सबमें एक ही आत्मा समझकर सबका हित करना है
प्रिय महोदय! सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। इस समय देशमें जो धर्मके नामपर भयानक विध्वंसक हिंसाकाण्ड हो रहे हैं, इससे आपको दु:ख होता है, सो ठीक ही है। प्रत्येक विचारशील पुरुषको दु:ख होता होगा। वास्तवमें अध्यात्मजगत्का शिरोमणि भारत—जो प्रत्येक वस्तुपरिस्थितिमें आत्मा या ईश्वरको देखकर आत्म-कल्याणके कार्य करता था—आज पथभ्रष्ट हो रहा है। सच्ची बात तो यह है कि हम पहले आत्मा हैं, फिर मनुष्य हैं, फिर हिन्दू-मुसलमान-ईसाई आदि हैं। फिर अमुक देशवासी हैं, फिर अमुक जातिके हैं, अमुक प्रदेशके हैं, अमुक परिवारके हैं, फिर हम अमुक व्यक्ति हैं। अतएव जिसमें आत्मापर आघात होता हो, वैसा कोई भी कार्य कभी भी व्यक्तिगत स्थितिसे लेकर मनुष्यकी स्थितितक, किसी भी स्थितिमें नहीं करना चाहिये। मानव, पशु-पक्षी, हिन्दू-मुसलमान, ईसाई, भारतीय-पाश्चात्यदेशीय, मालिक-मजदूर, ब्राह्मण-चाण्डाल, पंजाबी-बंगाली, सगे-सम्बन्धी, पिता-पुत्र, पति-पत्नी—सभीमें एक आत्मा है। नाटकके पात्रकी भाँति अपने जिम्मेका काम करना है—सावधानीके साथ भलीभाँति; पर कहीं भी, किसीमें भी राग-द्वेष न रहे। जिसमें सबका हित हो, सब सुखी हों, ऐसा ही कार्य करना चाहिये। पर जब मनुष्यका ‘स्व’ अत्यन्त सीमित हो जाता है, तब वह छोटे-छोटे स्वार्थमें सीमित होकर और उसमें अपनी भलाई समझकर ऐसे-ऐसे कार्य करता है, जिससे न उसका भला होता है, न दूसरे किसीका; वरं दु:ख-अशान्ति बढ़ते हैं, जीवन अस्त-व्यस्त तथा संत्रस्त रहता है, पापमें ही कर्तव्य-बुद्धि एवं गौरव-बुद्धि होनेके कारण पापसे छूटनेकी कभी इच्छा ही नहीं होती और नये-नये पाप बढ़ते रहते हैं। अशान्तिमें ही मृत्यु होती है और मृत्युके बाद नरक-यन्त्रणा भोगनी पड़ती है। पर आज तो ‘कुएँ भाँग पड़ी है’। विद्वान्-नेता, उपदेशक-शासक, आचार्य-विद्यार्थी, धनी-मजदूर प्राय: सभी मोहजनित सीमित स्वार्थवश इसी ओर जा रहे हैं। पता नहीं, क्या परिणाम होगा। जो बचे रह सकें, उन्हें बचे रहकर तथा सम्भव हो तो भगवत्कृपाका आश्रय लेकर फैलते हुए विष-प्रवाहको रोकनेका यथासाध्य प्रयत्न करना चाहिये। शेष भगवत्कृपा।