मैं भगवदिच्छासे ही ‘गोरक्षा-महाभियान-समिति’ में सम्मिलित हुआ

सम्मान्य महोदय! सादर प्रणाम। आपका आवश्यक और मेरे हितकी दृष्टिसे लिखा आत्मीयतापूर्ण पत्र मिला। आपकी इस सद्भावना और प्रीतिके लिये कृतज्ञ हूँ। आपके प्रश्न तो बहुत लम्बे हैं। अत: प्रश्न न लिखकर संक्षेपमें उत्तर लिख दे रहा हूँ, क्षमा कीजियेगा। मैं नहीं जानता कि मेरे इन उत्तरोंसे आपको संतोष होगा या नहीं, पर मैं अपने मनकी बात इस पत्रके द्वारा किसी अंशमें प्रकट कर सकूँगा।

मेरा किसी भी राजनीतिक दलसे कोई सम्बन्ध नहीं है। चुनावमें मैं स्वयं तो खड़ा होता ही नहीं, किसीका समर्थन-विरोध भी नहीं करता। अवश्य ही यह चाहता हूँ और आप भी यह चाहते होंगे कि योग्य-से-योग्य, सच्चे, ईमानदार, विचारशील, बुद्धिमान् और कर्तव्यपरायण तथा ईश्वरसे डरनेवाले लोग संसद और विधानपरिषद आदिमें जायँ, चाहे वे किसी भी दलके हों या निर्दलीय—स्वतन्त्र हों, जिससे देशको न्याय और सत्यकी उपलब्धि हो सके और देश वास्तवमें ही विनाशसे बचे।

वर्षोंसे मेरा राजनीतिसे कोई सम्बन्ध नहीं है, यद्यपि मैं हिंन्दू-धर्मके अनुसार हिंदू-राजनीतिको धर्मसे रहित नहीं मानता। हमारे यहाँ तो मूत्र-पुरीषोत्सर्गतक धर्मके अन्तर्गत है। गर्भाधानसे लेकर अन्त्येष्टितक और मृत्युके बाद भी हमारी प्रत्येक क्रिया और प्रत्येक विचारका धर्मसे सम्बन्ध है। धर्महीन राजनीति तो असुरोंकी होती है। राजनीतिसे अलग रहनेका मेरा अर्थ इतना ही है कि मैं वर्तमान किसी भी ‘पोलिटिकल पार्टी’ से कोई सम्बन्ध नहीं रखता।

मेरा किसी भी राजनीतिक दलसे राजनीतिके नाते कोई सम्बन्ध नहीं है। यों सभी अपने हैं। मुझसे प्रेम करनेवाले मित्रोंमें कांग्रेसी भी हैं, जनसंघी, हिंदूमहासभाई, रामराज्य-परिषदी तथा स्वतन्त्र दलके भी हैं एवं समाजवादी, प्रजा-समाजवादी, साम्यवादी और विप्लववादी भी हैं। वे सभी मुझे अपना समझते हैं।

यदि देश और विश्वको जल्दी ही प्रलयका शिकार नहीं होना है तो गोहत्या बंद होगी ही। और सारे विश्वमें जहाँ-जहाँ गोहत्या होती है, बंद होनी चाहिये। इस आन्दोलनके फलस्वरूप भी गोहत्या बंद होनी चाहिये, क्योंकि यह विश्वकी रक्षाके लिये आवश्यक है। परंतु मुझे इस आन्दोलनके फलकी कोई चिन्ता नहीं है, न उसमें आसक्ति है। भगवान् जब जिस प्रकारकी बुद्धि दें, किसीका भी बुरा न चाहते हुए भगवत्पूजाके भावसे सावधानीके साथ उस बुद्धिके अनुसार कार्य करना चाहिये। न तो कार्यके पूर्ण होनेमें आसक्ति होनी चाहिये और न कार्यके अनुकूल फलमें आसक्ति होनी चाहिये। घरमें आग न लगे, सावधानी रखनी चाहिये; आग लग जाय तो बुझानेका प्रयत्न करना चाहिये। बस, अपना काम हो गया। घर जलना होगा तो जलेगा ही, इसके लिये चिन्ताकी आवश्यकता नहीं।

असलमें साधक-मनुष्यको कर्मासक्ति तथा कर्म-फलासक्ति न रखते हुए जैसे नाट्य-मंचपर कुशल अभिनेता अपने स्वाँगके अनुसार अपना अभिनय नाटकके स्वामीकी प्रसन्नताके लिये कुशलताके साथ करता है, वैसे ही—भगवत्प्रीत्यर्थ अपने कर्तव्यका सम्पादन करना चाहिये।

