प्रभो! तेरी मंगल इच्छा सफल हो

प्रिय......., सप्रेम राम राम!

आपके कई पत्र मिले, तार मिले, परन्तु मैं नहीं आ सका; इससे यह न समझियेगा कि मेरा आपसे प्रेम कम है। यद्यपि मैं परम प्रेमी होनेका दावा भी नहीं करता; किन्तु बहुत बार ऐसा भी होता है कि प्रेमी समीप नहीं आ सकता, आना नहीं चाहता; उसे दूर रहनेमें ही प्रेमका विकास प्रतीत होता है। अधिक मैं कुछ भी नहीं लिख सकता। यदि आप इस बातपर कुछ भी विश्वास रखते हों कि ‘मैं अपने मनमें आपके प्रति जरा-सा भी प्रेम रखता हूँ, तो आप मुझे अपने पास ही समझिये।’ शरीरकी अपेक्षा मनसे मैं आपके पास अधिक हूँ, जो शायद शरीरसे पास रहनेपर नहीं रह सकता।

दवासे आपकी तबियतमें कुछ सुधार लिखा, सो बड़े आनन्दकी बात है। शारीरिक व्याधि मिटना आनन्द ही है; परंतु मेरी समझसे आपको परमात्मापर भरोसा करके निश्चिन्त रहना चाहिये।

‘जीवन-मरण चरणके चाकर, चित्त भावना हीन।

हरि-चरणाश्रित निर्भय-निर्भर, प्रेमोदधिमें लीन॥’

जो अपनेको प्रभुके चरणोंमें समर्पित कर देता है, उसमें प्रधानतया दो बातें आ जाती हैं—निर्भयता और निश्चिन्तता। मृत्युकी विभीषिका भी उसे नहीं डरा सकती और स्वर्ग, नरक, सुगति, दुर्गति या मोक्षकी चिन्ता उसे नहीं रहती। ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’—भगवान‍्की इस अमर घोषणाको वह निरन्तर सुना करता है और पद-पदपर इसका प्रमाण भी पाता है। ईश्वरकी सत्तासे बाहर कोई कहीं नहीं जा सकता। उसकी सत्तासे बाहर कोई देश ही नहीं है; तब फिर किसी भी देशमें और किसी भी वेषमें क्यों न रहें, चिन्ताकी कौन-सी बात है? वह प्रभु जिस वेषमें हमें रखना चाहें, उसीमें प्रसन्नतासे रहना ही हमारा कर्तव्य है। उसकी इच्छाके विरुद्ध हम किसी वेषविशेषके लिये आग्रह ही क्यों करें? ऐसा आग्रह करना तो उस मंगलमयकी मंगल-इच्छापर अपनी समझका बाँध बाँधने जाना है, उस परम प्रेमीके प्रेम-विधानपर संदेह करना है। हम जो उसके नित्य सहचर हैं; उसीके दिये हुए किसी खास देश-वेषको थोड़े दिनोंके लिये पाकर उसीमें तन्मय होकर हम असली बातको भूल रहे हैं; यह हमारा दुर्भाग्य है। यह देश-वेष तो उसके किसी कार्यके लिये हमें मिला है; यह बपौती थोड़े ही है, नित्य थोड़े ही है। उसने जिस कार्यके लिये हमें निमित्त बनाया है, उसके पूरा होते ही वह अपने दूसरे कामके लिये किसी दूसरे देश-वेषमें हमको बदल सकता है। इसमें शोकका प्रसंग ही क्या है? जब हम उसके हैं, तब वह जो कुछ करे, उसीमें हमारा मंगल है। यह शरीर तो हमारा रूप नहीं है, यह तो उसका दिया हुआ वेष है। यह नहीं—दूसरा सही। इसीमें ममत्व क्यों? इसीके कल्पित सम्बन्धियोंमें अपनापन कैसा? उचित तो यही है कि अपनी इस भूलको मिटाकर हम उसीको आत्मसमर्पण कर दें; अपनेको सम्पूर्ण रूपसे उसके चरणोंमें डाल दें। फिर वह जो कुछ करे सो अच्छा है। लम्बी बीमारी प्रदान करके तो उसने मानो अपना प्रियदूत हमारे पास भेज दिया है कि तुम्हारा यहाँका काम हो चुका, अब तुम्हें जल्दी बुला लिया जायगा। प्रभुका—प्रियतमका दूत तो हमारी प्रिय सामग्री है; उसका हमें स्वागत करना चाहिये—‘अहा! इसने बड़ी कृपा की जो प्रियतमका सन्देशा सुनाया। प्रियतमने याद किया तभी तो इतने पहलेसे अपना दूत भेज दिया है। मैं प्रियतमको भूल रहा था; उन्होंने दूत भेजकर प्रेमकी स्मृति ताजी कर दी; अब तो उन्हें कैसे भूलूँ। भाई दूत! समीप रहो और सर्वदा अपनी समीपतासे उस प्यारेकी याद दिलाते रहो। तुमने बड़ी ही कृपा की।’

शरीर तो चाहे जब जा सकता है। हट्टे-कट्टे आदमी हृदयगति रुक जाने (हार्ट फेल)-से मर जाते हैं; वे बेचारे एक प्रकारसे इस दूतके सन्देश-सुखसे वंचित रह जाते हैं। मान लीजिये—कोई आदमी बिना ही बीमारीके पलभरमें चल बसा और चलते समय भगवान‍्को स्मरण भी नहीं कर सका तो उसकी क्या गति होगी। पर जिसको भगवान् पहलेसे चेतना देते हैं, वह तो भाग्यशाली है।

वह प्रभु बड़ा दयालु है; उसका कोई भी कार्य दयासे रहित और अन्यायपूर्ण नहीं होगा; हमें अपनी बुद्धिके दोषसे वह प्रतिकूल या कठोर भासता है। आपको चाहिये कि आप अपने-आपको उसके चरण-कमलोंमें सर्वभावेन समर्पण कर दें। वास्तवमें आप उसके हैं ही। किसी प्रकारकी चिन्ता न करें। मंगलमयकी मंगल-इच्छामें सहायक बन जायँ। उसके साथ मिलकर उसकी जय मनावें—‘प्रभो! तेरी मंगल-इच्छा सफल हो! यह मन कदापि तेरी मंगल-इच्छामें प्रतिकूलता न देखे। सर्वथा-सर्वदा और सर्वत्र उसके अनुकूल ही रहे।’ शेष भगवत्कृपा।