सदा विवेकको जाग्रत् रखें
आपका पत्र मिला। इधर बहुत चिन्ता रही। आप स्वास्थ्यका ध्यान रखियेगा। भगवान्की कृपा तथा उनके मंगल-विधानपर विश्वास करके मनमें बहुत प्रसन्न रहियेगा। भविष्यके सम्बन्धमें पूर्ण आशावादी रहना चाहिये—सदा उज्ज्वल परम श्रेष्ठ भविष्यकी आशा तथा दृढ़ धारणा करनी चाहिये। कभी नकारात्मक (Negative) विचार करके मन्दोत्साह नहीं होना चाहिये। मैं हृदयसे चाहता हूँ कि आप परमसुखी हों, आपका जीवन सर्वांगीण समुन्नत हो, आपके विचार उच्च तथा आदर्श हों, आपका प्रत्येक कार्य सात्त्विक तथा सबके लिये अनुकरणीय हो और मेरा विश्वास है कि आप यदि मेरे विचारोंके अनुसार भगवान् पर विश्वास रखकर विचार तथा कार्य करेंगे तो आपके सम्बन्धकी मेरी सारी भविष्य-कल्पनाएँ सत्य हो सकती हैं। जो कुछ हो गया सो हो गया; उसके लिये आप पश्चात्तापके सिवा और कर ही क्या सकते हैं। मैं तो समझता हूँ कि भगवान्ने बड़ी रक्षा की। उस समय आप जैसे अनर्गल बोल रहे थे—वाणीपर नियन्त्रण नहीं रह गया था, वैसे ही कुछ हाथोंसे हो गया होता तो कितना भयानक तथा भविष्यको बिगाड़नेवाला होता; क्योंकि उस समय आपको क्रोधावेशमें भविष्यका विचार नहीं था, इसी प्रकार उन्होंने जब हाथ चलाया, उस समय वे भी भविष्यके विचारसे शून्य आवेशमें थे। उन्हींके हाथसे कहीं कोई ऐसी सांघातिक चोट लग जाती तो कितना अनर्थ हो जाता। मैं तो सोचकर ही काँप जाता हूँ और मन-ही-मन भगवान्की कृपापर मुग्ध होता हूँ कि उसने कितनी रक्षा की!
मनुष्यद्वारा जब-जब ऐसे कुकार्य होते हैं, तब आवेशमें ही होते हैं, क्योंकि उस समय बुद्धि नष्ट हो जाती है और इसीका परिणाम सर्वनाश होता है। मानव-जीवन मिला है भगवत्प्राप्तिके लिये। जीवनभर उत्तम-से-उत्तम आचरण करते हुए—त्याग-तपस्या करते हुए भगवान्की ओर बढ़ते रहनेमें ही मानव-जीवनकी सार्थकता है। वह न होकर उलटे ऐसे कर्मोंका होना, जिनका परिणाम यहाँ दु:ख, अकीर्ति, घोर पश्चात्ताप, भविष्यमें दु:खभोगोंके लिये बाध्य होना, जीवनमें घोर अशान्ति, दु:खपूर्वक देहत्याग और परलोकमें भयानक नरकों तथा अत्यन्त दु:खदायी योनियोंकी प्राप्ति अनिवार्य हो—कितना बड़ा अनर्थ है। यह सब अविवेकसे होता है। इसलिये मनुष्यको काम, क्रोध, लोभ आदिके वशमें होकर कभी आवेशमें नहीं आना चाहिये और सदा धीरजके साथ विवेकपूर्वक कर्तव्य निश्चय करके मन, वाणी, शरीरको वशमें रखते हुए ऐसे ही विचार तथा कार्य करने चाहिये, जिनका परिणाम लोक-परलोकमें परम सुख-शान्ति हो और मानव-जीवनकी सफलता समीप-से-समीप आ जाय। लोग भी उसे देखकर सन्मार्गपर आरूढ़ हों।
