अपने कर्तव्यका पालन कीजिये

प्रिय बहन! सस्नेह हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपने अपने पिताके व्यवहार-बर्तावके सम्बन्धमें तथा मातासे भी प्यार न मिलनेकी बात लिखी, सो वस्तुत: बड़े दु:खकी बात है। इससे आपके मनमें घोर संताप होना स्वाभाविक ही है। पिता-माताको अपनी संतानके साथ ऐसा बर्ताव नहीं करना चाहिये। पर आप अपने कर्तव्य-पालनमें लगी हैं, यह बड़े संतोषका विषय है। जन्मसे लेकर अबतक—कभी-न-कभी चाहे बहुत लड़कपनमें ही, माता-पिताने आपके पालन-पोषण तथा पढ़ाने-लिखानेमें कुछ तो समय—मन लगाया ही होगा। आप उनके दोषोंको न देखकर उनके उन छोटे-मोटे उपकारोंको स्मरण कीजिये और भगवान‍्से प्रार्थना कीजिये कि लोक-परलोकमें उनको सद्‍बुद्धि दें और उनके अपराधोंको क्षमा करें।

मेरी समझसे विवाह करा लेना परम आवश्यक है। वह धर्म तो है ही—उससे जीवनमें एक संयमका अवसर मिलता है। अर्थकी कमीसे विवाह होनेमें कठिनता अवश्य है, पर पता लगानेपर ऐसे मध्यम स्थितिके कमाने-खानेवाले पुरुष मिल सकते हैं, जो अर्थ न चाहकर सद्‍गुणवती गृहिणी चाहते हों। आपके विवाहमें अड़चन न आती हो, आपका पहले विवाह होनेपर छोटी बहनोंके विवाहमें बाधा आती हो तो पहले उनका विवाह किया जा सकता है।

घरकी परिस्थितिके अनुसार नौकरी करना आवश्यक हो तो आपद्धर्म मानकर नौकरी करनी चाहिये, पर वह ऐसी न हो, जिसमें नैतिक पतनकी सम्भावना हो।

दो बातोंको भूल जाना और दोको याद रखना चाहिये—‘अपने द्वारा किसीका किया हुआ उपकार भूल जाय, दूसरेके द्वारा की हुई अपनी हानिको भूल जाय।’ ‘अपने द्वारा किसीको कभी हानि पहुँचायी गयी हो, उसे याद रखे, दूसरेके द्वारा कभी अपनी भलाई हुई हो, उसे याद रखे।’ शेष भगवत्कृपा।