मुसलमान-ईसाइयोंसे मेरा तनिक भी द्वेष नहीं है। कई मुसलमान भाई-बहिन ऐसे हैं, जो मुझे अपने सगे भाईसे बढ़कर प्यार करते हैं। बहुत-से ईसाई मेरे मित्र हैं। वस्तुत: मनुष्य ही नहीं, चेतन पशु-पक्षी-तिर्यक् जीव ही नहीं—जड पृथ्वी, जल-अग्नि-वायु-आकाश, समुद्र-नदी, वृक्ष-लता, गिरि-पर्वत, दिशा-विदिशा सभीको मैं भगवत्स्वरूप मानना और देखना चाहता हूँ।

आप आध्यात्मिक दृष्टिसे पूछ रहे हैं, इसलिये मैं भी चेष्टा करता हूँ कि उसी दृष्टिसे उत्तर लिखूँ। भगवान‍्की दृष्टिसे चराचर अनन्त विश्व केवल भगवान‍्की ही अभिव्यक्ति है। जड, चेतन सभीके रूपमें भगवान् प्रकट हैं। सबमें भगवान‍्का दर्शन करते हुए यथायोग्य अपने कर्मके द्वारा भगवान‍्की पूजा करनी चाहिये और पूजा करनेवाले तथा पूज्यमें भी कोई भेद नहीं रखना चाहिये। भक्तकी दृष्टिसे इतना भेद अवश्य रहेगा कि भक्त पूजा करनेवाला है और अखिल विश्वके रूपमें भगवान् उसके पूज्य हैं। किसीसे वैर-विरोध और द्रोह-हिंसाका तो कोई प्रश्न ही नहीं। पूजामें त्रुटि न आने पाये, यह ध्यान अवश्य रहेगा।

आत्माकी दृष्टिसे सब आत्मा है। जैसे एक ही शरीरके सारे अंग—पैरसे लेकर मस्तकतक सब हमी हैं। कहीं भी चोट लगे, हमें लगती है, उसी प्रकार समष्टि आत्मा ही अभीष्ट जगत् है। इस अवस्थामें किसीका बुरा चाहना और करना बन ही नहीं सकता।

सत्य है, मुझे एकान्त अच्छा लगता है। मैं प्रतिदिन अधिक-से-अधिक समय दरवाजा बंद किये अकेला रहता हूँ। मैं अकेलेमें क्या करता हूँ—इसे तो भगवान् ही जानते हैं। चेष्टा करता हूँ कि लोकालयमें भी ठीक वैसा ही अनुभव करूँ, पर कर नहीं पाता, यह मेरी कमजोरी है।

ब्रह्माजीने भगवान् श्रीकृष्णका स्तवन करते हुए कहा—

तावद् रागादय: स्तेनास्तावत् कारागृहं गृहम्।

तावन्मोहोऽङ्घ्रिनिगडो यावत् कृष्ण न ते जना:॥

(श्रीमद्भागवत १०। १४। ३६)

‘श्रीकृष्ण! जबतक मनुष्य तुम्हारा जन नहीं हो जाता, तभीतक राग-द्वेष आदि चोर उसके पीछे लगे रहते हैं, तभीतक घर कैदखाना बना रहता है और तभीतक पैरमें मोहकी बेड़ियाँ जकड़ी रहती हैं।’ अतएव मेरे लिये कारागार और घरमें कोई अन्तर नहीं है। मुझे न जेल जानेकी इच्छा है, न जेलका डर है, न मैं ऐसा कोई दूषित कर्म करना चाहता हूँ, जिससे जेल जाना पड़े। सत्कर्म करते शरीरको जेलमें रहना पड़े तो कोई आपत्ति भी नहीं है; मैं उससे बचना भी नहीं चाहता। मोह-ममता है तो घर भी जेलखाना है; द्वन्द्व-समता है तो कहीं भी बन्धन नहीं है। सदा सर्वत्र भगवान् हैं और सबका सदा सर्वत्र भगवान‍्में निवास है।

