प्रवचन—१

समाजकी जिम्मेवारी—बड़ोंपर

समाजकी जिम्मेवारी समाजमें बड़े कहलानेवालोंपर होती है। जैसे, घरमें कोई समस्या आती है, तो घरमें जो मुख्य होते हैं, उनपर ही उसकी जिम्मेवारी होती है। ऐसे समाजकी जिम्मेवारी जो समाजमें बड़े कहलानेवाले होते हैं, उनकी होती है। उस जिम्मेवारीका पालन कैसे किया जाय? इसमें एक मार्मिक बात है कि अपने कर्तव्यको समझा जाय। आज बड़े-बड़े अनर्थ होते हैं, उनमें बाह्य हेतु बताये जाते हैं, वे भी ठीक हैं; परंतु मूलमें विचार कर हम देखते हैं, तो जो साधु और ब्राह्मण हैं, ये अपने कर्तव्यका ठीक पालन नहीं कर रहे हैं। इससे बहुत अनर्थ हो रहे हैं और अगाड़ी भी कितने होंगे, इसका कोई पता नहीं। गीतामें कहा है—

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:।

स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥

(३। २१)

श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करते हैं; दूसरे मनुष्य वैसा ही आचरण करते हैं। ‘स यत्प्रमाणं कुरुते’ श्रेष्ठ पुरुष जिसको प्रमाणित कर देते हैं, ‘लोकस्तदनुवर्तते’ लोग उसका अनुसरण करते हैं। तात्पर्य निकला कि जैसे श्रेष्ठ पुरुष करते हैं, वैसे ही अन्य पुरुष करते हैं और वे जैसा कहते हैं, वैसा ही अन्य लोग करते हैं।

‘लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि’

(गीता ३। २०)

श्रेष्ठ पुरुष लोक-संग्राहक होते हैं। यह लोकसंग्रह क्या होता है? दो तरहसे लोकसंग्रह होता है। श्रेष्ठ पुरुषोंके आचरणसे और श्रेष्ठ पुरुषोंके वचनसे। उन दोनोंमें देखा जाय तो ‘यत् यत् आचरति श्रेष्ठ:’ यहाँपर ‘यत्’, ‘यत्’ दो पद दिये हैं और ‘तत्’, ‘तत्’, ‘एव’ तीनपद दिये हैं। ‘स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते’ वहाँ ‘यत्’ व ‘तत्’ दो ही पद हैं। आचरणमें पाँच पद हैं। इसका आशय क्या निकला? जहाँ मनुष्यके आचरणोंका असर पाँच गुना पड़ता है, वहाँ वचनोंका असर दो गुना पड़ता है।

मूलमें कमी हमारे भीतर है। कहाँसे शुरू हुई? साधु-आश्रममें हम आ जायँ, कपड़े बदल लिये—मनमें फूँक भर गयी कि बस हम तो साधु बाबाजी हो गये। अब तुम गृहस्थ हो तो हमारी सेवा करो। तुम चेला हो, हम गुरुजी हैं। ऐसे केवल भेष बदलनेमात्रसे बड़े हो गये। बड़े हो नहीं गये, अपनेको बड़ा मान लिया। यह अपने-आपको बड़ा माननेका काम अपना है ही नहीं भारतीय संस्कृतिमें। दूसरोंको बड़ा माननेका हमारा सिद्धान्त है। अपनेको बड़ा माननेवाला अभिमानी होता है। आसुरी सम्पत्ति सब-की-सब अभिमानकी छायामें ही पुष्ट होती है और रहती है। जैसे, बहेड़ेकी छायामें कलियुग निवास करता है। ऐसे ‘अहं’ अभिमान (अपनेको बड़ा मानना)-की छायामें ही सम्पूर्ण आसुरी सम्पत्ति निवास करती है। साधुमात्र बन जानेसे अपनेको बड़ा मान लिया। बाबाजी हो गये। ब्राह्मणके घर जन्म लेनेमात्रसे अपनेको बड़ा मानने लग गये कि हम बड़े हैं। अब ब्राह्मणके घर जन्म लेनेमात्रसे क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—इनको बड़ी हीन दृष्टिसे देखने लग गये। साधुमात्र होनेसे गृहस्थियोंको हीन दृष्टिसे देखने लग गये। तो ये जो रहे मुख्य, ये समाजमें हो गये अभिमानी; होना तो चाहिये था नम्र! कोई बड़ा होता है, वह अभिमानके कारण नहीं, नम्रताके कारण बड़ा होता है। साधु और ब्राह्मण बड़े हुए हैं, किस वास्ते हुए? किस कारणसे हुए?

