सबमें एक ईश्वर या आत्माको देखनेपर ही दु:खनाश

प्रिय महोदय! सादर हरिस्मरण। कृपापत्र मिला। आपने लिखा, सो ठीक है। पर वास्तवमें सारे दु:ख तथा बन्धनका कारण है—शरीर और नाममें ‘अहंता’ तथा प्राणिपदार्थोंमें ‘ममता’। शरीर तथा नाम दोनों ही ‘मैं’ नहीं हैं, पर इनमें मिथ्या ‘मैं’ पन इतना गाढ़ा हो गया है कि उसको लेकर यह मेरा देश, यह मेरी जाति, यह मेरा मजहब, यह मेरा मत, यह मेरी पार्टी, यह मेरा घर, यह मेरा धन, यह मेरा अधिकार आदिके रूपमें इतने मिथ्या ममताके बंधन हो गये हैं और उनमें इतना अधिक ‘राग’ हो गया है कि रात-दिन उन्हींकी चिन्तामें ग्रस्त रहना पड़ता है। इस मिथ्या महत्त्वको लेकर हमारा ‘स्व’ स्वाभाविक ही संकुचित होते-होते केवल एक व्यक्तिमें, शरीर तथा नाममें आकर केन्द्रित हो गया है। यही कारण है कि आज हम जीव-जगत् , विश्व, देश और जनताके हितको ही नहीं, अपने परिवारके अन्यान्य सदस्योंके हितको भी भूलकर केवल व्यक्तिगत—अपने ‘शरीर तथा नाम’ का ही हित-साधन करनेमें लगे हैं। यह निश्चित है कि जितना ही ‘स्व’ सीमित होगा, उतना ही ‘स्वार्थ’ निम्न स्तरका होगा। सीमित ‘स्व’ वाला व्यक्ति दूसरोंका हित न देखकर ही नहीं, उनका अहित करके भी अपना हित-साधन करना चाहेगा और यों जब सभी लोग या अधिकांश लोग दूसरोंका अहित करके अपना हित करनेमें लगेंगे, तब किसीका भी हित न होकर सभीका अहित होगा; कलह, संघर्ष, उपद्रव, क्रोध, वैर, हिंसा स्वाभाविक कार्य हो जायँगे। आज सर्वत्र यही हो रहा है। इसीसे आज देश-देशमें, धर्म-धर्ममें, प्रान्त-प्रान्तमें, जाति-जातिमें, पार्टी-पार्टीमें, पड़ोसी-पड़ोसीमें, घर-घरमें और व्यक्ति-व्यक्तिमें लड़ाई है तथा मानवता मरी जा रही है। यह पाप उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है। पापका फल अशान्ति तथा दु:ख तो निश्चित होगा ही।

अतएव इससे यदि बचना है तो उसका एक ही उपाय है—‘स्व’ को अत्यन्त विस्तृत कर देना। एक ही आत्माको सबमें तथा सबको एक ही आत्मामें देखना—

‘सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।’

(गीता ६।२९)

यह होनेपर सहज ही सबके हितमें अपना हित और सबके अहितमें अपना अहित दिखायी देगा। वर्ग, वर्ण, कार्य अलग-अलग रहेंगे। जिस प्रकार एक ही शरीरमें सिर, पैर, आँख, कान आदि अंगोंके विभिन्न नाम-रूप हैं तथा सबके कार्य अलग-अलग हैं, पर सभी एक ही शरीरके विभिन्न अंग हैं—सभी ‘मैं हूँ’ ऐसी हमारी धारणा है, इसलिये सभी अंग सहज ही सब अंगोंकी पुष्टि तथा सहायता करते हैं। सबके हितमें ही सब अपना हित समझते हैं, कोई किसीको दु:ख पहुँचाना या किसीका अहित करना नहीं चाहता, वरं सभी सबको दु:खसे बचाते रहते हैं। इसी प्रकार जब यह निश्चय हो जायगा कि एक ही भगवान् या एक ही आत्मा सबमें है और सब उसीमें है तो स्वाभाविक ही सबके द्वारा सबका हित होगा। फिर द्वेष, क्रोध, कलह, वैर, हिंसाको कहीं स्थान ही नहीं रह जायगा। सब सबका स्वाभाविक ही सुख-हित-साधन करेंगे।

‘मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।’

× × ×

‘अब हौं कासों बैर करौं।

कहत पुकारत प्रभु निज मुख सों घट-घट हौं बिहरों॥’

× × ×

‘सबमें मैं ही रम रहा, सब ही मेरे अंग।

सब ही ‘मैं’ फिर, कौन-सा करूँ अंग मैं भंग?॥

किसी अंग पर लगेगी चोट बड़ी या अल्प।

निश्चय ही वह लगेगी मुझको, बिना बिकल्प॥

तब फिर कैसे करूँ मैं किस परका अपकार?।

कैसे किसको दु:ख दूँ, कैसे करूँ प्रहार?॥

नाम-रूप हैं देहके कल्पित असत् विभिन्न।

सबमें अन्तर्निहित हैं ईश्वर एक अभिन्न॥’

इस परम सत्यको भूलकर ही आज हम सब परस्पर एक-दूसरेकी मानस-शारीरिक हिंसा करते हुए वास्तवमें अपनी ही हिंसा कर रहे हैं। स्वार्थ-साधनके भ्रममें अपने ही स्वार्थका नाश कर रहे हैं। भगवान् हम सबको सद्‍बुद्धि दें। शेष भगवत्कृपा।