अत: मनुष्यको चाहिये कि वह सदा विवेकको जाग्रत् रखे, कभी किसी आवेशमें न आवे; मस्तिष्क सदा संतुलित रहे। दूसरे क्या करते हैं, उन्हें क्या करना चाहिये—यह न देखकर, न सोचकर अपने विचारों तथा आचरणोंको सदा पवित्र रखे। बुरा करनेवालेके साथ भी भला बर्ताव करे। अहित करनेवालेका भी हित सोचे-करे, दु:ख देनेवालेका भी सुख सोचे तथा सुख-साधन करे। असली सिद्धान्त तो यह है कि हमारे अपने ही पहलेके किये हुए कर्मोंके फल (प्रारब्ध) हुए बिना हमें कोई भी न तो दु:ख दे सकता है, न जरा भी हमारा अनिष्ट ही कर सकता है; पर यदि वह हमें दु:ख देना या हमारा अनिष्ट करना चाहता है तो उसका अनिष्ट अवश्य हो जाता है। इसी प्रकार हम भी किसी दूसरेका बिना उसके प्रारब्धके अनिष्ट नहीं कर सकते, परंतु दूसरेके अनिष्ट तथा दु:खकी इच्छा करके हम पाप करते हैं और अपने बुरे बर्तावसे उसके मनमें भी अपने प्रति द्वेष तथा वैर पैदा करके उसके विचारोंको भी नीचे गिराकर उसके द्वारा भी पाप होनेमें कारण बनते हैं। जो मनुष्य किसीके बारेमें बुरा सोचता है, वह उसे बुरे विचार देकर गिराता है—स्वयं तो गिरता ही है और जो किसीके बारेमें सदा शुभ—अच्छा सोचता है, वह स्वयं भी उठता है और उसके विचारोंको शुभ बनाकर उसे भी उठाता है। इस प्रकार वह अपना तथा दूसरोंका कल्याण करता है। आप ही सोचिये—आपको उस दिन क्रोधका आवेश न आता तो इतनी बातें क्यों होतीं? क्यों सबके मनोंमें अशान्ति होती? क्यों कुक्रिया होती और क्यों द्वेष बढ़ता? इसके विपरीत आपके द्वारा यदि सेवा, नम्रता तथा मधुर वचनोंके द्वारा सबको प्रसन्न करनेकी चेष्टा होती रहती तो सबके मनमें कितना हर्ष तथा प्रेम बढ़ता—यह विचारणीय है। आप बुद्धिमान् हैं, पढ़े-लिखे हैं; अत: अपना तथा सबका भविष्य सोचकर ही कर्तव्य निश्चय करना चाहिये। आवेशमें ऐसा कोई काम नहीं करना चाहिये, जिससे पीछे पश्चात्ताप करना पड़े और हाथसे अवसर निकल जाय।
आप जरा भी बुरा न मानियेगा—वह चाहे कितनी ही बुरे स्वभावकी हो—आपके पिताजीने उसका पाणिग्रहण किया है, अतएव वह आपकी पूजनीया माँ हैं। हर तरहसे उनका समादर करना तथा उन्हें सुख पहुँचाना आपका कर्तव्य होता है। उनके सुखी होनेसे आपके पिताजीको सुख-संतोष होता है; और पिताजीके द्वारा आपको स्वत: ही आशीर्वाद प्राप्त होता है।
राजा शान्तनु वृद्ध थे। उनके पुत्र भीष्म (सत्यव्रत) जवान थे, वीर थे; उनका विवाह और राज्याभिषेक होनेवाला था। इसी बीच शान्तनुकी सत्यवती नामक एक कन्यासे विवाह करनेकी इच्छा हुई। सत्यवतीके पिताने कहा—‘यदि सत्यवतीके पुत्रको ही राज्य मिले—भीष्मको न मिले। कहीं भीष्मके लड़के हों और वे सत्यवतीके लड़कोंसे लड़कर राज्य छीन लें—इसलिये भीष्म विवाह ही न करें। ये दो शर्त—भीष्मको राज्य न मिले और भीष्म जीवनभर अविवाहित रहें—मानें तो शान्तनुके साथ सत्यवतीका विवाह हो सकता है’। दोनों ही शर्तें धर्म तथा राजनीतिके विरुद्ध थीं। शान्तनु कैसे स्वीकार करते तथा भीष्मसे भी कैसे पूछते? वे चुप रहे। पर उनके मनकी वासना नहीं मिटी; वे अत्यन्त उदास रहने लगे। भीष्मने पिताकी उदासीका पता लगाया और सब बातें जानकर स्वयं सत्यवतीके पिताके पास जाकर यह प्रतिज्ञा की—‘मैं कभी राजगद्दीपर नहीं बैठूँगा और जीवनभर विवाह नहीं करूँगा।’ देवताओंने इस भीषण प्रतिज्ञाको सुनकर उनका नाम सत्यव्रतसे ‘भीष्म’ रखा। पिताका विवाह हो गया। भीष्म आजन्म अविवाहित रहे और राजा नहीं बने।