श्रेष्ठ गुण निरभिमानता

त्यागो गुणो गुणशतादधिको मतो मे

विद्याविभूषयति तं यदि किं ब्रवीमि।

शौर्यं हि नाम यदि तत्र नमोऽस्तु तस्मै

तच्च त्रयं न च मदोऽस्ति विचित्रमेतत्॥

सबसे पहले त्याग है। मैंने एक दिन सुनाया भी था। लोग कहते हैं ब्राह्मणोंके हाथमें पुस्तकें रहीं तो लिख दिया कि ब्राह्मण सबसे ऊँचा। तो यह बात है नहीं। वास्तवमें ब्राह्मण ऊँचा है, यह ब्राह्मणोंने अपने हाथसे अपनेको ऊँचा बनाया हो ऐसी बात है नहीं। जो पुरुष अपनी बड़ाई करेगा, वह तो पतित हो जायगा, गिर जायगा वह। जो अपने मनमें भी अपनेको बड़ा मानता है, वह गिर जाता है; क्योंकि अपने मनसे बड़ा तो हो ही गया, अब तो गिरना ही बाकी रहा। अपनेको बड़ा न माने, यह बात थी उनमें त्याग मुख्य था, त्याग। ब्राह्मणोंके लिये नौ धर्म बताये, ‘शमो दमस्तप: शौचं......।’ क्षत्रियोंके लिये सात बताये, वैश्यके लिये तीन बताये, शूद्रके लिये एक। ब्राह्मण नौके पालन करनेसे जिस पदको प्राप्त होता है, शूद्र एकके पालनसे उस कल्याण पदको प्राप्त हो जाता है। इनकी तो उदारता रही है, त्याग रहा है सदा ही। अभिमान नहीं रहा है। अभिमान नहीं करते थे।

यत: प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥

(गीता १८। ४६)

ब्राह्मण अपने कर्मोंके द्वारा चारों ही वर्णोंमें रहनेवाले परमात्माका पूजन करे। सबका ‘अभ्यर्च्य’ में अन्वय है। पूजनकी दृष्टिसे बात कही। कथा सुनावे, व्याख्यान दे, शिक्षा दे, गुरु बने तो अपनेमें बड़प्पनका अभिमान न रखे अपितु उनसे प्यार करे। छोटे जितने होते हैं, सब-के-सब प्यारके पात्र होते हैं। ये ठेठ (आरम्भ)-से ब्राह्मण और साधु अपनेसे छोटोंको प्यार करना शुरू करेंगे तो क्षत्रिय और वैश्य भी अपनेसे छोटोंसे प्यार करेंगे तो हरिजन आदिका तिरस्कार—अपमान नहीं होगा। पर आप तो अभिमान करके दूसरोंका तिरस्कार करते हैं और कहते हैं कि उनका आदर करो।

व्याख्यान देनेके अधिकारी

आपलोगोंसे मैं नम्रतापूर्वक निवेदन करता हूँ। मैं जो बातें कहता हूँ वे शास्त्रोंकी, सन्त-महात्माओंकी, ऋषि-मुनियोंकी, भगवान‍्की बातें हैं। मैं मेरी बात नहीं कहता हूँ। मेरी बात कोई दीखे तो उसको आप मानना मत। शास्त्रोंकी दीखे तो आपको, मेरेको, सबको ही मानना है। इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं कहने लग गया, तो बड़ा हो गया, आप सुननेवाले छोटे हो गये। ऐसी बात नहीं है। छोटा-बड़ा नहीं। सनकादिकोंमें एक वक्ता बन जाते हैं, तीन श्रोता बन जाते हैं। ऐसी कथा आती है। दशम स्कन्धमें ८७वें अध्यायमें जहाँ वेदोंका वर्णन आता है न, जहाँ वेद-स्तुति करते हैं, वेद-स्तुतिका संवाद सनकादिकोंका है। तो वे छोटे-बड़े थोड़े ही हो गये। भगवच्चर्चा करनी है अपने तो ठीक तरहसे।

अगर इनमें छोटा-बड़ा देखा जाय तो बड़े सुननेवाले होते हैं, बड़ा सुनानेवाला नहीं होता है। सुनानेवाला तो नौकर है। उसको समयपर हाजिर होना पड़ेगा। सुननेवाले मालिक हैं, आवें न आवें, थोड़े आवें, देरीसे आवें, बीचमें उठ जायँ, पर सुनानेवाला ऐसा कर सकता है क्या? आवे न आवे, देरीसे आवे और बीचमें उठ जाय। कैसे हो सकता है? वह तो दास है सबका! बहम पड़ता है कि मैं बड़ा हूँ। वास्तवमें बड़ा नहीं है। अगर भगवत्सम्बन्धी बातें विशेषतासे कहता है तो उसका लाभ जितना वक्ताको होता है, उतना श्रोताको नहीं होता है। वक्ता जितनी बात कहता है न, उतनी उसको सोचनी पड़ती है, कहनी पड़ती है। घंटाभर बोलता है तो उस विषयको समाधिकी तरह ठीक करना पड़ता है और उसमें मन लगाना पड़ता है। मन जितना अधिक लगता है, बुद्धिमें बात उतनी ही पकड़में आती है। बुद्धिमें बात जितनी अधिक आती है उतनी उसके आचरणोंमें आती है और लोगोंके सामने अच्छी बात कहनी पड़ती है; क्योंकि इज्जत अपनी रखनी है। इज्जतके लिये भी कहता है तो अच्छी बातें कहेगा, तो अच्छी बातें फुरणा होगी उसका आचरण अच्छा होगा। सुननेवालोंपर थोड़े ही है जिम्मेवारी इतनी।

