पतिका धर्म

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपने जो कुछ लिखा, उसका उत्तर यह है कि पत्नीके लिये पातिव्रतधर्म जैसे पालनीय है, वैसे ही पतिको भी एक पत्नीव्रत अवश्य आचरणीय है। पुरुष जो स्त्रियोंका धर्म बताते हैं, उन्हें धर्मपर आरूढ़ देखना चाहते हैं, सो तो उचित ही है। स्त्रीको पुरुषका धर्म न देखकर अपने धर्मका अवश्य पालन करना चाहिये, इसीमें उसका महत्त्व है। परंतु पुरुषोंको भी केवल परोपदेश करनेमें पण्डित न रहकर स्वयं धर्मका आचरण करना चाहिये। रामकी भाँति ‘जेहि सपनेहुँ परनारि न हेरी।’ एक पत्नीव्रती रहना तथा जगत‍्की स्त्रीमात्रको या तो माता जगदम्बाका रूप—‘स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु। त्वयैकया पूरितमम्बयैतत्’ (दुर्गा० ११।६) मानना चाहिये या उम्रके अनुसार माता, बहन तथा कन्या समझना चाहिये। ऐसा करनेसे ही पुरुष स्त्रियोंको भी ठीक उपदेश देने और सुपथपर चलानेके अधिकारी हो सकते हैं। आप कृपया मेरे इस निवेदनपर ध्यान दीजियेगा। आपकी सुलक्षणा धर्मपत्नी बड़े नियम-संयमसे रहती हैं, आपकी सब प्रकारसे सेवा करती हैं, पर कभी-कभी नम्रताके साथ आपको जीवनमें सदाचारकी रक्षाके लिये समझाती हैं; सो यह तो आपका सौभाग्य है, जो आपको ऐसी पत्नी मिली हैं। उनकी बातका बुरा न मानकर उसका आदर करना तथा तदनुसार आचरण करना चाहिये। पुरुषके लिये पत्नीके समान मित्र और कोई नहीं है। उन्हें आप मित्र मानिये। शेष भगवत्कृपा।