मनुष्य-जीवनका प्रयोजन—भगवान् या भगवत्प्रेमकी उपलब्धि

प्रिय.....सप्रेम हरिस्मरण। आपका प्रेमभरा पत्र मिला। मेरे लिये तो आपने जो कुछ लिखा, सो प्रेमसे प्रेरित होकर ही लिखा है, सचमुच मनुष्य जो अपने जीवनको भगवान‍्से विमुख रहकर बिता देता है, यह बड़ी भारी भूल करता है। जीवन बीत जानेपर पश्चात्ताप होता है, हाय! जीवनमें मिला हुआ सुअवसर बड़ी बुरी तरहसे खो दिया!! वास्तवमें मनुष्य-जीवनका एकान्त प्रयोजन होना चाहिये—भगवान् या भगवत्प्रेमकी उपलब्धि। गंगाकी धारा जैसे निरन्तर अनवरत रूपसे समुद्रकी ओर जाती है—सारे बाधा-विघ्नोंको हटाती हुई एक लक्ष्यसे, वैसे ही हमारी चित्तवृत्तियाँ, हमारी चेष्टाएँ, हमारी चिन्ताएँ, हमारी क्रियाएँ, हमारे अनुभव—सब जाने चाहिये केवल भगवान‍्की ओर।

यह सत्य है, भगवत्प्रेमकी प्राप्तिके लिये अन्य सब प्रेमोंका त्याग कर देना पड़ेगा, सब कुछ उस प्रेमकी आगमें जला डालनेके लिये हँसते-हँसते तैयार हो जाना पड़ेगा और मौका पाते ही बिना चूके इस सब कुछको वैसे ही जला डालना चाहिये, जैसे बिना विलम्ब तत्परतासे हम मुर्देको फूँक देते हैं। मुर्दा फूँककर आत्मीयताके सम्बन्धसे हम रोते हैं? परंतु भगवत्प्रेमकी आगमें जब विषयोंका मुर्दा फूँका जाता है, तब तो रोने—विषाद और शोकसे रोनेके मूल कारण ही नष्ट हो जाते हैं। फिर कभी रोना भी होता है तो वह बड़े ही आनन्दका कारण होता है; क्योंकि उसकी उत्पत्ति आनन्दसे ही होती है। इसलिये केवल भगवान‍्का ही चिन्तन कीजिये। भगवान‍्से प्रार्थना कीजिये, हमारा तमाम जीवन—जीवनकी क्षुद्रसे क्षुद्र चेष्टा—भगवान‍्के लिये ही हो। पूर्ण हृदयसे हम भगवान‍्को ही भजें। दूसरेके लिये न मनमें स्थान हो और न दूसरोंकी सेवामें कभी तन लगे। तन-मन-धन—जो कुछ है, उन्हींका तो है; उनकी वस्तु उन्हींके अर्पण हो जाय। जो वस्तु उनको अर्पण हो जाती है, वही बचती है; वह हो जाती है अनमोल और वह हमें विपत्तिके अथाह समुद्रसे तार देती है।

प्रेममें खोना और अलग होना नहीं होता; खोने और अलग होनेमें भी पाना ही होता है—यही तो प्रेमका रहस्य होता है।

मेरा स्वास्थ्य अच्छा है, चिन्ता न करें। असली स्वास्थ्य तो भगवान‍्में स्थित हो जानेका नाम है। वह नहीं हो रहा है, इसीके लिये रोना और भटकना है। शेष भगवत्कृपा।