भूलके लिये पश्चात्ताप तथा पुन: भूल न करनेकी प्रतिज्ञासे भूल मिटती है

प्रिय भाई! सप्रेम हरिस्मरण। मनुष्यके जीवनमें दुर्बलताके क्षण आते ही हैं, काम-क्रोध-लोभादिके आवेशमें, कुसंगके कारण अथवा पूर्वके बुरे संस्कारोंके उदय हो जानेसे उससे भूल हो जाती है; आचरणमें दोष आ जाता है। पर साधक पुरुष तुरंत सावधान हो जाता है; वह अपनेको उस पतनके प्रवाहमें बहा नहीं देता। भगवत्कृपाका सहारा लेकर तुरंत उछलकर बाहर निकल आता है। यही विषयी और साधकका पार्थक्य है। इसके लिये दृढ़ निश्चय, अनिवार्य मनोबल, सत्संग और भगवत्कृपाके आश्रयकी आवश्यकता है।

वास्तविक साधकको अपनी भूलपर—अपने पतनपर पश्चात्ताप होगा ही। वह पुन: वैसी भूल न करनेके लिये भगवान‍्से सहायता चाहेगा और अपने मनोबलको और भी मजबूत बनायेगा। कभी भी अपनी भूलको वह न सहन करेगा, न असावधान और लापरवाह रहेगा। साधकका यही स्वरूप है। वह अपनी भूलपर लज्जित होता—रोता है और भविष्यमें वैसी भूल न करनेकी प्रतिज्ञा करता है।

जो लोग भूल—दोषको सह लेते हैं, उसके लिये पश्चात्ताप नहीं करते, वरं असावधान रहते हैं, उनमें दोष तथा पतनके कारण बढ़ते रहते हैं और साथ ही भूल या पतनके प्रसंग भी। ऐसा मनुष्य सत्संग प्राप्त होनेपर सुधर सकता है।

जो मनुष्य पतनको उत्थान मानता है, भूल करके उसका अभिमान करता है, पाप करके अपनेको बुद्धिमान् तथा गौरवान्वित मानता है, उसके सुधारकी आशा बहुत ही कम है। जान-बूझकर पापको पुण्य मानकर उसे आश्रय देना एक बड़ा पाप है। इससे नये-नये पापोंका उदय होता है।

तुमसे भूल हुई, इसमें कोई आश्चर्य नहीं। भूल प्राय: सभीसे होती है। पर भगवान‍्की तुमपर बड़ी कृपा है, जो तुम्हें वह अपनी भूल—बड़े अपराधके रूपमें दिखायी देती है; तुम उसके लिये पछता रहे हो और भविष्यमें भूल न हो, इसके लिये भगवान‍्से करुण प्रार्थना कर रहे हो। तुम्हारे इस आचरणसे भगवान‍्की कृपा तुम्हें बल देगी और तुम भविष्यमें भूलों—अपराधोंसे बच सकोगे, ऐसी आशा है। भगवत्कृपाके बलपर मनमें यह दृढ़ निश्चय करो कि अबसे आगे कभी ऐसी भूल मुझसे नहीं होगी—नहीं होगी। शेष भगवत्कृपा।