श्रीकृष्ण कृपा करके मेरे दिलको मारकर मुझे बेदिल कर दें
प्रिय बहिन, सस्नेह जय श्रीकृष्ण। आपका अनुरागपूर्ण पत्र और ‘गोपी’ पुस्तिकाकी तीनों नकलें मिल गयी थीं! ‘गोपी’ की एक प्रति आपने मुझे भाईके नाते सप्रेम भेंटरूपमें भेजकर भाई-बहिनके पवित्र सम्बन्धको और भी मजबूत कर लिया। आपकी यह आदर्श-भेंट सिरमाथेपर स्वीकार है। बाकीकी दोनों नकलोंको दो मित्र ले गये। एक त्यागी मित्रको तो उसे पढ़कर बेहद आनन्द मिला। आपके पत्रमें सच्चे अनुराग और भक्तोचित दैन्यको देखकर चित्तमें अत्यन्त आनन्द हुआ। वस्तुत: सच्चा भक्त ‘जड-यन्त्र’ ही होता है। वह जडकी तरह सर्वथा और सर्वदा यन्त्रीके इशारेपर ही घूमता है; कभी कुछ भी नहीं बोलता। ऐसे अहंकारशून्य भक्त ही यन्त्रीके हाथमें कठपुतलीकी तरह नाचा करते हैं। उन्हें किसी चीजका भान नहीं होता। प्राणनाथ यन्त्रीमें उसका इतना समर्पण होता है कि वह इस बातको पहचानने और जाननेकी आवश्यकता नहीं समझता कि प्राणनाथ मुझसे अलग हैं। वह प्राणनाथको और अपनेको दोनोंको ही भूल जाता है—
कान्ह भये प्रानमय, प्रान भये कान्हमय,
हियमें न जानि परे कान्ह हैं कि प्रान हैं।
प्रेमी कभी ऐसा नहीं मानता कि ‘मैं प्रेमास्पदको—प्राणनाथ भगवान्को चाहता हूँ।’ वह सदा ही अपनेमें प्रेमकी कमीका अनुभव करता है। वह यही मानता है कि ‘मुझमें इतना प्रेम ही कहाँ, जो मैं उनसे प्रेम कर सकूँ; इसीलिये उसका प्रेम परम उज्ज्वल और प्रतिक्षण बढ़ता रहता है। प्रेमको सदा बढ़नेवाला ही माना गया है—‘प्रतिक्षणवर्धमानम्।’ जो प्रेम घटता है, जिस प्रेमका प्रवाह रुकता है, जिसके लिये यह माना जाता है कि पूरा प्रेम हो गया, वह तो प्रेम ही नहीं है। उनका जादू ऐसा ही है, जो सब कुछ लुटाकर भी यह अनुभव करता है कि मैंने अबतक कुछ भी नहीं दिया और बात भी ऐसी ही है—उन्हें पाकर, उनके प्रेमको पाकर भक्त इतना धनी बन जाता है कि उसे अपने सर्वस्वदानकी बात याद ही नहीं रहती। जिस प्रेममें—प्रेमके लिये किये हुए त्यागकी स्मृति है, वह प्रेम यथार्थ नहीं है। प्रेममें तो त्यागका भी त्याग हो जाता है। जब मन ही अपना नहीं रहता, तब मनमें त्यागकी याद किसको रहे। उस गलीमें तो दिल और दिलवाला दोनों ही खो जाते हैं—
तेरी गलीमें आकर खो गये हैं दोनों,
दिल मुझको ढूँढ़ता है, मैं दिलको ढूँढ़ता हूँ।
सचमुच भक्त अपने प्राणनाथके हाथ बिके हुए दिलसे हारा हुआ रहता है, धन्य है।
मैं तो भक्त नहीं हूँ, भक्तोंके कदमोंकी धूलका भिखारी हूँ। भक्तोंके लिये मैं क्या प्रार्थना करूँ! और प्रियतमके लिये मरे हुए दिलको जिलानेकी प्रार्थना भी क्यों करनी चाहिये? यह मरना ही तो असली जीना है। श्रीकृष्ण कृपा करके मेरे दिलको मारकर मुझे बेदिल कर दें और अपना दिल मुझे दे दें—आप ऐसी भावना इस भाईके लिये करें।
यह बात बिलकुल सच है कि आत्म-समर्पण किये बिना कृष्णको कोई नहीं जान सकता और जो कृष्णको जान लेता है, वह सभी नाम-रूपोंमें अपने कृष्णको ही देख सकता है; क्योंकि वही असलमें है। मुसलमानोंका अल्लाह और ईसाइयोंका गॉड इस कृष्णसे जुदा नहीं है। कृष्णमें कोई जात-पाँत नहीं और उसके प्रेममें भी जात-पाँतकी कोई पूछ नहीं! एक कृष्ण-भक्तने कहा है—
नहिं हिन्दू नहिं तुरक हम, नहिं जैनो अँगरेज।
सुमन सँवारत रहत नित कुंजबिहारी सेज॥
जो गीता, कुरान और बाइबलमें उस एक ही परमात्माको देखता है, वही यथार्थ देखता है। यह तो नासमझी है कि जो दो नामोंसे एक ही अल्लाहको पूजनेवाले आपसमें लड़कर—एक दूसरेके भगवान्को गालियाँ देकर—अपने ही भगवान्को गालियाँ देते हैं। भगवान् कृपा करके ऐसे भाइयोंकी आँखें खोलें।
श्रीकृष्ण अपना और विशुद्ध प्रेम प्रदान करें, यही प्रार्थना है।