भगवान‍्को गुरु बनाइये

सप्रेम हरिस्मरण! आपका पत्र मिला। मेरे प्रति आपकी जो सद्भावना है, उसके लिये तो मैं आपका कृतज्ञ हूँ, परंतु आपने अपने लम्बे पत्रमें बहुत-सी बातें ऐसी लिखी हैं, जो वास्तविक नहीं हैं।

‘गीताप्रेस’ और ‘कल्याण’ का प्रारम्भ और संचालन वैसे तो भगवान‍्की शक्तिसे हुआ और होता है; परंतु यथार्थमें देखा जाय तो इनके प्रतिष्ठापक श्रीजयदयालजी गोयन्दका हैं और गीताप्रेसका काम आगे बढ़ानेवाले हैं—श्रीघनश्यामदासजी जालान। ये दोनों ही इस लोकको छोड़ चुके हैं। सम्पादन-कार्यमें भी सच पूछा जाय तो हमारे श्रद्धेय पूजनीय विद्वान् लेखकोंको ही इसका श्रेय है, मैं तो केवल निमित्त बनकर श्रेय ले रहा हूँ। इसे भाग्य कहिये या मेरी चातुरी! इसके सिवा और कुछ नहीं।

आपने अपने मनमें क्या कल्पना कर रखी है, यह मुझे पता नहीं। आजकल तो भारतवर्षमें पचासों अवतार हो रहे हैं। वैसे ही किसीने मेरा नाम भी किसी अवतारमें ले लिया हो तो यह नाम लेनेवालेकी जिम्मेदारी है। मैं न अवतार हूँ, न भगवान् हूँ, न मुझमें कोई विशेषता है। इस विषयमें अपनी परिस्थितिका स्पष्टीकरण करनेके लिये मैंने पिछले दिनों एक पुस्तिका भी छपवायी थी।

भगवान‍्की दृष्टिसे भगवान‍्के सिवा और कुछ है ही नहीं। आत्माकी दृष्टिसे सब आत्मा है। भक्त यदि प्राणिमात्रमें भगवान् मानकर भगवान‍्की उपासना करे तो बहुत उत्तम है, पर उसमें ब्रह्मासे लेकर कीट-पतंग, नद-नदी, वृक्ष-लता—सभी आ जाते हैं। पुत्रके लिये पिता-माताको, पत्नीके लिये पतिको, शिष्यके लिये गुरुको भगवान् मानकर उनकी सेवा करनेका शास्त्रका जो उपदेश है, वह उन लोगोंके उद्धारके लिये है। पर किसी पुत्रका पिता, किसी पत्नीका पति, किसी शिष्यका गुरु सबके लिये भगवान् नहीं हैं। यह एक विशेष बात है, जो गृहस्थमें रहकर भी भगवत्प्राप्तिका मार्ग सुलभ करनेवाली है। मैं तो शास्त्रकी इस बातको मानता हूँ कि ‘पांचभौतिक शरीर और नामवाला कोई मनुष्य यदि अपनेको भगवान् कहता है और दूसरोंके कहनेपर अपनेको भगवान् मान लेता है, तो वह नरकगामी होता है।’

आपने मुझे गुरु माना, सो आपकी कृपा है; पर गुरु तो वह होता है जो शिष्यके तमाम अज्ञानका हरण करके उसे भगवद्धामतक पहुँचानेका भार ले सके। इतना जिसमें गुरुत्व हो, वही गुरुके योग्य है। मेरे-जैसे लोग तो शिष्य होनेलायक भी नहीं हैं, जो सद्‍गुरुकी प्रत्येक आज्ञाका बिना संदेहके पालन भी न कर सकें। इसलिये मैं न तो आजतक किसीका गुरु बना, न मुझमें बननेकी योग्यता है और न किसीको भी मुझे गुरु मानना ही चाहिये। यों अपनी शिक्षाके लिये दत्तात्रेयजीने चील, अजगर आदिसे भी शिक्षा ग्रहणकर उनको गुरु माना है। वैसे कोई किसीको भी अपने मनमें गुरु मान ले तो यह उसका गुण है, उस गुरुका महत्त्व नहीं।

मेरा तो यह निवेदन है कि आप गुरु बनानेके चक्‍करमें न पड़ें। भगवान् श्रीकृष्ण सबके गुरु हैं—‘कृष्णं वन्दे जगद्‍गुरुम्।’ उनको गुरु मानकर और उनकी दिव्यवाणी गीताको गुरुका महान् उपदेश मानकर उसके अनुसार जीवन बनाना प्रारम्भ कर दें तो आपका निश्चय ही कल्याण हो सकता है। शान्ति-सुख बाहरसे नहीं आते; ये तो कामना-वासनाके परित्यक्त होनेपर अथवा भगवान‍्के मंगलविधानपर पूर्णतया विश्वास होनेपर ही आ सकते हैं। शेष भगवत्कृपा।