विपत्ति भगवान‍्का वरदान

सम्मान्य महोदय! सादर हरिस्मरण। आपका पत्र मिला। आपके विचार बहुत सुन्दर हैं। भगवान‍्को इसीलिये नहीं पाते कि हम उन्हें वास्तवमें चाहते ही नहीं हैं; संसारकी नगण्य तथा तुच्छ वस्तुओंके पाने-भोगनेमें ही मस्त रहते हैं। उनके न मिलने या चले जानेपर बड़े बेचैन होते हैं, रोते-कराहते हैं, पर भगवान‍्के लिये हम कब बेचैन होते हैं? हमारे प्राण कब उनके लिये हाहाकार कर उठते हैं। नहीं तो, नित्य सत्य सर्वत्र व्याप्त आत्मस्वरूप भगवान‍्के मिलनेमें देर क्यों होती? भगवान् प्रारब्धसे मिलनेवाली कर्मजनित अनित्य वस्तु नहीं हैं; वे तो नित्य हैं और केवल चाहसे ही मिलते हैं। हम यदि भगवान‍्को भजते भी हैं तो अनित्य भोगसुखोंके लिये ही। जबतक भोग-विलास, धन-सम्पत्ति रहती है, मनकी चाह सफल होती रहती है, तबतक भगवान् बहुत अच्छे हैं—दयालु हैं। जरा भी त्रुटि हुई कि फिर या तो भगवान‍्को कोसते हैं या उनके अस्तित्वपर ही संदेह करने लगते हैं। दूसरोंके विलासमय जीवनको देखते हैं तो ललचाते हैं—भगवान‍्का भजन करनेपर भी हम उससे वंचित क्यों हैं? इसके लिये भगवान‍्की कृपापर, उनकी सत्तापर अविश्वास करने लगते हैं। जरा गहराईसे विचार कर देखिये—हम भगवान‍्को चाहते हैं या भोगोंको। ठीक दिखायी देगा—हम भगवान‍्को नहीं चाहते, भोगोंको चाहते हैं। फिर हम भगवान‍्को कैसे पायें!

अवश्य ही भगवान् बड़े दयालु हैं; हम जब क्षणिक तथा दु:खपरिणामी भोगोंको पाकर होश-हवास खो बैठते हैं, तब भगवान् विपत्ति-वरदान भेजते हैं। जोरकी चोट करते हैं और फिर उस चोटमें उनका स्पर्श प्राप्त होनेपर हमारे होश ठिकाने आते हैं। आप अपने अबतकके जीवनपर ध्यान देकर देखिये—सचमुच आपके जीवनमें ऐसा ही हुआ है। इस समय दयामय भगवान् आपके माया-मोह, ममता-आसक्तिको मिटानेका पवित्र कार्य कर रहे हैं—इस विपत्तिको भेजकर, इस प्रकार गालपर जोरकी चपत लगाकर। इसे भगवान‍्का मंगल वरदान समझिये। भीतरका सारा कूड़ा-कचरा जलकर भस्म हो जायगा और फिर उस शुद्ध अन्तर्देशमें भगवान् आ विराजेंगे। आपको इसका आभास हो रहा है—यह भगवत्कृपा ही है। आप निश्चिन्त मनसे भगवान‍्के प्रति अपनेको बेशर्त समर्पण कर दीजिये। उनके हरेक विधानकी मंगलमयतापर विश्वास करके निश्चितरूपसे निर्भर हो जाइये। निश्चय समझिये, भगवान् आपको अपना रहे हैं, समीप-से-समीप खींचे लिये जा रहे हैं। आपका परम कल्याण, आपको भगवत्प्रेमकी प्राप्ति भगवत्कृपासे निश्चय ही होगी। इसपर दृढ़ विश्वास कीजिये। शेष भगवत्कृपा।