कुछ आवश्यक परामर्श
प्रिय बहन! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके मानसिक संतापके लिये मेरे मनमें सहानुभूति है, पर इस संतापका नाश भगवत्कृपाका अवलम्बन लेकर उसके बलसे आप ही कर सकेंगी। लम्बे पत्रका संक्षेपमें उत्तर नीचे लिखा जाता है—
(१) क्रोध अवश्य ही बहुत बुरी चीज है। मनकी प्रतिकूलतामें इसका उदय होता है और जहाँ प्रतिकूलता सहनेको मनुष्य अत्यन्त विवश हो जाता है, वहाँ वह और भी ज्यादा आता है। प्रत्येक प्रतिकूलताको भगवान्का मंगल-विधान मानकर संतोष करनेका अभ्यास कीजिये। क्रोध आनेपर चुप रहिये या एक सौ आठ बार भगवान्का नाम लेनेका नियम ले लीजिये। भगवान्से प्रार्थना कीजिये। क्रोधका वेग कम हो जायगा।
(२) भगवान्को मन-ही-मन सद्गुरु मान लीजिये और मन-ही-मन उनको प्रणामकर तथा उनसे पूछकर काम किया कीजिये।
(३) विवाह हो जाय तो बहुत अच्छा है। हो सके तो आप—
हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकरप्रिया।
तथा मां कुरु कल्याणि कान्तकान्तां सुदुर्लभाम्॥
‘इस मन्त्रकी एक मालाका जप नित्य कीजिये और पार्वती मातासे प्रार्थना करती रहिये कि वे आपके लिये सुयोग्य वर शीघ्र प्रदान करें।
(४) आत्महत्याकी बात कभी मनमें भी मत लाइये; यह महापाप है। आत्महत्यामें आत्मा यानी आपकी मृत्यु नहीं होती, इस शरीरसे सम्बन्ध छूटता है। पर आत्महत्या-जनित पाप आपके साथ जाता है और उसका बहुत ही बुरा—अत्यन्त कष्टदायक फल आपको बाध्य होकर भोगना पड़ता है। अतएव आत्महत्याका कभी विचार भी मत कीजिये।
(५) आपके जानेसे किसीको सुख-दु:ख नहीं होगा। सुख-दु:ख तो अनुकूलता-प्रतिकूलताकी अनुभूतिमें होता है।
(६) आप श्रीमद्भागवत, पुरुषोत्तमसहस्रनाम, विष्णुसहस्रनाम, नारायणकवच आदिका पाठ रोज करती हैं तथा ‘कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव:’—गीताके मन्त्रकी एक माला तथा ‘श्रीकृष्ण: शरणं मम’ की पाँच मालाका जप करती हैं, सो बहुत अच्छी बात है; अवश्य करती रहिये। ये व्यर्थ नहीं जा रहे हैं, इनका फल हो रहा है, जो अभी आपको दीखता नहीं। विश्वास, श्रद्धा तथा प्रेमके साथ करेंगी तो फल बहुत उच्च स्तरका तथा शीघ्र होगा।
(७) अपनेको भगवान् श्रीकृष्णके अनन्य शरण करके उन्हींको एकमात्र अपना आश्रय मानिये। उनकी कृपासे सारे विघ्नोंका नाश, समस्त कल्याणकी प्राप्ति अपने-आप हो जायगी। आप निराश न होकर भगवत्कृपापर विश्वास करके भगवान्के शरण हो जाइये। शेष भगवत्कृपा।