सबमें एक ही भगवान् हैं
प्रिय भाई! सप्रेम हरिस्मरण। तुम्हारा पत्र मिला। यह सत्य है कि हिंदू-सनातन-धर्ममें अनन्त देवताओंकी पूजा है, उनके भिन्न-भिन्न नाम, रूप तथा पूजा-पद्धति हैं, पर ध्यानसे देखोगे तो पता लगेगा कि हिंदूधर्म ‘बहुदेववादी’ नहीं है। एक ही परम सत्य परम तत्त्वके, जो ब्रह्म, परमात्मा, भगवान् आदि अनेक नामोंसे पुकारा जाता है—
‘ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते।’
(भागवत २। १०। ७)
ये असंख्य विधि लीलारूप हैं। हिंदूधर्मके विभिन्न ईश्वर या देवताओंके स्वरूप ही नहीं—ईसाई, मुसलमान, पारसी आदि जगत्के सभी आस्तिक धर्मों, सम्प्रदायोंका आराध्य-उपास्य तत्त्व उस एक ही सत्य परम तत्त्वकी अभिव्यक्ति है। इस प्रकार हिंदूधर्मके परम तत्त्वको समझनेवाले पुरुषका किसीके साथ भी विरोध नहीं है। विभिन्न पूजन-पद्धतियों, विभिन्न आचार-विचारों तथा साधन-प्रणालियों—सभीको वह अपने इष्टदेवकी अभिव्यक्ति तथा उन्हींकी पूजा मानता है। वह किसीका विरोध नहीं करता और अपने इष्टदेव तथा साधन-प्रणालीको छोड़ता नहीं। सबमें अपने ही भगवान्को समझकर वह सदा सबके हित-सुखकी बात सोचता है, सदा सबका सुख-हित-सम्पादन करता है।
गोस्वामीजीने कहा है—
उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।
बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥
सीय राममय सब जग जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
श्रीमद्भागवत (११। २। ४१)-में कहा है—
खं वायुमग्निं सलिलं महीं च
ज्योतींषि सत्त्वानि दिशो द्रुमादीन्।
सरित्समुद्रांश्च हरे: शरीरं
यत् किंच भूतं प्रणमेदनन्य:॥
इसीलिये हमारा नारा है—
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग् भवेत् ॥
शेष भगवत्कृपा।