बहुत-सी बातें हैं, अब थोड़े समयमें मैं क्या कहूँ? वास्तवमें कहनेवालेको लाभ बहुत होता है। कहनेवालेके सिद्धान्त बुद्धिमें आते हैं, बुद्धिके द्वारा मनकी कल्पनामें आते हैं, मनकी कल्पनाके बाद शब्दोंमें आते हैं। जितना शब्दोंसे आता है विषय, उतना लोगोंके कानोंतक नहीं पहुँचता और जितना कानोंतक पहुँचता है, उतना उनका मन नहीं पकड़ता है। जितना मन पकड़ता है, उतनी बुद्धिमें उस विषयकी स्थिरता नहीं होती। बुद्धिमें जितना जँचता है, उतना उनके आचरणमें नहीं आता। तो सुननेवालोंके आचरण अच्छे होते हैं तो वक्तामें अच्छाई कितनी पहले आयी? और कहाँतक पहुँची वह? इतनेपर भी सुननेवालोंका सुधार होता है तो कहनेवालेका कितना सुधार होगा?

मेरे तो महापुरुषोंके सामने ऐसी बातें हुई हैं। मैंने ऐसा निवेदन किया कि मेरा बोलनेका मन नहीं करता। कहनेका, व्याख्यान देनेका मन नहीं करता। पर उन्होंने कहा, करो; उन्होंने प्रेरणा दी विशेषतासे। लोगोंको तो, ‘व्याख्यान देना है—हमें मिले मौका’, ऐसी बात होती है। मेरे भी बोलनेकी मनमें आयी है कि मैं सुनाऊँ; परंतु मैंने विचार किया है, तो विचारके द्वारा सुनानेकी बात बढ़िया नहीं लगी हमें। मैंने सन्तोंसे यह बात सुनी है कि संसारमें सबसे नीचा अगर काम है तो व्याख्यान देनेका है। ऐसा सन्त-महात्माओंसे मैंने सुना है अपने कानोंसे। सबसे नीचा काम है यह। सबसे ऊँचा काम टट्टी-पेशाब फेंक देना, झाड़ू लगा देना, सफाई कर देना है। जो कहता है मैं सेवा करता हूँ तो सेवामें जितना नीचा काम होगा, उतना करनेवालेको लाभ ऊँचा होगा। जितना ऊँचा काम होगा, उतना लाभ नीचा होगा।

आप सोचो, विचार करो। कहनेका अधिकारी कौन होता है? कहनेका अधिकारी वह होता है, जिसने अपनेमें उन बातोंको ठीक अनुभव करके देखा है। अनुभवके बिना कहता है तो सन्तोंकी वाणीमें आता है ‘करनी बिन कथनी कथे, अज्ञानी दिनरात। कूकर ज्यों भुसता फिरै सुनी सुनाई बात॥’कुत्तेका दृष्टान्त क्यों दिया? एक जगह कोई कुत्ता भूसता है तो दूसरे मुहल्लेवाला कुत्ता भी भूसने लगता है, तीसरेमें भी भूसता है सब कुत्ते भूसने लग जाते हैं। उन कुत्तोंको पूछा जाय तुम किसको भूसते हो—यह तो पता नहीं। एक भूसता था सबने शुरू कर दिया। तो जैसे कुत्ता सुनकर भूसने लग जाता है ऐसे कहींसे सुन लिया, अपने भी कहना शुरू कर दिया। अरे भाई! बातोंको जानते नहीं, करके देखा नहीं, तबतक कहनेका क्या अधिकार है? तो हमारे बड़ा संकोच हो गया। मेरेको तो तैयार किया उन्होंने कि तुम बोलो। प्रेरणा की है। लोगोंके मनमें आती है कि हम भी बोलें। परंतु भाई! यह खतरनाक चीज है। बड़ा बनना खतरनाक है।