भगवान् श्रीरामचन्द्रने विमाता कैकेयीके वचनोंको अति प्रसन्नताके साथ आदर देकर पिताकी इच्छा न होनेपर भी सानन्द वनवास स्वीकार किया।
प्रह्लादने आजन्म दु:ख देनेवाले पिताकी सद्गतिके लिये निष्काम होकर भी भगवान्से वरदान माँगा और पिताकी सद्गतिके लिये कामना की।
ये सब हमारे आदर्श हैं। अतएव मेरा आपसे यह नम्र अनुरोध है कि आप अपने मनसे विरोधी भावको सर्वथा निकाल दें। उनको भी समझें और उनका आदर करें। उनको देखते ही आपको जो क्रोध आता है, उसके बदलेमें सौम्यभावके साथ उनके प्रति सम्मानके भाव आवें।
विष देनेवालेको भी अमृत देना चाहिये। सर्वथा अमृतका ही छिड़काव करना चाहिये। अपने हृदयको अमृतकलश बनाकर, सबमें सदा अमृत वितरण करके उनके विषको मिटा देना चाहिये।
सब सुखी हों, सब नीरोग हों, सबको सदा मंगल—कल्याण ही देखनेको मिले। किसीको जरा भी दु:ख न मिले—यही हमारा विचार और ऐसे ही हमारे आचरण होने चाहिये।
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग्भवेत्॥
अतएव आप उचित समझें तो आपको उन सबसे क्षमा माँग लेनी चाहिये, ऊपरसे नहीं सच्चे हृदयसे और भविष्यमें उनकी ओर न देखकर अपनी ओर देखना तथा अपने जीवनको सदा पवित्र, मस्तिष्कको सदा संतुलित और मनको सदा शुभ-विचारयुक्त रखना चाहिये, इसीमें सर्वथा मंगल है।
मेरे विचारसे आपको—
(१) सबके प्रति विनम्र होना चाहिये, सबका आदर करना चाहिये।
(२) सबसे सदा मीठा बोलना चाहिये।
(३) कभी आवेशमें नहीं आना चाहिये।
(४) आवेश आ जाय तो उसे बाहर नहीं प्रकट होने देना चाहिये।
(५) विवेकके द्वारा भविष्यकी बात सोचकर कर्तव्यका निश्चय करना चाहिये।
(६) खान-पानको सदा परम पवित्र रखना चाहिये।
(७) भगवान् पर अटल विश्वास रखना चाहिये।
ऊपर मैंने जो कुछ लिखा है, वह परम विशुद्धभावसे आपके कल्याणके लिये ही लिखा है। इसपर विचार करके आप आचरण करें—यह मेरी अभिलाषा है और मुझे आशा भी है कि आप धीरताके साथ विचार करके अपना कर्तव्य निश्चय करेंगे।
‘वह कमजोर है, जो अपनी भूलको स्वीकार न करके उसे पकड़े रखता है।’
‘वह बहादुर है, जो अपनी भूलको स्वीकार करके भविष्यमें भूल न करनेकी प्रतिज्ञा करता है।’
यह सब लिखनेपर भी अन्तमें मेरा यही लिखना है कि अवश्य ही मुझे बड़ी प्रसन्नता तो तब होगी, जब मैं आपको तथा....का तन-मनसे परम स्वस्थ, समुन्नत, सुखी तथा आदर्श देखूँगा। पर चाहे कोई भी स्थिति हो, सदा ही—आपके प्रति मेरा प्यार-स्नेह, सद्भावना तथा हिताकांक्षा अक्षुण्ण रहेगी। मैं सदा ही आपको सुखी देखना चाहूँगा और यथासाध्य ऐसा ही विचार तथा प्रयत्न करूँगा। आपका सुख ही मेरा सुख होगा। शेष भगवत्कृपा।