लाटरी—एक प्रमाद
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। लाटरीके सम्बन्धमें लिखा, सो यह तो ठीक है कि लाभ-हानि प्रारब्धके अनुसार ही होती है। आप बराबर टिकटें लेते रहे हैं, पर आपको अभीतक कुछ भी नहीं मिला—यह भाग्यकी ही बात है। पर यह काम वस्तुत: अच्छा नहीं है। इसमें बिना श्रम हरामके पैसे पानेकी नीयत है। मेरी राय पूछी, सो मैं तो इसे प्रमाद ही मानता हूँ। आजकल हम सभी धन-लोलुप हो रहे हैं; किसी प्रकार भी हो, धन आना चाहिये। सरकार भी हमारी ही है। सरकारोंकी धन-लोलुपता ही लाटरीका यह प्रमाद है। किसी भी धार्मिक या शिक्षा-सम्बन्धी पवित्र कार्यके लिये इतनी आसानीसे इतने रुपये नहीं मिल सकते; पर इसमें तो गरीब-से-गरीब आदमी अपना पेट काटकर लोभसे पैसे देता है कि कभी पहला इनाम मुझे ही मिल जायगा। अधिक पैसा इसमें गरीबोंका ही आता है। यह सरकारोंका एक तरहका पाप है, जो गरीबोंको प्रलोभनमें डालकर इस अनैतिक जुएके कार्यमें उनसे पैसे बटोरकर अपनी धनकी पिपासाको बढ़ाती रहती हैं। सुना गया है, देशके मान्य तथा वयोवृद्ध विद्वान् श्रीराजगोपालाचारीने राष्ट्रपतिको लिखा था कि ‘इस प्रकार गरीबोंको प्रलोभनमें डालकर जुएमें लगाना क्या सरकारोंके लिये लज्जाजनक नहीं है?’ कहा जाता है कि यह गैरकानूनी नहीं है। पर कानूनी होनेसे ही कोई कार्य नैतिक या चरित्र-निर्माण करनेवाला नहीं बन जाता है। कसाईखाने कानूनी हैं, पर क्या उनमें हिंसाका महापाप नहीं हो रहा है? इसी प्रकार लाटरीका कार्य कानूनी हो सकता है, पर वह नैतिक कदापि नहीं है; अत: लाटरीका कार्य करने-करानेवाले लोग अनैतिकताको ही प्रोत्साहन देते हैं।
कहा जाता है कि विभिन्न सरकारोंने अबतक सब मिलाकर ४७ करोड़ रुपये इकट्ठे किये हैं, जिनमेंसे लगभग २० करोड़ इनाम बाँटनेमें, कमीशनमें तथा खर्चमें लगे हैं। सबसे अधिक तमिलनाडुने रुपये इकट्ठे किये हैं। बात-की-बातमें लखपती बननेकी इच्छासे लोग हरामके पैसेपर मन चलाते हैं और सरकारें उनको प्रोत्साहन देकर रुपये लेती हैं। सुना गया है कि सफलताके कारण लाटरीकी तथा इनामकी रकमें और बढ़ायी जा रही हैं, जिससे अधिक प्रलोभन हो और अधिक रुपये आवें। अधिकांशमें गरीबोंसे आये हुए ४७ करोड़ रुपयोंका यह जुआ क्या उनकी गरीबी तथा दुर्दशाको बढ़ानेवाला नहीं है? पर कौन सुने?
‘पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत्।’
आप मेरी बात मानें तो इन हरामके तथा गरीबोंके रक्त-जैसे पैसोंपर मन चलाकर लाटरीके टिकट मत खरीदिये। शेष भगवत्कृपा।