अपनी भूलके लिये क्षमा माँगना ऊँचापन है

सम्मान्य तथा प्रिय महोदय! सादर हरिस्मरण। स्वभावदोष तथा शरीरकी अस्वस्थताके कारण उत्तर कुछ देरसे जा रहा है, कृपया क्षमा कीजियेगा। आपका दूसरा स्मृतिपत्र भी परसों मिल गया था।

आपने घटनाका जो वर्णन लिखा और उसपर ‘अपने हितकी दृष्टिसे तथा मेरे लिखनेके अनुसार ही आप करेंगे’—यह लिखते हुए मेरी संकोचरहित सम्मति चाही, यह आपका शील है। आपने मुझपर इतना विश्वास किया, इसके लिये मैं आपका कृतज्ञ हूँ। मेरी तुच्छ सम्मतिमें जो बात ठीक प्रतीत होती है, वह लिख रहा हूँ। हो सकता है—कहीं भूलसे कुछ अनुचित लिख जाऊँ, पर मुझे अपनी रायके हितकारक होनेमें संदेह नहीं है; आप इसे पूर्णरूपसे मानकर ऐसा ही करें—यह मेरा आग्रह नहीं है। आपकी शान्त विवेकबुद्धि जैसी कुछ सम्मति दे, जिसमें आपको अपना कल्याण प्रतीत हो, आप वही कीजिये।

जो किसीका अपमान-तिरस्कार करनेमें गौरव मानते हैं, गर्व करते हैं, वे तो असुर हैं, उनके दोष सहज ही मिटेंगे नहीं और उनकी निश्चित ही दुर्गति भी होगी। मनुष्यकी बुद्धि जब तमोगुणसे ढक जाती है, तब ऐसा ही होता है। आपको ‘अपनी भूल-सी भी मालूम होती है, किंचित् पश्चात्ताप भी होता है और भूल हो तो उसे मानने तथा हृदयसे आप उसका सुधार करना चाहते हैं’—यह आपकी दैवी सम्पदाका एक लक्षण है। इसीसे मैं भी आपको कुछ लिखनेका साहस कर रहा हूँ।

मेरी समझसे आपने बड़ी भूल की है। उक्त सज्जन आपके सामने बोले, उन्होंने कटु शब्द कहे—यह अवश्य उनका दोष है, पर इससे पहले आपके द्वारा प्रकारान्तरसे उनकी कुछ अवज्ञा हो चुकी थी। उन्हें स्नेहपूर्ण वचन-सुधाधारा मिलती तो वह छिपी आग बुझ जाती, उनका हृदय शीतल-शान्त हो जाता; पर आप भी आवेशमें आ गये। मनुष्य जब आवेशमें आता है, तब उसको क्रमश: सम्मोह, स्मृतिभ्रंश और बुद्धिविनाशकी स्थिति प्राप्त होती है; उस समय वह ‘सर्वनाश’ कर बैठता है। आपसे भी किसी अंशमें आवेशके कारण ऐसा ही हो गया।

आप यह जानते ही हैं कि प्राणिमात्र—खास करके मनुष्य सहज ही सम्मान चाहता है। अतएव वह किसीके द्वारा भी किया हुआ जरा-सा भी अपमान सहन नहीं कर सकता। समर्थ होता है या आवेशमें आ जाता है तो वह बदलेमें उतना ही या उससे भी अधिक अपमान कर बैठता और असमर्थ होनेपर मन-ही-मन शाप देता है। उसके हृदयमें एक जलन पैदा हो जाती है, जो अपमान करनेवालेको जलते देखकर ही प्राय: शान्त होती है। अतएव भाव तथा संकेतसे भी कभी किसीका अपमान न करे, वाणीसे तो कभी करे ही नहीं। खास करके जो अपनेसे किसी प्रकार नीचे पदपर हों, उनके लिये तो विशेष सावधानी रखे। किसी भी छोटे-से-छोटे मनुष्यका भी कभी अपमान न करे—बहुत नीचे नौकरों तथा छोटे बच्चोंका भी नहीं, पशु-पक्षीका भी नहीं। सम्मानसूचक मधुर सुधा-वाणीसे सबको अमृत देकर आप्यायित करता रहे। आपके द्वारा यह बड़ी भूल हुई कि आपने उनके भली नीयतसे किये हुए कामकी भी अभिमानवश निन्दा की, उसे न करनेका आदेश दिया और उनकी भलाई तथा नेकनीयतीका आदर न करते हुए रूखे, कड़े तथा अपमानसूचक शब्दोंका उनके प्रति प्रयोग किया। संतोंका तो यह स्वभाव होता है कि वे गाली-शाप देनेवालों तथा प्रत्यक्ष अनिष्ट करनेवालोंका भी सम्मान करते तथा उनका सहज ही हित चाहते हैं—‘मंद करत जो करइ भलाई।’ भगवान‍्ने (गीता १२।१३) में भक्तके लक्षण बतलाते हुए आरम्भमें ही कहा—वह सर्वत्र द्वेषरहित, सबसे मैत्री भावसे बर्तनेवाला, करुण-हृदय ममता तथा अहंकारसे रहित, अपने सुख-दु:खमें समबुद्धि रखनेवाला तथा क्षमावान्—‘बुरा करनेवालेका भी भला करनेवाला होता है।’ यह संत-स्वभाव न सही, कम-से-कम अपनी ओरसे तो कभी किसीका अपमान न करे। किसीका जी न दुखावे। अपमान करनेपर उसके मनमें बैठे हुए भगवान‍्को संताप होता है, उसके मनमें द्वेष उत्पन्न होता है, वह कोई अच्छा काम कर रहा हो तो उसमें बाधा आती है; वैरका बीज बोया जाता है, हिंसा-प्रतिहिंसाके पापका प्रारम्भ हो जाता है, अशान्ति पैदा होती है और दूसरेके मनके भावानुसार अपने मनमें भी वे सारे दोष आने लगते हैं। अतएव किसी भी प्रकारका अभिमान न करके सदा विनय-विनम्र रहे। मनुष्यको धनका, बुद्धिका, विद्याका, पदका, अधिकारका, ऐश्वर्यका, शक्तिका, सम्मानका, दानका, सत्कर्मका—यहाँतक कि सदाचारका, तपका, साधनका, सेवाका और त्यागतकका अभिमान हो जाता है और अभिमानके कारण उसका पतन हो जाता है—लोकदृष्टिमें भी और वास्तविक अपनी स्थितिसे भी। सुतरां, इस अभिमानसे बचे। भगवान् भी अभिमानके साथ द्वेषकी तथा दैन्यके साथ प्रेमकी लीला करते हैं—

