मान-प्रतिष्ठा और पूजा आदिसे बचना चाहिये
सप्रेम हरिस्मरण! आपका पत्र मिला। एक भाईके द्वारा आपके छपवाये हुए पत्रकी एक नकल मिली। आशा तो लोग यह करते हैं और करनी ही चाहिये कि इस प्रकार सद्भावनासे कोई कार्य किया जाय तो उसके लिये कृतज्ञतापूर्ण बधाई मिले; कम-से-कम उसकी सराहना तो की ही जाय। इसके बदले मैं आपको एक तरहका उपालम्भ दे रहा हूँ, मेरी स्थिति समझकर आप क्षमा करेंगे; बुरा तो मानेंगे ही नहीं। मुझे एक बहुत निकटके मित्रने लिखा है कि ‘जैसे निन्दाका आघात सहन किया जाता है, वैसे ही प्रशंसाका भी (यदि वह आपको आघात-सा लगे तो) सहन करना चाहिये। दोनों स्थितियोंमें मन अचंचल रहना चाहिये।’ बात बहुत ठीक है, पर मैं तो निन्दाका आघात सहन नहीं कर सकता। पुष्पोंका हार चाहता हूँ, जूतोंकी माला नहीं। इसलिये दोनों स्थितियोंमें समान कैसे रहूँ? प्रशंसा अच्छी लगती है, पर उसका विरोध इसीलिये होता है कि कहीं प्रशंसा सुन-सुनकर अपनेको ऊँचा न मान बैठूँ और अभिमान उत्पन्न होकर जीवन और भी न गिर जाय। इसी अपनी कमजोरीके कारण प्रशंसाका विरोध करता हूँ। यह तो सत्य ही है कि नाम-रूपके यश और पूजाकी इच्छा तो स्पष्टतया अज्ञान है। जो नाम-रूपको ही अपना स्वरूप मानता है, वही नाम-रूपकी प्रशंसा चाहता है। इस अज्ञानके सर्वथा दूर होनेपर ही समता आ सकती है और तभी स्तुति-निन्दा एवं मानापमानमें सम हुआ जा सकता है। साधकको तो मान-प्रतिष्ठा और पूजा आदिसे डरना ही चाहिये और उसके मित्र तथा हितैषियोंका भी यह कर्तव्य होता है कि वे उसको इस मीठे विषसे बचाते रहें। इसी दृष्टिसे आपसे भी तथा अन्यान्य अपने सभी हितैषी, स्नेह रखनेवाले मित्रों-बान्धवोंसे निवेदन किया जाता है कि वे शुद्ध भावसे भी मेरी रक्षाके लिये इस प्रकारके कार्य कृपापूर्वक न किया करें। शेष भगवत्कृपा।