उसकी छत्रछायामें रहें

सप्रेम हरिस्मरण। आपका कृपापत्र मिला। दुर्घटनाके बाद अस्पतालमें कभी आपके हृदयमें शोक-विषाद अथवा पश्चात्तापका भाव नहीं आया, यह भगवान‍्की आपपर महान् कृपाका परिचायक है। आपका यह क्षत्रियोचित स्वभाव सर्वथा सराहनीय है। दुर्घटनाके समय भगवच्चरणोंका विस्मरण हो गया, यह अवश्य ही विचारणीय बात है। मनुष्यकी मृत्यु कब हो जाय, इस बातको वह नहीं जानता। अभी बिहटामें हृदयद्रावक ट्रेन-दुर्घटना हो गयी। चलते-चलते मनुष्य-हृदयकी गति रुक जानेसे मर जाता है, बीमार रहकर जो मरता है, उसकी भी अन्तकालमें वृत्ति भगवान‍्में लगायी लग सकेगी, इसका भी कुछ निश्चय नहीं है। अभी यहाँ एक पुलिस इन्सपेक्टरका अस्पतालमें देहान्त हुआ है, वे सन्निपातमें पुलिस-स्वभावकी चर्चा ही कर रहे थे। इसलिये यह बहुत ही आवश्यक बात है कि हम अपने चित्तको ऐसा भगवत्परायण बना दें, ऐसा भगवच्चिन्तनमय बना दें कि किसी भी अवस्थामें वह चिन्तन न छूटे; वह सर्वथा स्वभावगत हो जाय, जिससे हम सदा ही उसकी छत्रछायामें रह सकें। इसीलिये भगवान‍्ने कहा—

यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्।

तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावित:॥

तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।

मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्॥

(गीता ८। ६-७)

‘जिस-जिस भावको स्मरण करता हुआ मनुष्य शरीर छोड़ता है, वह उसीको प्राप्त होता है और अन्तकालमें प्राय: उसीमें चित्त रहता है, जिसका अभ्यास सदा (जीवनभर) किया गया है। इसलिये तुम सब समय निरन्तर मेरा स्मरण करते हुए ही युद्ध करो। फिर चाहे जब मृत्यु हो, मुझमें अर्पण किये हुए मन-बुद्धिवाले तुम नि:सन्देह मुझको ही प्राप्त होओगे।’

भगवान‍्के इन वचनोंपर खूब ध्यान देकर हमें श्रीभगवान‍्का स्मरण करते हुए ही सब काम करनेका अभ्यास डालना चाहिये। पहले स्मरण, पीछे काम; स्मरण सब समय, काम यथायोग्य नियत समयपर। ऐसा करनेसे फिर हम जब सदा ही भगवत्स्मरण करते रहेंगे, तब चाहे किसी भी दुर्घटनासे मौत हो—हमारा मन भगवान‍्में रहनेसे हमें भगवान् ही मिलेंगे।

यह बात केवल कहने-सुननेकी नहीं है, बहुत ही आवश्यक समझकर करनेकी है। आपके जीवनकी यह दुर्घटना तो आपके लिये एक खास उद्देश्य हो जाना चाहिये। इस बार तो भगवान‍्ने बचा दिया—यह समझकर कि इस अवस्थामें चला जायगा तो मुझको नहीं पावेगा; बचाकर मानो यह कहा—‘खबरदार! अब न भूलना। अब तो प्रतिक्षण मनकी प्रत्येक वृत्तिसे मेरा ही चिन्तन करना। फिर तेरे योगक्षेमका वहन मैं स्वयं करूँगा।’

वह मनुष्य बड़ा ही सौभाग्यशाली है, जिसके योगक्षेमके निर्वाचनका और वहनका जिम्मा भगवान‍्ने ले लिया है और जो सारी जिम्मेदारीसे छूटकर पागलकी तरह चौबीसों घंटे केवल अपने प्रियतमको ही पुकारा करता है।

आपने आरम्भसे लेकर अन्ततक अपने पत्रमें जहाँ-तहाँ मेरी बड़ी बड़ाई की है, यह ठीक नहीं। मैं तो आपका ‘भाईजी’ हूँ। सारी कृपा तो उस हमारे-आपके प्यारे भगवान‍्की है। केवल जिसके प्यारको देखकर ही हम उसे अपना प्यारा कहते हैं, हमारे प्यारसे नहीं, उसीके कृतज्ञ बनिये और कृतज्ञ हृदयसे पल-पलमें और पद-पदपर प्रत्येक स्थितिमें उसकी महान् कृपाका अनुभव करते हुए श्रद्धा-प्रेमके साथ निष्काम हृदयसे उसीका मधुर स्मरण कीजिये। आप धन्य होंगे और आपका ‘भाईजी’ होनेके कारण मैं भी धन्य हो जाऊँगा। शेष भगवत्कृपा।