आपपर बड़ी भगवत्कृपा है

प्रिय बहन! सस्नेह हरिस्मरण।

आपका पत्र मिला था। पढ़कर बड़ी प्रसन्नता हुई। आपपर भगवत्कृपा तो प्रत्यक्ष है ही, पूर्वजन्मके शुभ संस्कार भी हैं, तभी आपके इतने कल्याणमय शुभ विचार हैं। आपकी सिनेमासे सख्त घृणा है और आप किसी भी गंदे साहित्यका स्पर्श भी नहीं करतीं, यह आजके युगमें बहुत बड़े सौभाग्यकी बात है। सबसे बड़ी चीज तो है—‘एक क्षणके लिये भी प्रभुको न भूलनेकी इच्छा और भगवान‍्में निरन्तर मनकी संलग्नता और भगवान‍्की लीलाभूमिके प्रति मनका इतना आकर्षण।’ आपका घरमें मन नहीं लगता, किसी भी कामको करनेकी इच्छा नहीं होती; सो मन तो भगवान‍्में ही लगना चाहिये, पर घरसे बाहर जानेकी इच्छा नहीं होनी चाहिये। घर साधनके लिये जितना सुरक्षित है, उतना बाहरी स्थान नहीं। आजकल सभी जगह वातावरण प्राय: खराब है। घरका काम—भगवान‍्की पूजाके भावसे करना चाहिये। भगवान‍्ने गीतामें कहा है—

‘तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंग: समाचर॥’

—अपने जिम्मेके कर्मका भलीभाँति आचरण करो, पर कहीं भी कर्म या कर्मफलमें आसक्ति न हो। नाटकमें—अभिनयकी तरह—‘खेल ठीक हो, पर कहीं भी राग-द्वेष, ममता-मोह न हो और कर्म करो यज्ञार्थ—भगवान‍्की सेवाके लिये।’ इस प्रकार भगवान‍्में प्रीति रखते हुए अनासक्तभावसे संसारमें वैध तथा प्राप्त कर्मोंका भगवत्सेवार्थ भगवत्स्मरण करते हुए ही सुचारुरूपसे सम्पादन करना चाहिये।

आपका मन भगवान‍्में विशेषरूपसे विशुद्ध प्रेमभावसे लगा रहे और प्रेम उत्तरोत्तर बढ़ता रहे—यह श्रीभगवान‍्से प्रार्थना है। शेष भगवत्कृपा।