सुखी बननेकी कुछ महत्त्वपूर्ण बातें
सम्मान्य श्री......., सादर प्रणाम। मनुष्यके मनमें जिस तरहका चिन्तन चलता रहता है, वह सदा उन्हीं बातोंसे घिरा रहता है और अन्तमें उन्हींको प्राप्त होता है। अतएव अशुभ-चिन्तन मनुष्यको कभी नहीं करना चाहिये; इसीमें अपना लाभ है। अशुभ-चिन्तन करना अपनी आत्मशक्तिका दुरुपयोग करना है और भय तथा विपत्तियोंको पुकार-पुकारकर बुलाना है। अपने मनमें किसीके प्रति जरा-सा भी द्वेष या हिंसाका भाव नहीं होना चाहिये, इसमें अपना ही लाभ है, किसीपर अहसान नहीं है। जो शत्रुको भी प्यारकी नजरसे देखता है, जिसके हृदयमें शत्रुके लिये भी शुभ-चिन्तनकी सम्पत्ति है, वह भगवान्को बड़ा प्यारा है और वही आनन्दमें है। उसके हृदयमें जलन नहीं होती—सदा शान्ति विराजती है। वास्तवमें अपना कोई शत्रु है ही नहीं; हमारी कल्पना ही हमारे लिये शत्रु पैदा कर लेती है। हमें जो दु:ख मिलते हैं, वे तो अपने पहले किये हुए कर्मोंके फलस्वरूप मिलते हैं; किसीके द्वारा मिलता है तो यह परेच्छा-प्रारब्धमात्र है; वह तो उसमें निमित्तमात्र बना है, वास्तवमें वह हमें दु:ख देनेवाला नहीं है। दु:ख देनेवाले हम स्वयं हैं, जो पहले दु:खोंके कारणरूपमें वैसे कर्म कर चुके हैं। ऐसी हालतमें हमारा शत्रु कौन है? एक बात और—मनुष्यको सदा अपने लाभकी चेष्टा करनी चाहिये, इसीमें बुद्धिमानी है। मनमें द्वेष-भाव रहनेसे निश्चय ही हानि होती है। द्वेष रखना चाहिये अपने बुरे विचारोंसे, बुरी भावनाओंसे, बुरे कार्यों और आचरणोंसे। यदि हम इनका नाश कर सकें तो हमारा जीवन शान्ति और सुखकी खान बन जायगा।
जो दूसरेके दोष नहीं देखता—नहीं देख पाता—दोष देखनेकी आँखें जिनकी फूट गयी हैं, वही सत्पुरुष है और वही सुखी भी है। जिसमें अपमानका बोध नहीं होता, जिसमें निन्दाका भय नहीं रहता, जो दोष ग्रहण नहीं करता, वह सत्पुरुष ही महान् है। अतएव सत्यकी रक्षाके लिये अपने दोष स्वीकार कर लेने चाहिये, उसमें निन्दा-अपमानसे नहीं डरना चाहिये। दोषोंको हृदयसे निकाल देना चाहिये—अपने दोष ढूँढ़-ढूँढ़कर और प्रकट कर-कर तथा दूसरोंके दोषोंके लिये हृदयके द्वार सदा बन्द रखकर।
दो बातें भूल जानी चाहिये—अपना किया हुआ उपकार और दूसरोंके द्वारा किया हुआ अपना अपकार। दो बातें याद रखनी चाहिये—दूसरेके द्वारा किया हुआ अपना उपकार और अपने द्वारा किया हुआ दूसरेका अपकार। इसीमें भलाई है....(उन्होंने) किसी समय किसी अंशमें आपका कुछ उपकार किया था, उसे याद रखना चाहिये और उसके लिये आपको उनका कृतज्ञ रहना चाहिये। अब यदि वे अपकार करते हैं तो इसे भूल जाना चाहिये और इसके बदलेमें उनसे प्रेम करना चाहिये हृदयसे। आप निश्चय मानिये—यदि हमारे प्रारब्ध वैसे नहीं हैं तो किसीके भी करनेसे हमारी बुराई नहीं हो सकती। सबसे प्रेम रहे, संसारमें सभीसे मेल-जोल रहे; यह तो नदी-नाव संयोग है—
‘तुलसी’ या संसारमें, भाँति-भाँतिके लोग।
सबसौं हिल मिल चालिये, नदी नाव संयोग॥
बुरा जो देखन मैं गया, बुरा न मिलिया कोय।
जो मन देखा आपना, मुझ-सा बुरा न कोय॥
तेरे भावें जो करौ, भलो बुरो संसार।
‘नारायन’ तूँ बैठकें, अपनो भवन बुहार॥
जो तोको काँटो बुवै, ताहि बोय तू फूल।
फूल सदा ही फूल है, दोउन कै अनुकूल॥
सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत।
मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत॥
सीय राममय सब जग जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
इन बातोंपर विचार कीजिये और सुखी होनेका प्रयत्न कीजिये। शेष भगवत्कृपा।