भगवत्कृपासे ही भगवत्प्रेमकी प्राप्ति

सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र प्राप्त हुआ। भगवान् अथवा भगवान‍्के प्रेमकी प्राप्ति कोई दूसरा करा दे, यह सम्भव नहीं है। भगवान् न तो किसीके वशमें हैं और न भगवान् किसी मूल्यपर मिलते ही हैं। दर्शनकी अनन्य लालसा मनमें उत्पन्न कीजिये और अत्यन्त आतुर हो जाइये अथवा दर्शनकी एकान्त लालसाको मनमें रखकर अपनेको उनकी कृपापर छोड़ दीजिये। वे जब उचित समझेंगे, तब अपने-आप ही अपना या अपने प्रेमका दान आपको कर देंगे। दूसरा कोई साधन नहीं। मैं तो सभीके लिये हृदयसे चाहता हूँ कि सब लोग भगवान‍्के अपने बनें और सबपर भगवान‍्की कृपा तो है ही, उसे पहचान लिया जाय। भगवान‍्की कृपाका दर्शन भगवद्दर्शनसे भी अधिक महत्त्व रखता है। आप उनकी कृपापर विश्वास करके बिना किसी शर्तके उनके हो जायँ तो सम्भव है कि आपकी इच्छा (यदि वह सच्ची, अनन्य और तीव्र होगी तो) दूसरे किसी भी उपायकी अपेक्षा शीघ्र पूरी होगी। न किसी साधनसे यह होगा, न किसी मनुष्यके किये होगा—यह होगा भगवान‍्की कृपासे ही और भगवत्कृपाके दर्शन होंगे अनन्य विश्वास और उनके चरणोंकी शरणागतिसे ही। शेष भगवत्कृपा।