मन आत्माका सेवक है

प्रिय भाई, सप्रेम हरिस्मरण। मन-इन्द्रियोंके विषयोंकी ओर न जानेमें ही आश्चर्य है, जानेमें कोई आश्चर्य नहीं। न मालूम कितने जन्मोंका विषय-चिन्तन और विषय-सेवनका अभ्यास है। इससे घबराना नहीं चाहिये और बड़े बलके साथ साहसपूर्वक मनको विषयोंकी ओर जानेसे रोकना चाहिये। याद रखना चाहिये—मन आत्माका सेवक है, स्वामी नहीं, आत्माके बलसे ही बलवान् है, स्वयं उसमें कोई बल नहीं। आत्माकी अनुमतिसे ही वह कुछ कर सकता है, अन्यथा कुछ भी नहीं। यदि आत्मा बलपूर्वक उसे रोक दे और कह दे—‘तुम्हें मेरे कथनानुसार चलना होगा’ तो मनकी ताकत नहीं कि वह कुछ भी कर सके। अतएव मन-इन्द्रियोंको बलपूर्वक काबूमें रखनेका प्रयत्न करना चाहिये—यह एक उपाय है।

दूसरा उपाय है—भगवान‍्के शरण होकर भगवत्कृपाके बलसे मनको भगवान‍्में लगाना और विषयोंसे हटाना। यह निश्चय समझना चाहिये कि भगवत्कृपासे सब कुछ हो सकता है। जिसको मनुष्य सर्वथा असम्भव समझता है, भगवत्कृपासे आश्चर्यमयरूपसे वही सम्भव हो जाता है।

श्रीभगवान‍्के शरणकी भावना मनमें बढ़ाते हुए निरन्तर नाम-जप करनेकी चेष्टा रखो—सारे संशयोंके परदे फट जायँगे; सब अशान्तियाँ शान्त हो जायँगी एवं सब ओर सुख-ही-सुख दिखायी देगा। विश्वास करो और लग जाओ। यह अचूक दवा है—रामबाण है। फल तो सेवन करनेसे ही होगा।

‘हरिसे लागे रहु रे भाई, तेरी बिगड़ी बनत बनत बनि जाई।’