व्यवहारमें ऊँची बात

आपके कई पत्र आ चुके। मैं चाहता था कि हाथसे पत्र लिखूँ, पर शरीर बहुत शिथिल रहता है तथा मस्तिष्क भी पूरा काम नहीं करता। बहुत बार तो संसारके प्रपंचकी बात सामने आते ही वृत्ति जगत‍्को छोड़ देती है और बाह्य-चेतना लुप्त हो जाती है। जिस दिन, जिस समय वृत्ति कुछ ठीक रहती है, तब कुछ पत्रोंका उत्तर लिखवानेकी चेष्टा करता हूँ। इसी स्थितिमें यह पत्र सेवामें लिखवा रहा हूँ, क्षमा कीजियेगा।

आपका एक झगड़ा निपट गया, सो बहुत अच्छी बात हुई, भगवान‍्ने सुबुद्धि दी।

दूसरा झगड़ा अभी नहीं निपटा, इसके लिये आपके मनमें विचार होना स्वाभाविक ही है। मैं तो केवल भगवान‍्से प्रार्थना ही कर सकता हूँ कि वे सबको सुबुद्धि दें और झगड़ा न रहकर काम निपट जाय।

.....सम्बन्धमें मैं क्या लिखूँ, आपका और उसका जो प्रेम था, वह उस समय बहुत आदर्श मालूम होता था। प्रेम कभी बदला नहीं चाहता, लेना नहीं चाहता, देना ही चाहता है, दोष नहीं देखता, गुण ही देखता है, वह एकांगी होता है। लेन-देनका व्यापार उसमें सम्भव नहीं है। पर प्रेमकी बाहरी स्थितिमें यदि अपने द्वारा होनेवाले उपकारोंके अभिमानकी वृत्ति मनमें छिपी हुई रहती है और उनके या उनके किसी अंशके बदलेमें कुछ पानेकी भावना रहती है तो वह भावना समयपर प्रकट हो जाती है और प्रेमके स्वरूपको दूषित कर देती है। प्रेममें तो प्रेमास्पदका सुख ही अपना सुख होता है। उसमें ‘क्या किया’, ‘क्यों किया’, ‘कैसे किया’—ये प्रश्न ही नहीं उठते। ऐसी बातें देख-सुनकर मुझे तो बड़ा दु:ख होता है। आजके जगत‍्की स्थितिको देखकर तो इस जगत‍्में रहनेकी इच्छा ही नहीं होती और यदि रहा जाय तो मस्तिष्क जगत‍्का स्पर्श न करे। परन्तु ये दोनों ही बातें हो नहीं रही हैं, अपना उपाय भी क्या है? न मैं आपको कुछ लिख सकता हूँ और न उसको ही। यदि दृष्टि ठीक हो तो आप दोनों ही मेरे मनके भावको समझ सकते हैं और यह भी जान सकते हैं कि मेरा स्नेह सदा निर्विकार और अक्षुण्ण है और वह सदा आपलोगोंका कल्याण ही चाहता है।

व्यवहारमें भी ऊँची बात और वास्तवमें अपने लाभकी बात यही है कि अपने द्वारा किये हुए किसीके ‘उपकार’ को और दूसरेके द्वारा अपने लिये किये हुए किसीके ‘अपकार’ को भूल जाय और अपने द्वारा दूसरेके लिये बने हुए ‘अपकार’ को और दूसरेके द्वारा अपने लिये बने हुए ‘उपकार’ को याद रखे। इससे दोनोंकी सात्त्विक वृत्ति बनी रहती है। साथ ही वे पारमार्थिक-पथपर आगे बढ़ते हैं।

जगत् क्षणभंगुर है, यहाँकी कोई भी चीज नित्य नहीं है। जगत् वास्तवमें सुखरहित ही नहीं है, दु:खयोनि है, पर शरीर और नाममें अहंता और ममता होनेके कारण मोहवश हमलोग इस सत्यको भूलकर राग-द्वेषमें फँस जाते हैं, जिससे यहाँ मृत्युके अन्तिम क्षणतक चिन्ता बनी रहती है और मरनेके बाद बड़ी दुर्गति होती है। मुझे एक प्रेतने बहुत-सी बातें बतायी थीं, उनमें एक बात यह भी थी—‘जो किसीके भी प्रति मनमें द्वेषको लेकर मरता है, उसकी बहुत दुर्गति होती है’। अत: मरनेसे पहले द्वेष छोड़ दें और क्षमा माँग लें।

मैं तो सारे जगत‍्के लिये यही चाहता हूँ कि सब लोग राग-द्वेष भूलकर एक-दूसरेके प्रति निष्काम सेवाकी भावना रखें, पर जो अपने घरके लोग हैं, उनसे तो ऐसी आशा रखना स्वाभाविक होता है; यद्यपि ऐसा किसीको बना देना मेरे हाथकी बात नहीं है। मैं तो स्वयं हजारों-हजारों दुर्बलताओंसे भरा हुआ प्राणी हूँ, अपने ही दोष दूर नहीं कर सकता, तब दूसरोंके दोष दूर करनेकी शक्ति मुझमें कहाँसे हो सकती है। शेष भगवत्कृपा।