दो प्रश्नोंका उत्तर
प्रिय महोदय! आपका कृपापत्र मिला। आपके दोनों प्रश्नोंके उत्तर निम्नलिखित हैं—
(क)
मनुष्य-जीवन जीवको दिया ही जाता है—जन्म-मृत्युके बन्धनसे मुक्त होकर परमात्माकी प्राप्ति, स्व-स्वरूपमें स्थिति, मोक्ष, भगवत्साक्षात्कार या भगवत्प्रेमकी प्राप्तिके लिये। नाम कुछ भी हो, बात एक ही है—इस माया-प्रपंचसे छूटकर भगवान्में स्थित हो जाना।
जिस समय अधिक मनुष्य इस लक्ष्यपर चलनेवाले होते हैं, उसका नाम है—‘सत्ययुग’ और जब बिरले ही लोग इस लक्ष्यपर चलते हैं, शेष सब कामोपभोगपरायण होकर अनवरत सांसारिक भोगोंके अर्जन तथा भोगके प्रयासमें लगे रहते हैं, उस समयका नाम है—‘कलियुग’।
यही सत्ययुग और कलियुगका भेद है। इस कलियुगमें भी जो मानव-जीवनके लक्ष्यपर सुदृढ़ रहकर उसीकी ओर बढ़ते रहते हैं, वे कलियुगमें सत्ययुगी हैं; ऐसे सत्ययुगी मनुष्योंका ही संग करना और इन्हींके उपदेश तथा आचरणके अनुसार जीवन बनाना चाहिये। इससे वास्तविक विवेक होगा; वैराग्यसे शम, दम, तितिक्षा, उपरति, श्रद्धा और समाधान—यह षट्-सम्पत्ति प्राप्त होगी; यह अनिवार्य है। षट्-सम्पत्ति प्राप्त न हुई तो मानना चाहिये कि वैराग्य हुआ ही नहीं और वैराग्यका उदय न हुआ तो विवेक आया ही नहीं। षट्-सम्पत्ति आते ही मोक्षकी इच्छा जाग उठती है। तब एकमात्र मोक्षके लिये ही साधन होता है और उसका फल तो स्व-स्वरूपमें स्थिति, ब्रह्म या परमात्माकी प्राप्ति है ही।
(ख)
हमारी इस पृथ्वीकी मानव-जाति अध्यात्मवादके अभाव, ईश्वरकी अमान्यता, कर्मफलमें अविश्वास, सीमित स्वार्थ, विपरीतदर्शिनी तामसी बुद्धि, भय, संदेह, मिथ्या अभिमान और विशुद्ध भौतिकता या भोगवाद, अनात्मवादी भौतिक आसुरी विज्ञान आदिके वशमें होनेके कारण परमात्मा, आत्मा, आत्मसाक्षात्कार ही जीवनका लक्ष्य, कर्मफल-भोगकी अनिवार्यता, सर्वभूतहित, सर्वत्र सुख-शान्तिके प्रसार, सबके आतंकरहित निर्भीक जीवन और सबकी सेवा करके सबका हित करनेकी भावनाको भूलकर धराके बड़े-बड़े राष्ट्र दूसरोंके आक्रमणसे अपनी सुरक्षा अथवा दूसरोंपर आक्रमण करके उनपर विजय प्राप्त करने तथा उनका सर्वस्व अपहरण करनेके लिये दिन-रात सन्देह, भय-त्रास, काम-क्रोध-लोभ तथा अभिमान-मद-दर्पसे भरे अपनी बुद्धि, विद्या, शक्ति, विशाल अर्थराशि, समय, विज्ञान—सबके द्वारा घोर राक्षसी विनाशके आयोजनमें लगे हैं। नीचे दिये हुए आँकड़ोंसे इसका अनुमान हो सकेगा। पिछले दिनों ‘मुंबई समाचार’ में छपा था—
‘दुनिया’ में ७५ करोड़के लगभग फौजी राइफलें और पिस्तौलें फैली हुई हैं। प्रत्येक जवान मजबूत मानवके पीछे एक समझनी चाहिये। इसके अतिरिक्त गोलियों तथा दूसरे विस्फोटक पदार्थोंका हजारों अरब जितने ‘राउण्ड’ करोड़ोंकी संख्यामें मशीनगन, मोर्टार, टैंक नष्ट करनेवाले शस्त्र, तोप आदि, लाखके लगभग युद्ध-विमान और हजारोंकी संख्यामें फौजी जलयानोंमें काममें आनेवाले शस्त्र संगृहीत हैं। दुनियाके देशोंमें चार महान् शक्तियाँ (उत्तरोत्तर बढ़ती हुई) शस्त्र-सज्जाकी माँगको पूरा करनेका काम कर रही हैं। अमेरिकाने १९४५ के बाद ३६,००० करोड़ (रुपये) के मूल्यके शस्त्रोंका व्यापार किया है। ब्रिटेन और फ्रांसने अनुक्रमसे रु० ४,५०० करोड़ और २,७०७ करोड़के शस्त्र बेचे हैं और रूसमें रु० ६,२०० करोड़का इन शस्त्रोंका व्यापार हुआ है। दूसरे विश्वयुद्धमें सेनाका जितना संख्याबल था, वर्तमानमें उससे दूना हो गया है।’
सम्मेलनों और वक्तव्योंमें विश्वशान्ति, विश्वप्रेमकी बातें कही जाती हैं और आचरणमें प्रत्यक्ष उसका विरोधी कार्य किया जा रहा है। इस अवस्थामें, जबतक लोगोंका हृदय-परिवर्तन न हो, जबतक ‘स्व’ की सीमाका विस्तार न हो, जबतक वास्तवमें सर्वहितमें अपना हित न समझा जाय, तबतक यह तामसप्रवाह रुकनेवाला नहीं है। इसीमें हित दिखायी देता है—यही कर्तव्य प्रतीत होता है। तमसाच्छन्न आसुरी बुद्धिका स्वभाव ही ऐसा है। इसका अवश्यम्भावी फल है—अध:पतन। भगवान् गीतामें कहते हैं—
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी॥
(१८। ३२)
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसा:॥
(१४। १८)
‘तमोगुणसे आवृत बुद्धि अधर्मको धर्म मानती है और सभी बातोंमें विपरीत ही निश्चय करती है। हे अर्जुन! वह तामसी बुद्धि है।’
और ‘इस जघन्यगुणवृत्तिमें स्थित तामस लोग नीची गतिको प्राप्त होते हैं।’ शेष भगवत्कृपा।*