प्रत्येक व्यवस्थामें भगवान्का वरदहस्त
प्रिय भाई! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। भगवान्ने श्रीमद्भगवद्गीतामें इस लोक अथवा भोग-जगत्के सम्बन्धमें तीन शब्दोंका प्रयोग किया है—‘असुख’, ‘दु:खालय’ एवं ‘दु:खयोनि’—‘यहाँ वास्तविक सुख है ही नहीं, यह दु:खका आलय है और दु:खोंकी उत्पत्तिका क्षेत्र है।’ ऐसे भोग-जगत्में हम सुख ढूँढ़ रहे हैं और जैसे तपती हुई बालूकी लहरोंपर सूर्यकी किरणें पड़नेसे प्यासे हरिणको जलका भ्रम हो जाता है, उसी प्रकार हमें भी भोगोंमें सुख दिखायी देता है। पर जैसे हरिण वहाँ पहुँचनेपर विशेष संतापके सिवा और कुछ नहीं पाता, उसी प्रकार जगत्के अनुकूल भोगोंके प्राप्त होनेपर दूरसे दिखायी देनेवाले सुख नष्ट हो जाते हैं और कुछ ही समय बाद विशेष संतापकी अनुभूति होती है। भगवान्ने इसीलिये कहा—‘सुख चाहते हो तो मां भजस्व—मुझे भजो।’ सुखरूप एकमात्र भगवान् हैं; भगवान्से रहित जगत् सर्वत्र दु:खमय है; वास्तवमें साधकोंकी दृष्टिसे ये दु:ख भी भगवान्के ही प्रसाद हैं। कर्म-जगत्की व्यवस्थाके अनुसार दु:ख बुरे कर्मका फल है। अतएव दु:खमें उस बुरे कर्मका नाश होता है, दु:खमें भगवान्की स्मृति होती है, दु:खसे मनुष्यके मनमें वैराग्य होता है और दु:ख भगवान्की ओर बढ़नेमें सहायता करता है। श्रीमद्भागवतमें कुन्तीदेवीने अपने सगे भतीजे सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीकृष्णसे वरदान माँगा था कि ‘आप हमलोगोंको बार-बार विपत्ति दिया करें। बार-बार विपत्तिसे स्मृतिरूपसे आप मिलते हैं और आपका मिलना मोक्षदायक होता है’—
विपद: सन्तु न: शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्॥
(१। ८। २५)
अतएव आपपर जो विपत्ति आयी है, जागतिक दृष्टिसे अवश्य ही वह सर्वथा अवांछनीय है, पर भगवान्का मंगलमय-विधान कभी अमंगलकारी हो ही नहीं सकता। छोटे बच्चेके किसी अंगका ऑपरेशन होनेपर वह उसे अंगका कटना समझकर रोता है। ऑपरेशन करनेवाले सर्जनके मनमें उसके रोगनाशका उद्देश्य है और वह उसके हितके लिये ही ऑपरेशन करता है। घरवाले, जो समझदार हैं, वे भी ऑपरेशनको दु:ख नहीं मानते, सुख मानते हैं; वे सोचते हैं कि रोगका नाश हो रहा है; किंतु यहाँके सर्जनसे भूल हो सकती है, उसके उद्देश्यमें भी प्रमाद हो सकता है; पर सर्वशक्तिमान् सर्वज्ञ हमारे परम सुहृद् भगवान् हमारे लिये जो मंगल-विधान करते हैं, वह चाहे दु:ख हो, दारिद्रॺ हो, रोग हो या मृत्यु हो, अवश्य ही हमारे आत्माके लिये वह कल्याणकारी होता है। इसमें हमें विश्वास रखना चाहिये और यही सत्य है।
आप भगवान् पर विश्वास करते हैं, इसीलिये मैं ऐसा लिख गया, नहीं तो किसी विपत्तिमें पड़े हुए आदमीको उसके साथ सहानुभूतिपूर्ण रोने-कलपनेकी बात ही लिखी जाती है, हालाँकि वह वास्तवमें है धोखा ही। आप इस सत्यको पहचानिये और भगवान्के प्रत्येक मंगल-विधानमें उनका कृपापूर्ण वरदहस्त देखकर प्रसन्न होते रहिये। आत्मामें न किसी वस्तुका ग्रहण है न त्याग, न संयोग है न वियोग, न मान है न अपमान, न नीरोगता है न रोग, न जन्म है न मृत्यु। इसमें मोहित होना और इसके सम्पर्कमें आकर दु:खी-सुखी होना वास्तवमें अज्ञान है। जगत् तो द्वन्द्वात्मक ही है। यह द्वन्द्व जगत्से कभी नहीं मिट सकता; क्योंकि द्वन्द्वोंको लेकर ही जगत् है। सारे द्वन्द्वोंमें समान भावसे भरे हुए एक भगवान् हैं; वे ही परम सत्य हैं। केवल उन्हींसे सम्बन्ध रखकर हर अवस्थामें प्रसन्न रहना चाहिये। शेष भगवत्कृपा।