‘ईश्वरस्याभिमानद्वेषित्वाद् दैन्यप्रियत्वाच्च।’

(नारदभक्ति-सूत्र—२७)

अतएव मेरी तुच्छ सम्मति मानें तो आप संकोच और झेंप छोड़कर सहर्ष अपनी भूल स्वीकार करते हुए उनसे क्षमा माँग लें। भविष्यमें ऐसा न करनेकी मन-ही-मन प्रतिज्ञा करें। वे एक बारमें क्षमा न करके आपसे न बोलें, रूखा बर्ताव करें, कड़े बोलें, अपमान करें तो उसे सह लें और मनमें सच्चा पश्चात्ताप करते हुए उनसे बार-बार क्षमा माँगें और क्षमा-याचनाका भी कभी अभिमान न करें। याद रखें—क्षमा-प्रार्थना करनेवाला कभी नीचा नहीं होता।

क्षमा-याचना, सेवा, सद्‍‍व्यवहार, नम्रता आदिके द्वारा उनके मनकी सारी जलन बुझा दें और उसमें रही हुई द्वेषकी भावनाका सर्वथा नाश कर दें। मनुष्य अपने सद्‍‍व्यवहारसे शत्रुको भी मित्र बना सकता है। पर कदाचित् ऐसा न भी हो, वे प्रसन्न न भी हों तो कम-से-कम आप अपने मनसे द्वेष या वैर-भावनाको सर्वथा निकालकर उसे सर्वथा शुद्ध कर लें।

मुझे परलोकके एक प्राणीने अपनी आँखों देखी बात बतलायी थी कि ‘जो द्वेष या वैर लेकर मरता है, उसकी नरकोंमें बड़ी ही दुर्गति होती है।’ आप ऊँचे हैं, बहुत विद्वान् हैं, आपके पास अधिकार है—यह सत्य है; पर इससे तो आपको और भी नम्र होना चाहिये। तराजूका जो पलड़ा भारी होता है, वह नीचा होता है। ऊँचा वही है, जो नीचे-से-नीचेमें भगवान‍्को देखकर—उसको अपने मनमें ऊँचा मानकर, उसका सम्मान, नमन, हित-साधन करता है और अपने लिये तो साधक—

‘सम्मानं कलयातिघोरगरलं नीचापमानं सुधा।’

‘सम्मानको भीषण विषके समान तथा नीचापमानको अमृतके समान समझे।’ यह न हो तो, कम-से-कम द्वेषकी भावनाको सर्वथा निकालकर सबका सम्मान, सबका हित, सबको सुख पहुँचानेका प्रयत्न करें। निश्चय समझें—सबमें एक भगवान् हैं, अपने प्रत्येक कर्मद्वारा उनकी पूजा करें, उनकी सेवा करें।

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।

निज प्रभुमय देखहिं जगत का सन करहिं बिरोध॥

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।

मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥

भगवान‍्से यह प्रार्थना नित्य कातर भावसे कीजिये—

बिनती तुमसे है यही, हे मेरे भगवान।

कभी किसीका भी नहीं हो मुझसे अपमान॥

सबमें देखूँ तुम्हींको छोड़ सभी अभिमान।

सबकी सेवा-हित करूँ सबको दूँ सम्मान॥

शेष भगवत्कृपा।