हमने देखा अमरकोषमें विद्वान‍्के नाममें वहाँ‘दोषज्ञ’नाम आता है। अब ‘दोषज्ञ’ कोई बढ़िया है क्या? बढ़िया तो गुणज्ञ होता है। दोषोंका ज्ञान हो उसे‘पंडित’ कहते हैं। तो दोषोंका ज्ञान होगा तो दोषोंके साथ सम्बन्ध होगा। सम्बन्ध होगा तो दोष अपनेमें आवेंगे ही, मेरे ऐसी शंका हुई है। एक जगह सत्संगकी बात है। मैं जिनको अच्छा समझता था, आदरणीय समझता था, मैंने उनके सामने उनकी बातें सुनकर कहा, किसीका दोष मत देखो, यह बात तो आप कहते हो और व्याख्यान सुनानेवाला यदि दोष नहीं देखेगा तो दोष देखे बिना उसका निराकरण कैसे करेगा तथा लोगोंके आगे कैसे विवेचन करेगा? कहेगा कैसे? चेतायेगा कैसे—ऐसा करो और ऐसा मत करो। इस वास्ते दोष-दृष्टि तो करनी पड़ेगी। उन्होंने बड़ा सुन्दर समाधान किया कि यह दोष-दृष्टि नहीं है, यह एक निर्दोष दिदृक्षा (देखनेकी इच्छा) है। दोष-दृष्टि वह होती है कि दोष देखकर राजी होवे, उसकी निन्दा करके प्रसन्न होवे तब तो वह है दोष-दृष्टि। उनमें जो दोष है, उससे दु:ख होता है, उन दोषोंको कैसे दूर किया जाय, ऐसे भावसे कहता है वह दोष-दृष्टि नहीं है; क्योंकि वह निर्दोष देखना चाहता है। नीयतके ऊपर बात है न।

बड़प्पनका अभिमान

आज हमारे जो आफत आ रही है तरह-तरहकी उससे बचनेका उपाय क्या है? मूलसे साधु और ब्राह्मण किसीको नीचा न माने यहाँसे शुरू होगा। केवल कपड़ा रँगनेमात्रसे क्या हो गया? हमारे सन्तोंद्वारा तो बड़ी तीक्ष्ण आलोचना की गयी है। कहनेमें संकोच होता है। हमारी निंदा हो जाती है।

भेष पहर भूलो मति भाई, आथर और गदेड़ी वाही॥

गधेके ऊपर लादते हैं न भार, तो नीचे आथर होता है उसे ‘आथरिया’ कहते हैं। आथरिया बदलनेसे क्या गधेड़ी बदल गयी। ऐसे कपड़ा बदलनेसे क्या वह बदल गया? यह बात दूसरी है कि गृहस्थाश्रमवालोंको चाहिये कि भेषधारी आ गया तो रोटी दे दो। यह तो उनका बड़प्पन है। पर साधुको अपनेमें बड़प्पनका आरोप कर लेना तो गलती है न। साधु अपने साधुओंकी महिमा कैसे कह सकता है? वैसे ही ब्राह्मण ब्राह्मण-जातिकी महिमा कैसे कह सकता है? ऐसे पुरुष पुरुष-जातिकी महिमा कैसे कह सकता है? अगर कहता है तो उसकी नीयत ठीक नहीं है।

बड़प्पन तो औरोंको देनेका है, यह लेनेका नहीं है। सेवा करना, सुख पहुँचाना, खटना, परिश्रम करना—यह है अपने लेनेका और बड़ाई, मान-आदर, सत्कार ये देनेके हैं, लेनेके नहीं। सेवा करनेकी है, लेनेकी नहीं। भगवान् विष्णु सबसे बड़े माने जाते हैं इसमें कारण क्या है? पालनशक्ति है। सबका पालन-पोषण करनेका काम हाथमें लिया है। ‘सुहृदं सर्वभूतानाम्’ वे प्राणी-मात्रके सुहृद् हैं। उनके पापी-पुण्यात्माका भेद नहीं है। इस वास्ते बड़े हैं और भगवान‍्का निवास है चरणोंमें, इसी वास्ते बड़ोंके चरण छूकर प्रणाम करते हैं। विष्णुभगवान‍्का निवासस्थान कहाँ है? चरणोंमें है। इस वास्ते वे बड़े हैं। गीतामें उपदेश दिया—

‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानव:॥’

(१८। ४६)

अपने कर्मोंके द्वारा परमात्माका पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त होता है। ब्राह्मणमें ‘शमो दमस्तप:’ आदि जो गुण हैं, उनके द्वारा वह पूजन करे और ‘परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्॥’, ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य’ शूद्रका कर्म भी पूजन है। पूजनके द्वारा पूजन करना तो डबल पूजन हुआ कि नहीं? उसको नीचा कैसे माना जाय? अपने मनमें दूसरेको नीचा मानना यह अभिमानका परिचायक है। माता-बहनोंके लिये लिखा कि तुम पतिको परमेश्वर मानो, तो यह माताओंके लिये कहा है, न कि पुरुषोंके लिये कहा है कि मैं परमेश्वर हूँ, नहीं तो ब्याह किये हुए तो सब परमेश्वर हो जायँगे। कुँवारा बेचारा रह जायगा बाकी। वह परमेश्वर किसका बने। यह तात्पर्य नहीं है।

