जगत् दु:खकी खान है
प्रिय भाई, सप्रेम हरिस्मरण। भैया! भगवान्को छोड़कर यह जगत् दु:खकी खान है। भगवान्ने इसे ‘दु:खयोनि’ बतलाया है। दु:खोंसे छूटनेका एक ही उपाय है—बस, यही कि अपनेको भगवान्के प्रति सब प्रकारसे समर्पण कर देना। तभी सच्चा सुख, अपार शाश्वती शान्ति मिल सकेगी। संसारकी नजरमें परिस्थिति पलटनेसे दु:ख नहीं मिटेगा, दु:खोंके हेतुमात्र बदल जायँगे। दु:खालयमें दु:ख तो रहेगा ही। भगवान्की इस नाट्यशालामें चतुर एक्टरकी भाँति खेलते रहो। भगवान् जैसा कुछ स्वाँग दें, जो कुछ प्रदान करें, उसीको सानन्द सिर चढ़ाओ। इस पार्थिव जीवनमें भगवान्को छोड़कर कुछ भी नित्य और आनन्द नहीं है। भगवान्से ही आनन्दका झरना बहता है, उसमें नहाओ, कृतार्थ हो जाओगे। ये भावुकताके शब्द नहीं हैं, सत्य तथ्य है।
अभी दस-पाँच दिन तो यहीं ठहरनेका विचार करता हूँ, परंतु यहाँ रहना नहीं है; मन किसी औरको ही खोजता है, वह व्यस्त है, देखें लीलामय क्या करते हैं?
तुम्हारे शरीर और मन स्वस्थ होंगे। भगवान्का स्मरण किसी भी बुद्धिसे अवश्य करते रहना। शेष भगवत्कृपा।