प्रकृतिकी लीलाके द्रष्टा बनिये
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। उत्तरमें निवेदन है कि आत्मा—पुरुष सुख-दु:ख, जन्म-मरणादि द्वन्द्वोंसे रहित नित्य शुद्ध-बुद्ध है। परंतु ‘प्रकृतिस्थ’ होनेके कारण प्रकृतिमें होनेवाले परिवर्तन और विकार पुरुषमें दिखायी देते हैं और वह भी ऐसा ही अनुभव करके सुख-दु:ख भोगता तथा जन्म-मरण एवं अच्छी-बुरी योनियोंके चक्रमें पड़ा रहता है—
पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान् गुणान्।
कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥
(गीता १३। २१)
‘प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिसे उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थोंको भोगता है और इन गुणोंका संग ही उसके अच्छी-बुरी योनियोंमें जन्म लेनेमें कारण है।’
प्रकृतिकी चंचलतामयी लीलामें जब पुरुष स्वयं जाकर मिल जाता है, तभी यह सब होता है। इससे छूटनेका उपाय है—वह ‘स्व-स्थ’ (आत्मस्थ) होकर प्रकृतिकी लीलाका द्रष्टा बन जाय और प्रकृतिके समस्त कार्योंको दृश्य बनाकर देखने लगे। जहाँ कर्ता-भोक्ता न रहकर द्रष्टा बना कि चटुला प्रकृति-नटीका ताण्डव नृत्य अपने-आप बंद हो जायगा। द्रष्टाके आसनपर विराजमान आत्मस्थ अप्रलुब्ध भावसे देखनेवाले पुरुषके सामने प्रकृति दृश्य बनकर लीला नहीं कर सकती; उसकी लीला बंद हो जाती है। फिर प्रकृतिके द्वन्द्वोंका द्रष्टा पुरुषपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वह प्रकृतिके गुणोंसे अतीत होकर समताका अनुभव करता है। उसीके लिये कहा है—
उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते।
गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेंगते॥
समदु:खसुख: स्वस्थ: समलोष्टाश्मकांचन:।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुति:॥
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयो:।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीत: स उच्यते॥
(गीता १४।२३—२५)
‘‘तटस्थ उदासीन द्रष्टाकी भाँति स्थित वह पुरुष प्रकृतिके गुणोंके द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता। गुण ही गुणोंमें बर्त रहे हैं—यों समझता हुआ वह परमात्मामें एक रूपसे स्थित है, उस स्थितिसे कभी चलायमान नहीं होता। वह स्व-स्थ (स्व—आत्मामें स्थित) दु:ख-सुखको, मिट्टी-पत्थर-स्वर्णको, प्रिय-अप्रियको और अपनी निन्दा-स्तुतिको समान समझनेवाला धीर पुरुष मान-अपमान, मित्र-शत्रुको समभावसे देखता है। ऐसा समस्त आरम्भोंका त्यागी—किसी भी आरम्भमें कर्तापनके अभिमानसे रहित हुआ पुरुष ‘गुणातीत’ कहलाता है।’’
तदनन्तर जब प्रकृतिकी लीलाका ‘दृश्य’ नहीं रहता, तब वह द्रष्टा भी नहीं रहता। वह नित्य अपने सच्चिदानन्दस्वरूपमें स्थित रहता है। यही जीवन्मुक्तावस्था है। शेष भगवत्कृपा।