गोरखपुरके पास एक गाँवकी बात है—एक बेचारी बुढ़िया हरिजनोंके घरकी थी, वह पानी भरनेके लिये गयी तो उन्होंने पानी उसका भरा नहीं। बहुत देर बैठी रही, उसने पानी माँगा, दिया नहीं। तो उस समय एक यवन भाईने देखा तो उससे कहा ‘तुम क्या करती हो? तुम हमारे यहाँ आ जाओ सब अधिकार मिलेगा तुम्हें’। वह भोली-भाली ग्रामीण थी बेचारी। उस भाईने कई प्रलोभन दिये। तो उस माईने पूछा, ‘वहाँ गङ्गाजी हैं क्या तुम्हारे? यमुनाजी, प्रयागराज आदि हैं क्या’? ये तो नहीं हैं। तो हम नहीं जायँगी। तो हम ऐसे यवन नहीं बनेंगे, जहाँ गङ्गाजी नहीं हैं। तो क्या है यह? यह है गङ्गाजीके प्रति श्रद्धा भीतरसे। मरनेपर भी हड्डियाँ डाली जायँ तो कल्याण हो जाय। ऐसा हमारा धर्म है, धर्मशास्त्र है। धार्मिक जितनी चीजें हैं, इनके प्रति आजकल अश्रद्धा करायी जाती है और फिर कहते हैं उनका निरादर करते हो तुम। लोग निरादर क्यों करते हैं? अपने खुद पहले शास्त्रोंका, सिद्धान्तोंका, धर्मका निरादर करते हैं, इससे यह दशा होती है अगाड़ी। अगर आप ठीक तरहसे सिद्धान्तको मानो तो कितनी विचित्र लाभकी बात है।

सज्जनो! मैंने पुस्तकें देखी हैं, सन्तोंसे मिला हूँ, मैंने बहुत विचित्र-विचित्र बातें पढ़ी हैं और सन्तोंसे सुनी हैं। मेरी एक धारणा बनी है कि केवल पुस्तक पढ़नेसे इतना पूरा बोध नहीं होता, जो अच्छे जानकार सन्तोंसे बातें सुननेसे वास्तविक बोध होता है। उसमें मैं इस नतीजेपर पहुँचा हूँ कि संसारमें कितना ही नीच प्राणी क्यों न हो, उसका भी उद्धार हो सकता है, भगवान् मिल सकते हैं, वह तत्त्वज्ञ हो सकता है; जीवन्मुक्त हो सकता है। और वह वही हो सकता है, जिसमें अपना अभिमान नहीं। तो जो आज हरिजन माने जाते हैं, नीच माने जाते हैं उनको ज्ञान जितनी जल्दी सुगमतासे हो सकता है, उतनी जल्दी सुगमतासे अपने-आपको श्रेष्ठ माननेवालोंको नहीं हो सकता। कारण क्या? बड़प्पनका अभिमान पतन करनेवाला है, उस अभिमानको दूर करना ही पड़ता है।

‘दम्भो दर्पोऽभिमानश्च’ अभिमान आसुरी सम्पत्ति है, उन नीच वर्णवालोंके अभिमान काफी दूर हुआ रहता है, इस वास्ते कहा है—

