प्रत्येक स्थितिको सिर चढ़ाओ
प्रिय भाई, सप्रेम हरिस्मरण। तुम्हारा पत्र मिला। तुम्हारे प्रेमका मैं सदा ही ऋणी हूँ।
तुम्हारी आर्थिक स्थितिके समाचारोंसे खेद होता है। भैया! भगवान्के विधानको आनन्दके साथ सिर झुकाकर ग्रहण करनेमें ही शान्ति है। अवश्य ही पुरुषार्थके बलसे अपनी बुरी स्थितिके साथ लड़कर उसे बदल डालना बहादुरी है। परंतु यह बहादुरी भी किसी संयोगसे ही मिलती है—मनुष्य तो भ्रमवश बहादुरीका अभिमान कर बैठता है। परंतु यह सफलता भी तो विनाशी ही है। कौन-से करोड़पति-अरबपति धनको अपने साथ ले गये? वही कफन, वही काठ और साढ़े तीन हाथ जमीन सभीके शरीरोंको मिली। साथ गये अपने कर्मोंके अच्छे-बुरे संस्कार। भैया! सच्चा धनी वह है, जो सदाचारका, सद्भावोंका, सद्विचारोंका, सद्गुणोंका और भगवान्के भजनका धनी है, बाकी तो सब निर्धन ही हैं। निर्धन ही नहीं, घरमें आग लगाकर तमाशा देखनेवाले हैं, मनुष्य-देहको व्यर्थ खोनेवाले हैं; जिनको आगे चलकर महान् पश्चात्ताप करना पड़ेगा।
इसलिये मेरा तो यह अनुरोध है कि मानके बोझको उतारकर सादगीसे रहो, यथासाध्य ऋण उतारनेकी चेष्टा करो, परंतु ऐसा काम न करो जिससे ऋण और भी बढ़ सकता है। भगवान् चाहेंगे तो कोई संयोग ऐसा लग जायगा, जिससे ऋण उतरना भी सम्भव हो जायगा। अपनेको उनकी इच्छापर छोड़ दो और उनका आश्रय लेकर उनके भजनमें लग जाओ। ज्यों-ज्यों भजन बढ़ेगा त्यों-त्यों तुम्हें शान्ति मिलेगी। भजनसे वह शान्ति और वह परम आनन्द मिलता है, जो बड़े-से-बड़े योगियोंकी कल्पनामें भी नहीं आ सकता। तुम इस बातपर विश्वास करो।
जग जाचिअ कोउ न, जाचिअ जौं,
जियँ जाचिअ जानकी-जानहि रे
जेहि जाचत जाचकता जरि जाइ,
जो जारति जोर जहानहि रे॥
(कवितावली, उत्तरकाण्ड—२८)
भगवान् पर विश्वास रखो, उनकी दी हुई प्रत्येक स्थितिको सिर चढ़ाओ, उनके बनो। फिर जब योगक्षेमकी जिम्मेवारी वे ले लेंगे, तब फिर तुम्हारे समान कोई सुखी नहीं होगा। शेष भगवत्कृपा।