कानूनन गोवध बंद होना चाहिये*

आपका २४ जनवरीका कृपापत्र मिला। आपने कृपापूर्वक मेरे पत्रका तत्काल स्वयं लम्बा पत्र लिखकर उत्तर दिया, इसके लिये मैं आपका कृतज्ञ हूँ। मेरे प्रति चिरकालसे आपकी जो अहैतुकी प्रीति, शुद्ध सद्भावना तथा आत्मीयता है, इसके लिये मैं आपका सदा ही ऋणी हूँ, आपका संदेश मैं.....महाराजके पास भेज रहा हूँ। वे क्या करेंगे, इसका निश्चित तो पता नहीं है, पर आशा है—वे फिलहाल आपकी बात मान लेंगे।

आपने पत्रमें जो कुछ विचार प्रकट किये हैं, वे सर्वथा स्तुत्य और विचारणीय हैं एवं उनके अनुसार गो-संवर्धन, नस्ल-सुधार, गो-सेवा होनी ही चाहिये। लोग छलसे कसाईके हाथ पगहा नहीं पकड़ाते और कसाई भी रुपये जमीनपर रख देता है—इस प्रकार कपटसे आँख बचाकर स्वार्थवश गोवध हो या कराया जाय, इसमें संतोष माननेकी तो कल्पना ही नहीं है; यह तो प्रत्यक्ष गोहत्या है—महापाप है; यह बंद होनी ही चाहिये।

परंतु साथ ही कानूनन सर्वथा गोवध बंद भी होना ही चाहिये। इसके बिना अच्छी गायोंका कटना बंद नहीं होगा। आपसे कई बार पहले भी बात हो चुकी है और आपने इस बातको स्पष्ट रूपसे स्वीकार किया था। किंतु आप आवश्यकतासे अधिक साधु हैं। इसलिये स्पष्टवादी होनेपर भी कहीं-कहीं मित्रों तथा साथियोंके मनके विरुद्ध या सरकारकी नीतिके विपरीत कोई बात कहनेमें हिचक जाते हैं। अतएव मेरी यह विनीत प्रार्थना है कि अब आपको साहसके साथ अपने मनकी बात स्पष्ट कर देनी चाहिये कि ‘सरकारको कानूनन सर्वथा गोवध बंद करना होगा।’ और इसके लिये उचित प्रयत्न भी करना चाहिये।

आशा है, मेरी प्रार्थनापर आप ध्यान देंगे और मैं धृष्टतापूर्ण जो शब्द लिख गया हूँ—यद्यपि आप जानते हैं कि ये सत्य हैं—उसके लिये मुझे कृपया क्षमा करेंगे।

आप स्वस्थ और सानन्द होंगे। शेष भगवत्कृपा।