‘अनन्य श्रद्धा’ न होकर ‘विचारवती श्रद्धा’ होती है, वहाँ जो कार्य अपनी विवेकबुद्धिसे और शास्त्रदृष्टिसे अनुचित लगे, उसका अनुकरण तथा समर्थन तो करना ही नहीं चाहिये, वरन् आज्ञा देनेपर भी उसका पालन नहीं करना चाहिये। यह याद रखना चाहिये कि गुरुजनोंकी उस शास्त्रविपरीत दीखनेवाली आज्ञाका पालन तो करना चाहिये, जिससे परिणाममें अपनेको दु:ख-पीड़ा-संताप होनेकी सम्भावना हो, पर जिससे उनका निश्चित रूपसे हित होता हो। परन्तु जिस आज्ञाके पालनसे उन आज्ञा देनेवालोंका भी परिणाममें अहित दीखता हो, उन्हें दु:ख-पीड़ा-संताप होनेकी सम्भावना प्रतीत होती हो, उसका पालन नहीं करना चाहिये।

अतएव मेरा आपसे यही निवेदन है कि इस प्रकारके अवसरपर यदि उनके प्रति आपकी ‘अनन्य श्रद्धा’ हो तो उन महात्माके प्रत्येक कर्मको निश्चय ही कल्याणकारी समझिये और मनकी किसी भी वृत्तिसे उसका कदापि जरा भी विरोध मत कीजिये और ‘अनन्य श्रद्धा’ होनेपर आप स्वयं विरोध कर सकेंगे ही नहीं। पर यदि ऐसी श्रद्धा न हो तो आपकी विवेकबुद्धि जो कुछ भी, जैसा भी निर्णय करे, तदनुकूल, भगवान‍्की सेवाके भावसे—मनमें किसीके प्रति द्वेष न रखकर, काम कीजिये। इससे भी कोई हानि नहीं होगी, वरन् आपके क्षेत्रमें अनुकूल लाभ ही होगा। शेष भगवत्कृपा।