जगत् और जगत्के भोगोंमें सुख है ही नहीं
प्रिय भाई! सप्रेम हरिस्मरण। तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हारा लिखना बहुत ठीक है, पर भैया! यह जगत् बना ही है अनित्य अपूर्ण उपादानोंसे। प्रकृतिके विक्षोभ या अशान्तिसे ही इसकी रचना हुई है; अतएव प्रतिकूलता, अभाव, रोग-शोक, विपत्ति, दु:ख आदि अशान्तिके कारण जगत्के स्वरूपगत हैं। सम्राट् हो या भिखारी—जगत्से न किसीको शान्ति-सुख मिला है, न मिल सकता है। एक अभाव, एक दु:ख दूर होगा तो तत्काल दूसरे दस-पाँच आकर खड़े हो जायँगे। सुख-शान्तिका उपाय तो एक ही है—जिस जीवनको जगत्में झोंक रखा है, उसे भगवान्के अर्पण कर दिया जाय। भगवान्में शान्ति-सुख, सौन्दर्य-माधुर्य, पूर्णता-अविनाशिता आदि स्वरूपगत है और नित्य पूर्ण हैं। भगवान्से प्रेम करो; हटा लो आसक्ति-ममता, जगत्के दु:ख-परिणामी भोगोंसे; मल-मूत्र, अस्थि-मांसके पिण्ड इस शरीरसे निकाल दो अहंताको। अनित्य-असत् को छोड़कर नित्य-सत् भगवान्से सम्बन्ध जोड़ लो, जो जुड़ा ही है; केवल पर्दा हटाना है। तभी सुख-शान्ति मिलेंगे। अन्यथा खोज करते रहो जगत्के भोगोंमें शान्तिकी—धन-सम्पत्ति-मान-प्रतिष्ठा, पद-अधिकार, पुत्र-मित्र आदिमें सुखकी—सदा निराश ही रहोगे, वैसे ही, जैसे अन्धकारसे प्रकाशकी आशा व्यर्थ होती है, संतप्त बालूमेंसे कभी तेल नहीं निकलता। सोचकर—दृष्टि फैलाकर देखो, जगत्में जगत्के प्राणिपदार्थ-परिस्थितियोंमें कौन सुखी है? दूसरोंकी बात छोड़ो—पाण्डवोंने भगवान् श्रीकृष्णको सखारूपमें, परम आत्मीय रूपमें पाया, पर सारा जीवन बीता दु:ख-विपत्तिमें ही। पर वह दु:ख-विपत्ति भगवान्को मिलानेवाली हुई, इसीसे कुन्तीदेवीने भगवान्से विपत्तियोंका ही वरदान माँगा।
भैया! हमलोग जो यहाँ सुख खोज रहे हैं, यह यथार्थमें हमारा प्रमाद है। इस मिथ्या आशा-आस्थाको छोड़कर यहाँ जो कुछ होना है, उसे होने दो और भगवान्के बननेकी कोशिश करो। इसीमें कल्याण है। शेष भगवत्कृपा।