प्रायश्चित्त
प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके द्वारा क्रोधावेशमें एक बार माताजीपर हाथ उठाया गया तथा उन्हें कठोर वचन भी कहे गये, सो यह निश्चय ही बहुत बुरा हुआ। पर आपको इससे इस समय घोर पश्चात्ताप हो रहा है, यह आपके लिखे शब्दोंसे प्रत्यक्ष प्रकट है। अपराध तो बन ही गया, वह अब वापस हो नहीं सकता। आपने माताजीसे क्षमा-प्रार्थना कर ली और जीवनमें फिर कभी ऐसा न करनेका निश्चय कर लिया, सो बहुत अच्छा किया। अब भी आपको इस अपराधके कारण जो भीषण जलन हो रही है और आप अपने जन्म तथा अस्तित्वको जिस तरह धिक्कार रहे हैं तथा बुरे-से-बुरा फल भोगनेको प्रस्तुत हैं, इसके सिवा और आप क्या कर सकते हैं? सच्चे हृदयका पश्चात्ताप, दीनभावसे अनन्य विश्वासयुक्त भगवान्की शरणागति समस्त पापोंका समूल नाश करनेवाली है। आपने गीताके जो तीन श्लोक लिखे हैं, इन्हींके अनुसार भगवत्कैंकर्यका जीवन बिताइये। भगवान्की कृपासे आप पाप-तापसे मुक्त हो जायँगे। निरन्तर भगवान्के स्मरणका अभ्यास करते हुए जीवनमें दैन्यभावका अवलम्बन करके सत्कर्मोंमें लगे रहिये। माताजी हों तो अत्यन्त दीन होकर उनकी सब प्रकारसे यथासाध्य अधिक-से-अधिक सेवा कीजिये। शेष भगवत्कृपा।