‘हीन भावना’ नहीं आनी चाहिये
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। भक्ति-जगत्में साधकका ‘दैन्य’ उसकी भगवान्के चरणोंमें पूर्ण प्रपत्तिके लिये—भगवान्की अनन्य शरणागतिके लिये आवश्यक साधन है और ऐसे ‘दैन्यभाव’ को प्राप्त मनुष्य भगवान्को बहुत प्रिय हैं, पर यह साधनरूप दैन्य ‘हीन भावना’ (Inferiority Complex) नहीं है। हीन भावनामें तो मनुष्य सर्वथा निराश, उदास, अशक्त, उत्साहहीन, बार-बार असफलताका चिन्तन तथा सफलतामें संदेह करनेवाला, आलसी एवं अकर्मण्य हो जाता है; पर साधन-जगत्के दैन्यमें वह भगवान्का विश्वासी मनुष्य भगवान्की कृपा-शक्तिके बलपर नित्य उत्साहयुक्त सफलताका निश्चयी, सदा हर्षोत्फुल्ल, भगवान्की अमोघ-शक्तिसे शक्तिमान्, भगवत्सेवाके भावसे नित्य सहर्ष सत्कर्मोंमें लगा हुआ होता है। उसमें ‘हीन भावना’ का सर्वथा अभाव होता है।
असलमें हीन भावनाका उदय भगवान्की कृपापर अविश्वास करनेवाले मनुष्योंमें ही प्रधानतया होता है। भगवान्के सामने अत्यन्त दीन भावनासे रहनेवाले, सचमुच अपनेको सर्वथा दीन-हीन माननेवाले और मेरे समान दीन कोई नहीं है—‘मो सम दीन न’—ऐसी घोषणा करनेवाले तुलसीदास प्रपंचरूप संसारको ललकारकर कहते हैं—
‘मैं तोहि अब जान्यौ संसार।
बाँधि न सकहि मोहि हरिके बल,
प्रगट कपट आगार॥’
अतएव इस साधनरूप दैन्यका तो सदा संरक्षण और पोषण करना चाहिये और निराश, उदास, अकर्मण्य प्रमादग्रस्त उत्साहहीन बना देनेवाली हीन भावनासे सदा बचे रहना चाहिये। कभी भी मनमें निराशाके नकारात्मक (Negative) भावोंको उदय न होने दीजिये। सदा-सर्वदा भगवदाश्रयी रहकर भगवान्के बलपर निश्चित सफलताके (Positive) भावोंका सृजन, पोषण तथा संवर्धन करते रहिये। न कभी स्वयं हीन भावनाको आश्रय दीजिये और न अपने कार्यों तथा वचनोंसे दूसरोंमें हीन भावना पैदा कीजिये, न कहीं किसीमें कुछ हो तो उसको बढ़ाइये।
किसी रोगीसे कभी यह न कहिये कि ‘तुम्हारा रोग असाध्य है, तुम्हारे नीरोग होनेमें संदेह है, इस अवस्थामें अच्छे होनेकी क्या आशा है? क्यों दवा कराते हो?’ आदि—
किसी विद्यार्थीसे यह मत कहिये कि ‘तुम क्या पढ़ोगे? तुम्हें तो परीक्षामें फेल ही होना है। तुम्हें उत्तीर्ण होनेकी आशा नहीं करनी चाहिये।’ आदि—
किसी कर्मका शुभारम्भ करनेवालेसे ऐसा मत कहिये—‘इतने बड़े काममें तुम कैसे सफल होओगे? क्यों व्यर्थ श्रम करते हो? हमें तो सफलताकी जरा भी आशा नहीं है।’ आदि—
किसी सेनाध्यक्ष या सैनिकसे कभी यह मत कहिये कि ‘आप क्या जीतेंगे? इतनी बड़ी शक्तिके सामने आपका यह व्यर्थ प्रयास है। आप युद्ध करेंगे तो निश्चय ही हारेंगे। कहाँ अमित शक्ति-पराक्रमवाला आपका विपक्षी और कहाँ नगण्य क्षुद्र बलवाले आप।’ आदि—
किसी सेवामें लगनेवालेसे ऐसा मत कहिये कि ‘तुम क्या सेवा करोगे? तुममें न सेवा करनेकी तमीज है, न तुम्हारे पास कोई साधन ही है; झूठ-मूठ ही उत्साह दिखाकर क्यों बवाल मोल लेते हो? तुमसे सेवा तो बनेगी ही नहीं।’ आदि—
किसी व्यापारीसे कभी मत कहिये कि ‘तुमको तो घाटा ही लगेगा। तुम यह सब चेष्टा क्यों करते हो? तुम्हारा भाग्य ही अच्छा नहीं है।’ आदि—
किसी बच्चेसे उसके माता-पिता या अभिभावक कभी ऐसी बात न कहें कि ‘तुम क्या उन्नति करोगे? तुम्हें तो जीवनभर दु:खी-दरिद्र ही रहना है। तुम सर्वथा अयोग्य हो। तुमसे कोई काम हो ही नहीं सकता। हमारा प्रारब्ध ही खराब था; जो तुम हमारे यहाँ पैदा हुए।’ आदि—
किसी साधकसे कभी यह मत कहिये कि ‘तुम साधनमें सफल नहीं हो सकते।’ आदि—
अपने-अपने क्षेत्रमें सभीको सफल पुरुषोंके उदाहरण देकर उत्साह दिलाइये और कहिये कि ‘ऐसा कौन-सा काम है, जो भगवान्की कृपासे ठीक-ठीक प्रयत्न करनेपर सफल नहीं हो सकता। छोटा आदमी बहुत बड़े-बड़े काम कर सकता है। हीनबल मनुष्य भी बलवानोंको हरा सकता है। हर क्षेत्रमें मनुष्य सफलता प्राप्त कर सकता है, यदि वह भगवान्के अमोघ कृपा-बलपर विश्वास करके ठीक रास्तेपर चलता रहे और उत्साहपूर्वक अपना काम तत्परतासे करता रहे। भगवान्के बलमें विश्वास, उस बलके भरोसे सफलताका निश्चय, तत्परताके साथ कार्यमें लगे रहना और उत्साह कम करनेवाले—दूसरी-दूसरी ओर मनको खींचनेवाले वातावरणसे दूर रहना—यों करनेपर निश्चय ही सफलता मिलेगी। कभी निराश मत होइये।’
वास्तवमें अपनेमें तथा दूसरोंमें हीनताकी भावना पैदा करनेवाला अपना तथा दूसरोंका शत्रु है। अत: भगवान्के बलपर तथा पुरुषार्थपर विश्वास पैदा करने-करानेवाला अपना तथा दूसरोंका सच्चा मित्र बनना चाहिये, शत्रु नहीं।
आप स्वस्थ और सानन्द होंगे। जो भगवान्का आश्रय करके उनके चरणोंमें स्थित है, वास्तवमें वही ‘स्वस्थ’ है और वही ‘आनन्द’ का वास्तविक अनुभव करता है। शेष भगवत्कृपा।