अपनी स्थितिकी बात

सप्रेम हरिस्मरण। होगा तो वही, जो भगवान‍्ने रच रखा है। प्रारब्धके अनुसार फलका निर्माण तो पहलेसे ही हो जाता है, केवल वह सामने आता है। हमलोग अपनी अनुकूलता-प्रतिकूलताकी भावनासे व्यर्थ ही उसमें परिवर्तन करना-कराना चाहते हैं। अनुकूल फल हो जानेपर हम अपनी सफलता मान लेते हैं और हर्षित होते हैं और प्रतिकूल फलमें असफलता मानकर दु:खी हो जाते हैं। होता प्राय: वही है, जो होना अनिवार्य था और भगवान‍्के मंगल-विधानके अनुसार अन्तिम परिणामके रूपमें लाभदायक था। पर हमारा अहम् और हमारी भोगासक्ति न तो चिन्ता और अशान्तिसे ही हमें मुक्त होने देती है और न हमारा प्रयास ही छूट पाता है। इसी उधेड़-बुनमें मानव-जीवन बीत जाता है और जीवनका असली उद्देश्य सफल नहीं हो पाता।

इधर कई दिनोंसे मेरे मस्तिष्ककी विचित्र दशा हो रही है। लोग आते हैं, पत्र आते हैं और सब ठीक-ठीक अपने मनकी बात कहते हैं और समाधान चाहते हैं। उनमेंसे कुछसे मैं थोड़ी-बहुत बातचीत भी करता हूँ और किसी-किसीको पक्‍का उत्तर भी देता हूँ। पर समझमें नहीं आता, उन्हें मैं कैसे समझाऊँ—धरातलका ही बड़ा अन्तर है। मेरे धरातलपर आये बिना वे मेरी बात समझ नहीं सकते और उनकी बातोंका मेरे मनमें कुछ भी महत्त्व समझमें नहीं आता। लोगोंसे मिलने-जुलनेमें बड़ी ‘‘अरति’’ हो रही है। ‘अरतिर्जनसंसदि’ गीताका यह पद बार-बार याद आता है। शिष्टाचारके नाते बड़े संकोचसे सबसे मिलता-जुलता तो हूँ, पर (सबमें भगवत्-बुद्धि होनेपर भी) व्यावहारिक जगत‍्को असत्ता प्रतीत होनेके कारण यह व्यवहार भी अच्छा नहीं लगता। इधर तो पाँच-सात दिनमें लगातार अत्यन्त विरक्त संन्यास-आश्रम-ग्रहण करनेकी मनमें आ रही है, जिससे व्यवहारका सम्पर्क प्राय: अपने-आप ही बन्द हो जाय। इधर प्रेसमें भी गड़बड़ चल रही है; कार्यसंचालकोंमें आपसमें प्रेम नहीं है। सभी जगह व्यष्टि-अहम‍्की प्रबलता है।

बीच-बीचमें मेरा मस्तिष्क संसारको सर्वथा छोड़ देता है। जगत‍्की कोई सत्ता नहीं रह जाती। उस अवस्थामें तो किसी प्रकारकी अशान्तिका प्रश्न ही नहीं, जब अपने किंवाड़ बन्द करके बिलकुल अकेला रहता हूँ, तब भी शान्ति रहती है। किंवाड़ खुलते ही डर-सा लगने लगता है, कोई आ न जाय। घरवाले और बाहरवाले सभीके लिये एक-सी बात है। अभी यहाँ दो विवाह होनेवाले हैं, मेरा जी डर रहा है।

विवाहवालोंसे क्या कहा जाय? पर हाँ, भगवान‍्की कृपासे विवाहके दिनोंमें मस्तिष्क खराब हो जाय तो अच्छा है। पर मैं यह जानता हूँ कि ऐसा मानना भी संसारकी सत्ताको सत्य मानना है। यह भी एक प्रकारका ‘अज्ञान’ ही है। परंतु जबतक वैसी स्वाभाविक स्थिति न हो जाय, तबतक बचना आवश्यक मालूम होता है। आप सब मेरे हितैषियोंसे, जो मुझे सुख देना और मेरा हित करना चाहते हैं—सबसे यह प्रार्थना है कि मेरे इस कार्यमें सब मेरी सहायता करें। मेरी इस परिस्थितिपर विचार करके जो कुछ उचित हो वह करना चाहिये। शेष भगवत्कृपा।