प्रेम तथा नम्रतासे फिर समझाइये

प्रिय महोदय! सप्रेम हरिस्मरण। पत्र मिला। आप ईश्वरविश्वासी, सात्त्विक, संतोषी तथा संकोची वृत्तिके पुरुष हैं, सो ये तो आपके गुण हैं। आपने अपने धनसे मकान बनवाया था और उसमें बड़े भाई एवं उनके परिवारको कुछ समयके लिये रखा था, पर वे अब जा नहीं रहे हैं, कहनेपर भी ध्यान नहीं देते—यह वास्तवमें उनकी ज्यादती है। उन्हें नम्रतासे तथा प्रेमसे फिर समझाइये। आपसे न समझें तो पास-पड़ोसके भले आदमियोंसे कहलवाइये। नितान्त असम्भव होनेपर, मनमें राग-द्वेष न रखते हुए कानूनी सलाह लेकर तदनुसार उचित कार्यवाही भी की जा सकती है। सुन्दरकाण्ड, हनुमानचालीसाका पाठ करते हैं, सो करते रहिये। ‘ॐ गं गणपतये नम:’ इस मन्त्रकी पाँच मालाका जप इसी उद्देश्यसे करना शुरू कर दीजिये। भगवत्कृपाका भरोसा कीजिये। उनकी कृपासे सब कुछ सहज सम्भव है। शेष भगवत्कृपा।