हाड़-मांसके पुतलेको भगवान्के आसनपर बैठाना पाप है
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपने जो कुछ लिखा, सो सत्य है। यह मानव-जातिका दुर्भाग्य है, जो आज जगह-जगह बहुत-से मानव-प्राणी भगवान्को उनके आसनसे खिसकाकर स्वयं भगवान्के आसनपर बैठना चाहते हैं और मिथ्या नाम-रूपवाले अस्थि-मांस, मल-मूत्रके पिण्ड अपवित्र शरीरकी पूजा करवाते हैं। ऐसे मनुष्य वास्तवमें अपना तथा जनताका बड़ा अहित करते हैं। मनुष्यके पास जो कुछ भी सम्पत्ति-शक्ति, विद्या-बुद्धि, पद-अधिकार, ऐश्वर्य-वैभव, सौन्दर्य-माधुर्य आदि हैं, सब भगवान्की वस्तु हैं, भगवान्की ओरसे ही उसे मिली हैं। इन सब वस्तुओंको नम्रतापूर्वक निरन्तर निरभिमान रहकर भगवत्स्वरूप प्राणिमात्रकी यथायोग्य सेवामें समर्पण करते रहना ही मनुष्यका कर्तव्य है और इसीमें इनकी सार्थकता है; पर मनुष्य इस बातको भूलकर इन वस्तुओंको (बिना हुए ही अपने पास मानकर—या थोड़ी-बहुत किसीके पास हो तो उसको) अपनी वस्तु मानकर अपनेको भगवान् सिद्ध करने लग जाता है; भगवान् कहलानेमें सुखका—गौरवका अनुभव करता है और जनताके द्वारा हाड़-मांसके पुतले इस पांचभौतिक, क्षणभंगुर, सदा अपवित्र शरीरकी पूजा करवाता है—यह उसका प्रमाद-पाप है। पर किससे क्या कहा जाय! आज तो कुएँमें भाँग पड़ी है। जिधर देखिये, उधर ही—प्राय: प्रत्येक क्षेत्रमें ही, धार्मिक तथा आध्यात्मिक कहे जानेवाले क्षेत्रोंमें विशेषरूपसे—व्यक्तिपूजा करानेवाले ईश्वरके अवतारों तथा साक्षात् ईश्वरोंकी भरमार हो रही है। इससे जो अनाचारका विस्तार हो रहा है—वह बड़ा ही अकल्याणकारी है।
पतिको परमेश्वर मानकर पूजनेवाली—उसके सर्वथा अनुगत रहनेवाली पतिव्रता पत्नीकी भाँति गुरुको भगवान् समझकर उनका सेवा-सम्मान करना निश्चय ही आवश्यक तथा कल्याणकारी है; परंतु जैसे पतिका अपनेको ‘परमेश्वर’ मानकर पूजा करवाना सर्वथा अनीतिपूर्ण असदाचार है, वैसे ही गुरुका अपनेको ‘भगवान्’ कहकर पूजा करवाना भी निस्सन्देह सर्वथा अनुचित तथा असदाचार है। इससे बुद्धिमान् मनुष्यको सदा बचना चाहिये। आपसे यदि हो सके और आपकी बातका कोई असर उनपर होता दीखे तो—उन्हें समझाइये। अभी तो वे नये ही भगवान् बनने जा रहे हैं; समझमें आ जाय तो अच्छी बात है, वे भविष्यमें होनेवाले भयानक बन्धन तथा यन्त्रणासे बचेंगे। शेष भगवत्कृपा।