नीच नीच सब तर गये राम भजन लवलीन।

जाति के अभिमान से डूबे सभी कुलीन॥

‘अभिमान’ का यह अर्थ नहीं कि मैं निंदा करता हूँ। मैं ऊँचे वर्णको ऊँचा ही मानता हूँ। परंतु वे ऊँचे तभी होंगे, जब ऊँचा कार्य करेंगे। कार्य नीचा करेंगे तो ऊँचापन कितना टिकेगा। वह ठहर नहीं सकता। जो कार्य अच्छा करेगा तो वह अपने-आपको भले ही नीचा माने, पर दुनिया उसे बड़ा मानने लग जायगी। जबर्दस्ती बड़ा मानेगी; क्यों, वास्तवमें वह बड़ा है। जैसे मैंने दृष्टान्त दिया था कि कृष्णभगवान् घोड़े हाँकनेवाले बने, सारथी बन गये। अठारह अक्षौहिणी सेना क्षत्रियोंकी, उन क्षत्रियोंके बीचमें अवतार लेनेवाले भगवान् घोड़े हाँकते हैं एक साधारण आदमीके। यह कोई बड़ा काम है क्या? बहुत छोटा काम है, उसे स्वीकार किया। भगवान‍्को घोड़ोंका कोचवान होते लाज नहीं आयी और छोटे-से-छोटे बन गये तो क्या हुआ? जिस समय उधर भीष्मजी महाराज शङ्ख बजाते हैं कौरव-सेनामें सबसे पहले। ‘तत: शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखा:’ फिर दूसरे शङ्ख बजाते हैं। यहाँ पाण्डव-सेनामें ‘पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय:’ सबसे पहले कृष्णभगवान् शङ्ख बजाते हैं। तो जो बड़ा होता है उसको बहम नहीं होता है कि मेरा छोटा आसन हो जायगा। मैं छोटी जगह कैसे बैठूँगा। यह बहम उन्हींको होता है, जो छोटे होते हैं वास्तवमें और बड़ा बनना चाहते हैं। कोई छोटा न मान ले, यह डर लगता है। वे अगर वास्तवमें बड़े हैं तो भय किस बातका? आप स्नेह करो, प्यार करो। हमारा जो समाज है वह धर्मकी प्रधानताको लेकर और मुक्तिका उद्देश्य लेकर है। दूसरोंका उद्देश्य प्राय: अपनी टोली बढ़ानेका है; उनमें धर्म नहीं है, मुक्ति नहीं है—यह मैं नहीं मानता हूँ। मुक्ति सबमें होती है और सबमें अच्छे-अच्छे आचार्य, सन्त-महात्मा हुए हैं और अब भी सबमें अच्छे आदमी हो सकते हैं। परंतु आज जो यह चाल-चलन चल रहा है, यह क्या है? यह केवल वोट ज्यादा आ जाय हमारे। इस वास्ते टोली बनानेकी बात चल रही है। यह तत्त्व नहीं है, तथ्यकी बात नहीं है; परंतु भोले-भालोंको तो लोभ ही दिया जाय और क्या किया जाय?

उपयोगकी महिमा

तीसरे, ये धनी धन-संग्रहमें लगे हैं। मेरेको दु:ख होता है पर अब किससे कहूँ? कोई सुनता नहीं। धन केवल संग्रह करनेके लिये नहीं है। सज्जनो! धन उपयोगके लिये है। महिमा वस्तुकी नहीं है, न वर्णकी है, न आश्रमकी है, न परिस्थितिकी है, न योग्यताकी है—महिमा उसके उपयोगकी है। सदुपयोग किया जाय तो कल्याण करनेवाली हो जाय धनवत्ता भी और दरिद्रता भी, बीमारी भी और स्वस्थता भी, पण्डिताई भी और मूर्खता भी। दुरुपयोग किया जाय तो पण्डिताई, बड़ाई, धनवत्ता ये सभी नरकोंका रास्ता हो जावेगा। तो धनका उपयोग बड़ा है। मानव-शरीरकी महिमा गायी गयी तो मानव-शरीरके उपयोगकी महिमा है। सज्जनो! शरीरकी महिमा नहीं है।

छिति जल पावक गगन समीरा।

पंच रचित अति अधम सरीरा॥

(मानस ४। ११। ४)

उत्तरकाण्डमें आया है—

‘नर तन सम नहिं कवनिउ देही।’

(मानस ७। १२१। ९)

एक ही ग्रंथमें गोस्वामीजी महाराजने एक ही लेखनीमें एक जगह उत्तम बताया है और एक जगह अधम बताया है।

‘जीव चराचर जाचत तेही’, ‘नरक स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी’॥ तो यह श्रेष्ठ क्यों है? उसका विवेचन करते हुए कहते हैं—ये छ: चीजें मिलती हैं मनुष्य-शरीरसे। उन छ: चीजोंमें एक नम्बर नरक, यह महिमा है। मनुष्य-शरीर सबसे बढ़िया है, क्योंकि साहब नरक मिल जाय इससे। तो यह महिमा हुई कि निंदा और बातें भी आयी हैं महिमाके प्रसंगमें।

सात प्रश्न किये हैं गरुड़जीने भुशुंडिजीसे। उनमें सबसे पहला प्रश्न है यह। सबसे उत्तम शरीर कौन-सा? मनुष्यका। उसकी महिमामें यह कहते हैं तो अर्थ क्या निकला? दुरुपयोग किया जाय तो नरक मिलेगा, चौरासी लाख योनियाँ मिलेंगी, महान् कष्ट पाना पड़ेगा। उपयोग अच्छा किया जाय तो महाराज! स्वर्ग मिल जाय, वैराग्य मिल जाय, ज्ञान मिल जाय, भगवान‍्की श्रेष्ठ भक्ति मिल जाय, इसी शरीरमें, इस वास्ते इस शरीरकी महिमा है। अगर यह श्रेष्ठ बातें नहीं की तो ऐसा शरीर मिलनेपर भी नरक ही मिलेगा। इस वास्ते ऐसे ही धनका आप उपयोग करो।

