उत्थानके नामपर पतन
आपका कृपापत्र प्राप्त हुआ। मेरी समझसे जिस समाजमें चरित्र, सदाचार, सद्गुण, धर्म और भगवान्का स्थान नहीं रह गया है या इनके स्थान नगण्य हो गये हैं, वह समाज उन्नतिकी ओर नहीं जा रहा है, पतन या विनाशकी ओर जा रहा है। हमारे वर्तमान समाजका अधिकांशमें यही हाल है। जीवनके स्तरका ऊँचा होना वास्तवमें अच्छे खाने-पीने, अच्छे पहनने-ओढ़ने, ऐश-आरामसे रहने, नाटक-सिनेमा देखने, बहुत कम काम करने, रहन-सहन और खान-पानकी शुद्धिका परित्याग करनेका नाम नहीं है। दु:ख तो इसी बातका है कि ‘जीवनके उच्च स्तर’ में आज इन्हीं सबकी प्रधानता हो गयी है; चरित्र, सदाचार, त्याग और सद्गुणोंकी नहीं। इसीसे भोगपदार्थोंकी आवश्यकताएँ अनन्तरूपमें बढ़ गयी हैं और उनकी पूर्तिके लिये पैसेकी आवश्यकता और किसी भी बुरे-से-बुरे साधनसे भी पैसा पैदा करनेकी इच्छा एवं चेष्टा बनी रहती है। जिसके पास किसी प्रकारसे भी पैसा आ जाता है—चाहे वह चोरी, हिंसा, छल, मिथ्याचार, परपीड़न आदि किसी साधनसे भी हो—वह जगत्में पूज्य माना जाता है; उसीका समाजमें आदर-सम्मान और नेतृत्व भी होता है। यहाँतक कि धार्मिक और पारमार्थिक अनुष्ठान करनेवाले साधु-महात्मा, त्यागी-विरागी लोग भी बड़े-बड़े समाज-सेवी, राष्ट्र-सेवी और जनताके विद्वान् और बुद्धिमान् लोग भी उसीके पास आते हैं, क्योंकि त्यागमय अनुष्ठानके स्थानपर आजकल अर्थमय अनुष्ठानकी ही, द्रव्य यज्ञोंकी प्रधानता हो गयी है और उनमें पैसेके बिना काम चलता नहीं। अतएव पैसेवाले यह समझते हैं कि चाहे जिस प्रकारसे भी हम पैसा कमावें, हमारी सारी बुराई पैसोंसे ढक जाती है और सभी क्षेत्रोंमें हमारी पूजा होती है—केवल दानके क्षेत्रमें ही नहीं, ‘ज्ञान’ और ‘धर्म’ के क्षेत्रमें भी। अच्छे-अच्छे नैतिक, धार्मिक और पारमार्थिक समारोहोंका उद्घाटन अथवा सभापतित्व भी उन्हींको प्राप्त होता है। इस प्रकार भोग-प्रधान, दूसरे शब्दोंमें अर्थ-प्रधान युगमें और समाजमें खुलेआम ‘चोरपूजा’ होती है और यह चोरपूजा सभी दूसरे लोगोंको चोरी करके पैसा कमाने और जीवनका स्तर ऊँचा करने अथवा सम्मान तथा पूजा प्राप्त करनेके लिये प्रलुब्ध करती है। यह वास्तवमें पतन है, उत्थान नहीं।
इसीलिये आज समाजमें चरित्रका, सद्गुणोंका, संयमका, सादगीका एवं त्यागका कोई आदर नहीं रह गया। इन गुणोंको अपनानेवाले लोग समाजमें पूजा नहीं प्राप्त करते, वरं अनादर प्राप्त करते हैं, क्योंकि आज उच्चताका नाप-तौल केवल ‘अर्थ’, ‘अधिकार’ और ‘भोग’ के काँटेसे ही होने लगा है और इसीसे चारों ओर बड़े-बड़े कार्यालयोंमें, आश्रमोंमें, मन्दिरोंमें सर्वत्र अनाचार और सभ्यताके आवरणमें ढकी हुई डकैतियाँ और चोरियाँ रहती हैं और ऐसा करनेवाले वे सभ्य डकैत-चोर समाजमें ऊँचा स्थान प्राप्त किये रहते हैं। किसके दो सिर हैं जो अधिकार और अर्थसम्पन्न इन चोर-डकैतोंकी ओर अँगुली भी उठा सके? बुद्धि ही सबकी उलटी हो गयी है; इसीलिये सभी कुछ उलटा दिखायी देने लगा है। भगवान्ने गीतामें कहा है—
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान् विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी॥
(१८। ३२)
बुद्धि जब तमसे ढक जाती है, तब वह अधर्ममें धर्म, पापमें पुण्य, अवनतिमें उन्नति, पतनमें उत्थान—यों सब कुछ उलटा ही देखती है और जहाँ बुद्धि मारी जाती है, वहाँ सर्वनाश होता ही है—‘बुद्धिनाशात् प्रणश्यति’। अतएव मेरी समझमें तो बुद्धिके भोगपरायण होकर तमसाच्छादित हो जानेके कारण आजका समाज पतनकी ओर ही जा रहा है। पता नहीं, कहाँ जाकर इसका विराम होगा! बस, भगवान् सबका मंगल करें, सबको सद्बुद्धि दें। आप जहाँतक इस मोह-मायासे बच सकें, बचनेका प्रयत्न करें। प्रवाह तो बहता ही है और सभी लोग हताश होकर यह मान लें कि हम तो प्रवाहमें बहनेके लिये बाध्य ही हैं तो कोई कैसे बचेगा? इसलिये भगवान्की कृपापर भरोसा करके, यदि बहुत साथी न मिलें तो दो-चारको साथ लेकर या अकेले ही सत्यके मार्गपर और भगवान्के मार्गपर नित्य आरूढ़ रहना चाहिये; निश्चय ही परिणाम परम मंगलमय होगा। शेष भगवत्कृपा।