प्रभु सदा जीवके साथ रहते हैं
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण।
आपका पत्र पढ़कर बड़ी व्यथा हुई। संसारमें बिना कारणके कुछ भी नहीं होता। सभी कार्योंके पीछे कोई-न-कोई कारण अवश्य होता है। अस्तु, आपके ऊपर अनिच्छापूर्वक आयी हुई यह विपत्ति भी किसी पूर्वकृत दुष्कृतका ही परिणाम है? सम्भव है, पूर्वके किसी जन्ममें आपके द्वारा इस प्रकारका कोई कृत्य हो गया हो, जिसका फल अब भोगना पड़ रहा है।
मनुष्य अच्छा करे अथवा बुरा—प्रभु उसपर सदा अपनी अहैतुकी करुणा एवं कृपा बरसाते रहते हैं। जीवनका एक क्षण भी उनकी कृपाके बिना खाली नहीं गुजरता। अच्छी-बुरी सभी स्थितियोंमें प्रभु जीवके साथ रहते हैं। अत: इस संकटग्रस्त स्थितिमें भी वे आपके साथ हैं—निरन्तर साथ हैं। आप उनकी ओर देखिये; उन्हें अविराम स्मरण कीजिये, आपका सारा दु:ख विलीन हो जायगा और आप सदाके लिये सुखी हो जाइयेगा।
जिस जीवको प्रभु अपनाना चाहते हैं, उसको वे परिशुद्ध करना आरम्भ कर देते हैं। पूर्वकृत पुण्य एवं पापोंके खातेको पूरा करनेके लिये ही प्रभु सुख एवं दु:खका कर्मानुसार विधान करते हैं। उनका कोई भी विधान कृपासे खाली नहीं होता। अस्तु, प्रापंचिक बाधाओंसे निश्चिन्त होकर प्रभुकृपासे मिले हुए इस समयका तथा परिस्थितिका सदुपयोग करें। उनके निरन्तर स्मरणसे अपने-आपको कृतार्थ कीजिये। वे जैसे भी रखें, प्रसन्नतापूर्वक रहें। दु:ख केवल एक ही बातका मनमें हो कि प्रभुका स्मरण निरन्तर क्यों नहीं होता। स्वल्प स्मरणमें सन्तोष न करें। यदि मनने सचमुच प्रभुको पकड़ लिया हो तो सचमुच आप निहाल हो जाइयेगा। जीवन सदा-सदाके लिये सुखी हो जायगा। फिर तो इस कारागारसे क्या कालगतिसे चलनेवाले जन्म-मरणके कारागारसे ही आप सदा-सदाके लिये छूट जायँगे। शेष भगवत्कृपा।