इस आन्दोलनमें सम्मिलित होनेके कारणोंमें प्रधान कारण तो है भगवदिच्छा। मैंने स्वयं इच्छा भी नहीं की थी और प्रयत्न भी नहीं किया, अनायास ही इस प्रकारके कारण बनते गये कि मैं इसमें सम्मिलित हो गया और अब इसमें सम्मिलित होना मुझे कर्तव्य भी जान पड़ता है। अनशनकी बात मैंने किसीसे कही नहीं, पर जिन महात्माओंका इसमें सात्त्विक विश्वास है, उनको रोकनेवाला मैं कौन होता हूँ? मैंने किसीको रोका भी नहीं। अपने यहाँ लोकोपकारार्थ प्राण-दान करनेका, सर्वस्व-त्यागका विधान है और वह परम पवित्र है। वह आत्महत्या नहीं, तपस्या है और यथाधिकार कर्तव्य है। पर मैं वृद्ध, शरीरसे अस्वस्थ—मैंने अनशनका न कभी विचार किया और न अब भी मेरा विचार है।

यह बात लोग कह सकते हैं और लोगोंके द्वारा कही भी गयी है कि प्रदर्शनकारी लोग गायको बचानेका नाम लेकर गये थे और उन्होंने मनुष्योंकी हत्या करवा दी। मनुष्योंकी हत्याएँ हुईं, यह सत्य है। प्रत्येक वस्तुको आदमी अपनी-अपनी आँखसे देखते हैं; पर भ्रम भी होता है। यह भ्रम ही तो है कि हमलोग भगवद्रूप जगत‍्को भगवान‍्से भिन्न मान रहे हैं। इतना बड़ा भ्रम जब रह सकता है, तब प्रदर्शनकारियोंको मनुष्योंकी हत्या करनेमें कारण समझनेका भ्रम होना कोई आश्चर्यकी बात नहीं; पर सत्य कुछ और ही है। मैं स्वयं ७ तारीखके प्रदर्शनमें था। मैंने देखा है, सुना है, समझा है और उसके आधारपर निर्भ्रान्त रूपसे कह सकता हूँ कि ‘मनुष्योंकी हत्या करनेका आरोप प्रदर्शनके संचालकोंपर लगाना मिथ्या तो है ही, सर्वथा पाप है’। मनुष्योंकी हत्या हुई, कुछ मकानोंके अंश भी जले और टूटे-फूटे, कुछ मोटरें भी जलीं, पर यह काम किसके द्वारा हुआ, इसको वास्तवमें भगवान् ही जानते हैं। पर हुआ यह उन्हीं आसुरी सम्पदाके आश्रयी दुष्कृत लोगोंके द्वारा, उन्हीं मूर्खोंके द्वारा, जो अपना भविष्य नहीं सोचते और दूसरोंके अमंगलमें ही जिनको सुख मिलता है। वे कोई हों, भगवान् उनको सुबुद्धि दें; उनपर दया करें!

आपके कई प्रश्न मैं छोड़ देता हूँ। अन्तिम प्रश्नका उत्तर यह है कि मेरी समझसे इस हिंसा-काण्डको लेकर आन्दोलनके बंद करनेका कोई प्रश्न ही नहीं उठता। इस आन्दोलनके संचालक विशुद्ध शान्ति और अहिंसाको चाहनेवाले रहें; अहिंसा, प्रेम, शान्ति और आत्मभावनाको और भी बढ़ावें, सबका मंगल चाहें, सबका मंगल करें और समस्त देशवासियोंका आवाहन करें कि लोग मनसे, तनसे, धनसे—जो जिस योग्य हों—इस महान् पुण्यकार्यमें योग दें। भगवान् हमारे वर्तमान शासकोंको भी सुबुद्धि प्रदान करें, जिससे उनके अन्दर भी सौहार्द प्रकट हो, वे करोड़ों देशवासियोंकी अन्तर्व्यथा समझकर उसे मिटानेके लिये शीघ्र-से-शीघ्र सम्पूर्ण गोवंशकी हत्याको कानूनन बंद कर दें। आवश्यक हो तो विधानमें भी संशोधन किया जाय। साथ ही गो-पालन और गो-संवर्धनकी व्यवस्था भी की जाय। भगवान‍्की कृपा, भगवान‍्के मंगल-विधान, सबमें एक भगवान् विद्यमान हैं—इस बातपर विश्वास रखते हुए जबतक गोहत्या सम्पूर्णतया बंद न हो, शान्तिपूर्ण वैध साधनोंके द्वारा आन्दोलनका क्रम जारी रहना चाहिये और समस्त देशमें इसका विस्तार होना चाहिये। शेष भगवत्कृपा।