मीठा जहर

सस्नेह हरिस्मरण! पिछले दिनों तुम्हारे कई पत्र मिले थे। शरीरकी अस्वस्थता और ‘कल्याण’ के विशेषांकके कार्यमें अत्यन्त व्यस्त रहनेके कारण मैं उत्तर नहीं लिख सका, क्षमा चाहता हूँ। प्रारम्भसे अबतक मैंने तुमसे अहैतुक, अकृत्रिम और बड़ा मधुर स्नेह प्राप्त किया है। तुम निरन्तर मुझे देते ही रहे हो। अब तो तुम्हारी उस दानशीलताका प्रवाह बड़ा प्रबल हो गया है। प्रेमका कोई बदला हो ही नहीं सकता। अत: मैं सदा ही तुम्हारा ऋणी हूँ और ऋणी रहूँगा। तुमसे मैंने जो कुछ पाया है, वह अमूल्य है; वाणीसे उसका निर्वचन नहीं हो सकता।

मेरे नामपर ‘हीरक समारोह’ का जो तुमने प्रस्ताव किया है, उसमें भी तुम्हारी उस पवित्र स्नेह-सरिताका ही परिचय मिलता है। तुम्हारा यह विशाल आयोजन तुम्हारी दृष्टिमें बहुत छोटा-सा होनेपर भी वस्तुत: बहुत बड़ा है। मैंने पहले भी संकेत किया था, भैया! मैं बड़े दुर्बल मनका प्राणी हूँ। अपमान सह लेना, अपमानित होकर क्षुब्ध न होना उतना कठिन नहीं है, जितना मान प्राप्त करके उसे सह लेना और क्षुब्ध न होना कठिन है। विषाद और हर्ष दोनों ही क्षोभ हैं। मनमें दुर्बलता रहते हुए भी मुझे भगवान‍्ने बड़े सम्मानोंसे अबतक बचाया है। तुम्हारी जगह दूसरा कोई इस आयोजनका व्यवस्थापक होता तो मैं उसे डाँटकर भी अपनी रक्षा कर लेता, पर तुम्हारे सामने बोलना तुम्हारे स्नेहसे दबे हुए मेरे हृदयके लिये बड़े दुस्साहसका काम है। इसलिये बड़े विनीत भावसे तुमसे प्रार्थना करता हूँ, यह भीख माँगता हूँ कि तुम मुझे इस मीठे जहरसे बचाओ। तुम यह कहोगे—तुमने कहा भी था और तुम ऐसा मान भी सकते हो कि ‘इसमें तुम मेरा सम्मान नहीं करते, मुझे निमित्त बनाकर भगवान‍्ने जो काम करवाया है, उसीको सबके सामने रखकर प्रकारान्तरसे भगवन्महिमाका प्रचार करना चाहते हो।’ पर भाई, मैं वीतराग तो हूँ नहीं। यद्यपि नाम-रूप मिथ्या हैं, पर नामाभिमान तो है ही। इसलिये नाम साथ जुड़ा रहनेपर मैं क्षोभरहित निर्लेप रह सकूँ, ऐसा मुझे अपनेपर विश्वास नहीं होता। दूसरे, मैं जीवनभर इस प्रकारके आयोजनोंका विरोधी रहा हूँ और आज मेरे ही नामके साथ जुड़े हुए इस आयोजनका चेतना रहते हुए चुप रहकर भी समर्थन करूँ, यह मेरे लिये कहाँतक उचित है। इसपर तुम्हीं विचार करो—थोड़ी देरके लिये मेरे स्थानपर तुम आ जाओ और सोचो कि यह कार्य क्या मेरे समर्थनके योग्य है? मैं लोगोंसे कहता आया हूँ और अब भी कहता हूँ और यद्यपि मैं अभी ऐसा बन नहीं सका, पर चाहता तो हूँ कि सम्मानको मैं घोर विष समझूँ—‘सम्मानं कलयाति घोरगरलं नीचापमानं सुधा।’

तुम मुझे यह सत्परामर्श भी दे सकते हो कि ‘जब नाम-रूप मिथ्या हैं, तब किसी नामकी निन्दा-स्तुतिमें तुम अपनी निन्दा-स्तुति क्यों मानते हो’? बात ठीक है, मुझे नहीं माननी चाहिये, पर यह आयोजन भी तो नाम-रूपको साथ रखकर हो रहा है; नहीं तो आत्माके लिये किसी आयोजनकी आवश्यकता नहीं है। तुम मेरे हितैषी हो—सच्चे हितैषी हो, मित्र हो, सदा तुमने मेरा भला चाहा, भला किया और अब भी भला ही चाहते हो, पर मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम एक बार सोचकर देखो, तो पता लगेगा कि इसमें मेरा हित नहीं होगा। यद्यपि मैं इस स्थितिपर नहीं पहुँचा हूँ, पर यह सत्य तो है ही कि ‘नाम-रूप’, जो कल्पित और औपाधिक हैं, उनकी निन्दा-स्तुति और मान-अपमानमें आत्माका मान-अपमान और निन्दा-स्तुति मानना अज्ञान ही है और जो लोग प्रशंसा या अपना सम्मान चाहते हैं, वे नाम-रूपको सत्य मानकर मानो अज्ञानकी ही घोषणा कर रहे हैं। अतएव नाम-रूपको आत्माका स्वरूप कभी नहीं मानना चाहिये और इस दृष्टिसे नाम-रूपके मानापमानमें आत्माका कुछ बनता-बिगड़ता भी नहीं। पर मेरे-जैसा प्राणी, जो नाम-रूपके मोहसे मुक्त नहीं हुआ है, जिसको समता नहीं प्राप्त हुई है, उसके लिये तो मान और प्रशंसासे बचना ही इष्ट है और एक सच्चे मित्रके नाते मैं तुमसे यह अवश्य ही आशा रखता हूँ कि तुम इस बातको भलीभाँति समझकर मुझे इससे बचानेके लिये प्रस्तुत हो जाओगे और इस आयोजनका विचार सर्वथा छोड़ दोगे।

मैंने ऊपर जो कुछ लिखा है, यह न तो तुम्हारे सद्भावोंका अनादर करनेकी किसी कल्पनासे लिखा है और न अपनी बहुत साधुताके किसी अभिमानको लेकर ही लिखा है; केवल मित्रके नाते तुम्हारे सौहार्द और प्रेमके बल-भरोसेपर तुमसे प्रार्थना की है। आशा है, मेरी प्रार्थना तुम अवश्य स्वीकार करोगे। शेष भगवत्कृपा।