भगवान‍्के मंगल-विधानमें संतुष्ट रहिये

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके १४ सालके पुत्रकी मृत्यु हो गयी, इससे आपको अत्यन्त दु:ख तथा मानस-पीड़ा होना स्वाभाविक ही है। पर हमलोग देखते हैं, दुनियामें ऐसी घटनाएँ प्रतिदिन होती रहती हैं। जीव कर्मवश जन्म लेता है और कर्मवश मिली हुई अवधि पूरी करके चला जाता है। वास्तवमें यहाँके सभी सम्बन्ध कल्पित हैं। आप बुद्धिमान् हैं, आपको धैर्य रखना चाहिये। भगवान‍्की सत्तापर संदेह करना तो सर्वथा गलत है। भगवान‍्की सत्ता न हो तो कर्मोंका, कर्मफलका नियन्त्रण कौन करे? हमारे मनकी हो तब तो भगवान् हैं, न हो तो भगवान् नहीं—ऐसा मानना अज्ञान है। भगवान् सर्वज्ञ हैं, सर्वलोकमहेश्वर हैं; वे बहुत दूरतक आत्माका यथार्थ कल्याण समझकर विधान करते हैं। हमारी दृष्टि सीमित है—इसलिये हम उतनी दूरकी सोच ही नहीं सकते। छोटे बालकका ऑपरेशन हो, वह दूर-दृष्टि न होनेसे अंग कटना समझकर दु:खी होता है। दूर-दृष्टिवाले हमलोग ऑपरेशनके कष्टकी परवाह न करके आगे होनेवाली नीरोगताको देखते हैं। देह छूटनेसे ही आत्माका अमंगल नहीं होता; आत्मा तो देहपातके बाद भी रहता है। यदि इस देहके पातमें उसका मंगल है तो भगवान् वही करते हैं। अतएव आपको दु:खी नहीं होना चाहिये और भगवान‍्के मंगल-विधानमें विश्वास करके संतुष्ट रहना चाहिये। शेष भगवत्कृपा।