मेरे एक बातका दु:ख है, आप कृपाकर दु:ख दूर करो। आपने संग्रह करनेकी ही वृत्ति कर रखी है। केवल संग्रह करना बस, सहस्रपति, लखपति, करोड़पति बन जावें हम! खर्च कर नहीं सकते। अगर लाख रुपये रोकड़ी हो जायँ और उन रुपयोंसे वह व्यापार आदि करता है और लड़के काम करते हैं; करते-करते उस लाख रुपयेमेंसे कहीं दो-चार-दस हजार खर्च हो जाय तो बिगड़ता है मालिक कि तुम रोटी कमाकर खाओगे? अरे, मूलधन खर्च करते हो? कमाओ, खाओ और कुछ जमा करो। तो मूलधनके क्या तूली लगाओगे? क्या करोगे बताओ? कोरा अभिमान बढ़ाओगे। परंतु अब धुन हो गयी, एक ही बस। धन इकट्ठा करना है। सज्जनो! इकट्ठा करना क्या था? ‘यक्षवित्त: पतत्यध:’ यक्षवित्त होता है वह। यक्ष राक्षस हैं न, कुबेर आदि, ये धन इकट्ठा करते हैं। महाभारतमें कथाएँ आती हैं।

अगस्त्य ऋषि थे, महाराजासे मिलने गये तो महारानियोंके पासमें चली गयी ब्राह्मणी। उसके साधारण कपड़ा। रानियोंके बड़ा गहना रत्नोंका, बढ़िया साड़ियाँ पहननेके लिये। ब्राह्मणीसे रानियोंने कहा कि हमारे तो आप गुरु हो। आपकी ऐसी पोशाक! तो वह संग लग गया। घरपर आये तो ब्राह्मणीने कहा ‘हमारे भी गहना होना चाहिये। आपके जो यजमान हैं, शिष्य हैं, उनके तो ऐसा बढ़िया-बढ़िया गहना है और उनके गुरुके ऐसी बात!’ महाराजने समझा कुसंग लग गया। फिर राजाके पास गये तो राजाने सब बता दिया कि ‘महाराज! यह बात है। इतना खर्चा है, कहाँसे लावें?’ फिर दूसरेके पास गये, ऐसे बहुत-से राजाओंके पास घूम लिये। सबने आय-व्यय बता दिया। है नहीं पासमें तो कहाँसे दें? तो कहाँ मिलेगा! एक राक्षसके पास पहुँचे, उसके पास सोना मिला। उससे सोना लेकर आये। पाँच-दस दिन लग गये। उधर उतने दिनमें ब्राह्मणीने, जैसा भोजन मिलता था, वैसा अन्न खाया। जिससे मन शुद्ध हो गया। जब ऋषि सोना लेकर पहुँचे और बताया कि इस तरहसे राजाओंके यहाँ तो धन मिला नहीं। एक राक्षसके यहाँ धन मिला है। अब गहना कराना है, जितना करा लो। तो बोली कि मेरेको गहना नहीं चाहिये। मेरे तो गहना आप हो।

मेरे आपका जितना शृङ्गार है उतना राजा-महाराजाओंका शृङ्गार कहाँ है? राजा-महाराजा भी आपके चरणोंमें गिरते हैं। तो इतना सुन्दर गहना है कहाँ? गहना तो आप ही हो, हमें सोना नहीं चाहिये। पाछा दे आओ, हमें नहीं चाहिये। तो धन इकट्ठा करना यक्ष-राक्षसोंका काम है। धन कमाओ और अच्छे-से-अच्छे काममें खर्च करो। सत्यताके सहित शुद्ध रीतिसे कमाओ और उदारता सहित खर्च करो। इसका सदुपयोग करो। अपना जितना धन है, वह उपयोगमें कैसे आवे? वह भी हितमें कैसे लगे। ‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:’ प्राणिमात्रके हितमें रत हो। अपने पास जो कुछ है, धन हो, तन हो, मन हो, विद्या-बुद्धि हो, योग्यता हो, पद हो, अधिकार हो, जो कुछ मिल जाय, उसके द्वारा सबका हित कैसे हो? प्राणिमात्रके हितमें प्रीति होनी चाहिये; संग्रहमें नहीं। जो कुछ मिला है, अपना सम्पूर्णके हितमें लगाओ, जिससे कल्याण होगा। तो ऐसा भाव ठेठसे, ऊपरसे शुरू करो। अब वहाँसे शुरू करते हैं कि उनकी सेवा करो, उनका आदर करो। मैं तो कहता हूँ छोटा आदरका ही पात्र होता है। अपमानका, तिरस्कारका पात्र होता ही नहीं कभी। वह अयोग्य है कि योग्य, यह देखा नहीं जाता। छोटे बालकको योग्य देखा जाता है क्या? प्यार करते हैं, गोदीमें लेते हैं तो क्या योग्यता देखते हैं कि कितना पढ़ा-लिखा है, गुणवान् है कि बलवान् है, क्या विलक्षणता है? वह छोटा है—यही विलक्षणता है उसमें।

