पत्नीका परित्याग उचित नहीं है

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। पत्र मिला। उत्तरमें निवेदन है कि अपने एक सहकर्मीकी राक्षसी वृत्तिपर क्षोभ होना तो स्वाभाविक ही था, परंतु दैवी-शक्तिकी प्रेरणासे आपने डूबकर आत्महत्या नहीं की और ‘पापका प्रायश्चित्त आत्महत्या नहीं, पापका परिष्कार और पुन: न होने देनेका निश्चय ही है’—यह बुद्धि आपको आ गयी, सो बहुत अच्छा हुआ। वास्तवमें ऐसी ही बात है।

सज्जन नवयुवकको पत्नीका प्रयत्न करके यथासाध्य प्रेम-स्नेहके सद्‍‍व्यवहारसे उसे सुधारना है। निराश न होकर भगवत्कृपाके आश्रयसे सत्प्रयास जारी रखना है। भगवान‍्से विश्वासपूर्वक प्रार्थना करना है।

पत्नी-परित्याग वास्तवमें पाप ही है, यथासाध्य इससे बचना चाहिये। भरण-पोषण तो सबका भगवान् ही करते हैं, परन्तु भगवान‍्की दी हुई जिम्मेदारीको निबाहना हमारा कर्तव्य है।

भगवत्प्रार्थना, सद्‍‍व्यवहार तथा सौम्य वचनोंसे बहुत कुछ सुधार हो सकता है। एकान्तवास साधनके लिये बीच-बीचमें किया जाय तो अच्छा है; परन्तु ऊबकर या खीझकर नहीं।

मनुष्य अपनेमें कितने ही दोष होनेपर कभी अपनेसे घृणा नहीं करता; कभी अपना त्याग नहीं करता तथा कभी अपना अहित नहीं चाहता—करता। यही भाव ठीक दूसरोंके प्रति हमारा होना चाहिये। शेष भगवत्कृपा।