चार प्रकारके मनुष्य
प्रिय श्री.....सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। संसारमें चार प्रकारके मनुष्य हैं—(१) पामर, (२) विषयी, (३) साधक (जिज्ञासु या मुमुक्षु) और (४) सिद्ध, (मुक्त या भगवत्प्राप्त)।
(१) पामर वे हैं—जो घोर विषयासक्त हैं; किसी भी प्रकारसे इच्छित भोगोंको प्राप्त करना और भोगना—ऐसी कामोपभोग-परायणता ही जिनके जीवनका स्वरूप है; काम-क्रोध-लोभादि जिनके स्वभावगत हैं; ऐसे विवेकरहित आसुरी सम्पदावाले तमोगुणप्रधान मनुष्य जो नये-नये दुष्कर्मोंमें ही जीवन खो देते हैं। इनका मनुष्य-जन्म अनर्थोत्पादक ही होता है और मरनेके बाद ये आसुरी योनियाँ, नरक-यन्त्रणा और मानव-जीवन मिलनेपर भी प्राय: दु:ख ही भोगते हैं।
(२) विषयी वे हैं, जिनका जीवन भोगोन्मुख है, पर जिनमें कुछ विवेक है। ऐसे लोग देवाराधन, पूजा-पाठ, तीर्थ-व्रत, दान-भजन आदि सत्कार्य भी करते हैं और भरसक विवेकपूर्वक प्राप्त वैध भोगोंका ही सेवन करते हैं; पर इनके सारे सत्कार्योंका,भक्ति-उपासना आदिका भी उद्देश्य होता है—भोग-प्राप्ति ही; अतएव ये रजोगुणप्रधान मानव-जीवनके असली लक्ष्य आत्मकल्याणका साधन नहीं करते। इनका मानव-जीवन भी व्यर्थ ही जाता है। दुर्लभ मानव-जीवनके लाभसे ये वंचित ही रह जाते हैं।
(३) साधक या मुमुक्षु अथवा जिज्ञासु वे हैं; जिनमें सत्त्वगुणकी प्रधानता होती है। ये मनुष्य-जीवनके असली उद्देश्यको जानकर उसीकी प्राप्तिके साधनमें लगे रहते हैं। इनमें भी मन्द और तीव्र प्रयत्न करनेवाले लोग होते हैं, पर इनके जीवनका उद्देश्य मोक्ष या भगवत्प्राप्ति होनेसे इनका जीवन सफल हो जाता है। कदाचित् इस जन्ममें कोई त्रुटि रह जाती है तो अगले मनुष्य-जीवनमें ये पूर्वाभ्यासवश साधन-मार्गमें अग्रसर होकर जीवनका लक्ष्य प्राप्त कर लेते हैं। ये ही ‘योगभ्रष्ट’ कहलाते हैं। इनमें ज्ञानमार्ग, भक्तिमार्ग, अष्टांगयोग, निष्काम कर्मयोग आदि विभिन्न मार्गोंके साधक रहते हैं, पर उनकी रुचि तथा स्वभावमें अन्तर होनेपर भी वे सब दैवी सम्पदा-सम्पन्न होते हैं। इनका स्वभाव तथा व्यवहार-बर्ताव विषयी पुरुषोंसे विपरीत होता है। विषयी पुरुषोंसे जिन धन, मान, पद, अधिकार, इन्द्रिय-भोग आदिकी आसक्तिपूर्वक कामना करते हैं, ये उन सबका त्याग करके उसके विपरीत आचरण करते हैं। इनमें—खास करके भक्तिमार्गवालोंमें एक बड़ी बात होती है—इनका आदर्श दैन्य। यह दैन्य हीन भावना नहीं है; यह दैन्य सर्वत्र भगवद्दर्शन तथा देहाभिमानशून्यताके कारण होता है। श्रीमद्भागवतमें भगवान्ने उद्धवसे कहा है—‘जब निरन्तर नर-नारीमात्रमें मेरी (भगवान् की) भावना की जाती है, तब थोड़े ही दिनोंमें साधकके चित्तसे स्पर्धा, ईर्ष्या, तिरस्कार और अहंकार आदि दोष नष्ट हो जाते हैं। अपने ही लोग चाहे हँसी करें; उनकी परवाह न करके देह-दृष्टि तथा लोक-लज्जाको छोड़कर चाण्डाल, गौ, कुत्ते और गधेको भी पृथ्वीपर गिरकर साष्टांग दण्डवत् प्रणाम करे।’ (स्क० ११। २९। १५-१६)
श्रीचैतन्य महाप्रभुको, जब वे गृहस्थमें ‘निमाई पण्डित’ के नामसे प्रसिद्ध थे, गंगा-स्नान करने जाते समय रास्तेमें सहसा एक ब्राह्मण महिलाने हाथ जोड़कर उनकी चरण-धूलि लेकर यह कह दिया कि ‘निमाई! तुम भगवान् हो, मेरा उद्धार कर दो।’ बस, अपने लिये एक सम्माननीया ब्राह्मणीके द्वारा ‘भगवान्’ शब्द सुनते ही इनको इतना दु:ख हुआ कि ये प्राणत्यागके संकल्पसे दौड़कर गंगाजीमें कूद पड़े। बड़ी कठिनतासे निकाले गये। निकालनेपर भी अपनेको बड़ा अपराधी मानकर कई दिनोंतक रोते रहे। भक्त साधकमें कितनी दीनता होनी चाहिये, इसकी सजीव शिक्षा इससे मिलती है। इसीसे कहा है—‘सम्मानको घोर हलाहल विष और नीचापमानको अमृत समझे।’ साधकमें इतना दैन्य होना चाहिये। इसी प्रकार अन्यान्य भोगोंसे भी विरक्ति होनी चाहिये। ऐसा साधक या मुमुक्षु अपने भावानुसार भगवत्प्रेम या कैवल्य-मोक्षको प्राप्त होता है।
(४) सिद्ध या मुक्त—भगवत्प्राप्त वे हैं, जो मानव-जीवनके परम तथा चरम लक्ष्य तत्त्वज्ञानको या भगवान्को प्राप्त कर तद्रूप हो चुके हैं। इन सिद्ध पुरुषोंका स्वभाव सहज समतायुक्त है। मान-अपमान, स्तुति-निन्दा, प्रिय-अप्रिय, शुभ-अशुभ, मित्र-शत्रु, जीवन-मृत्यु सभीमें इनका समभाव रहता है। वास्तवमें इनकी अनुभूतिमें एक ब्रह्म, परमात्मा या भगवान्के सिवा अन्य कुछ भी रहता ही नहीं। यह अनुभूति भी कथनमात्र ही है—ये तो भगवत्स्वरूप ही होते हैं। तथापि इनके आचरण-व्यवहार-बर्ताव साधक-जीवनके अभ्यासानुसार सर्वथा विरक्तिपूर्ण तथा आदर्श कर्मनिष्ठायुक्त होते हैं। पर इनकी प्रत्येक चेष्टा होती है, परम आदर्श तथा सहज लोक-कल्याणकारिणी।
आपके प्रश्नका यह संक्षिप्त उत्तर है। हमलोगोंको चाहिये कि हम ‘साधकका जीवन’ अपने लिये आदर्श मानकर अपने-अपने साधन-मार्गपर निष्ठा तथा श्रद्धा-विश्वासके साथ दैवी सम्पदाके गुणोंका अपनेमें अधिकाधिक विकास करते हुए अग्रसर होते रहें। शेष भगवत्कृपा।