भजन ही परम सम्पत्ति है

सम्मान्य भाई साहेब! सप्रेम हरिस्मरण। आप बहुत प्रसन्न होंगे। श्रीभगवान‍्का भजन तो करते ही होंगे। संसारमें ईश्वर-स्मरणके अतिरिक्त सभी कुछ सारहीन है। जिसके पास भजनकी परम सम्पत्ति है, वह दुनियाकी नजरमें निहायत कंगाल होनेपर भी सबसे बढ़कर धनी और सौभाग्यवान् है और जो इस सम्पत्तिसे रहित है, वह ऊँची-से-ऊँची लौकिक स्थितिपर पहुँचा हुआ होनेपर भी वस्तुत: अत्यन्त दरिद्र है। वह अपने मानव-जीवनको व्यर्थ ही खो रहा है, जिसके लिये उसे महान् पश्चात्ताप करना पड़ेगा। यहाँकी कोई भी चीज साथ नहीं जाती। जिसको हम अपना स्वरूप समझते हैं, वह शरीर भी कृमि, भस्म या विष्टा बनकर नष्ट हो जाता है, फिर दूसरी कोई चीज साथ जाय या मरणके समय और उसके बाद हमारी सहायता कर सके, ऐसी तो कल्पना ही नहीं करनी चाहिये। मनुष्य मूर्खतासे ही ‘दु:खयोनि’ विषयोंमें सुख समझकर उन्हींके पीछे पागल हुआ रहता है और अमूल्य जीवनरूपी हीरेको काँचके पीछे खो देता है। तुलसीदासजी महाराजने कहा है—

नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं।

पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं॥

ताहि कबहुँ भल कहहिं न कोई।

गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई॥

इसलिये अपने जीवनको भगवत्सेवनमें ही लगाना चाहिये। जगत‍्के सारे काम उन्हींकी पूजाके रूपमें भलीभाँति करने चाहिये और जगत‍्की समस्त चीजोंका उपयोग उनकी पूजाकी सामग्रीके रूपमें करना चाहिये। शेष भगवत्कृपा।