छोटे स्नेहके पात्र

ऐसे जो-जो छोटे हैं उनका आदर करो, तो ठेठ आदर हो जायगा। पर आप तो अभिमान वैसा ही रखो और चाहो कि वे हमारा आदर करें ऐसा कैसे हो जायगा। इसके अतिरिक्त ऐसे भी करो कि दूसरोंको अपने देखो मत। आपलोगोंसे कहना है कि हमलोगोंसे, साधुओंसे, ब्राह्मणोंसे भूल हो जाय; तो हम भूल कर गये तो आपलोग भी भूल करोगे? भूल कौन-सी बढ़िया बात है भाई! इस वास्ते आप तो उदारता रखो। प्यार करो, स्नेह करो, अपनाओ। आज कहते हैं छूआछूतसे अनर्थ हुआ है, छूआछूतमात्रसे नहीं हुआ है। इसमें स्वार्थ-वृत्ति ज्यादा है। हम तुम्हारे घर भोजन कर लेंगे, ऐसे नहीं कि अन्न, वस्त्र, रुपये, पैसे तुम्हें दे देंगे। उनके घर जाकर छाछ पी लेंगे तो घाटा और डाल दिया उनके। क्या फायदा हुआ? सहायता करो। मेरे बचपनमें देखी हुई बात है। देहातोंकी है, ऐसी देखी है मैंने। एक मेहतरके जँवाई आया, वह अपने यजमानके घर जाकर कहता है, ‘बापजी आपरो जँवाई आयो है।’ तो म्हारो जँवाई मेहतर होसी? महाराज! बढ़िया चीज, वस्तु, भोजन सब देते कि ले जाओ, जँवाईका सत्कार-पूजन करो। उनके जँवाई आते थे तो रुपया, नारियल देते थे। यह देखी हुई बात है मेरी। जँवाई देवता आया है तो हमारा जँवाई मेहतर होगा क्या? हमारा जँवाई मेहतर नहीं होगा; मेहतर-जँवाई होगा; क्योंकि हमारे हैं न ये। इस वास्ते इनका जँवाई हमारा जँवाई। यह प्रेम था।

राजपूतोंके, अच्छे-अच्छे ठाकुरोंके, जमींदारोंके घरोंकी स्त्रियाँ बाहर नहीं निकलती थीं। मेरे ऐसे शब्द सुने हुए हैं—‘कैसे जाऊँ? भाभीजी बैठी हैं।’ आदर करती थी ससुर-जैसा, इतना आदर करती और वे भी महाराज बड़ा प्यार, स्नेह रखते थे। बच्चा खेलता हुआ आता; मेहतरानी आयी है सफाई (अड़वाई)-के वास्ते और बच्चा आता है तो ‘देखो! कुँवरजीने ले जाओ म्हारे पासमें आवे।’ मनमें बड़ा भारी आदर था। सुख-दु:खमें सहानुभूति रखते थे। दु:ख कैसे मिटे? सुख कैसे हो? गीता कहती है—

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।

सुखं वा यदि वा दु:खं स योगी परमो मत:॥

(६। ३२)

उनके दु:ख किस बातका है, वह दूर करो। सुखके प्रलोभनमें आप आ नहीं सकते। कब? जब धर्मका ज्ञान होगा। धर्मका ज्ञान कब होगा? जब धर्म बताया जायगा। धर्म बताया कब जायगा? जब आप स्वयं धर्मात्मा बनोगे तब। अपने आचरण और भाव पहले शुद्ध करो। उनको निर्मल बनाओ। उनके निर्मल करनेसे दुनियामात्रकी शुद्धि होगी। सबका भाव ठीक हो जायगा बिना कहे-सुने आप-से-आप ही; एक नीयत शुद्ध होनेसे। इस वास्ते अपने भावोंको निर्मल बनाओ।

बालकोंपर जिम्मेवारी

बालकोंके लिये खास बात होती है। वे समझते हैं, हमारी क्या जिम्मेवारी है? हम तो बालक हैं। ऐसा कभी न समझें, आप खास करके समाजकी नींव हैं, नींव। बड़ी-बड़ी इमारतें उठती हैं, वे सब-की-सब खड़ी रहती हैं आधारशिला बुनियादपर, नींवके ऊपर। वह मजबूत होती है तब ऊपरकी इमारत बढ़िया बनती है। इमारतकी नींवके पत्थर जमीनमें रहते हैं देखता कोई नहीं। ऐसे बचपनको दुनिया नहीं देखती। दुनियाको दीखता है ऊपर आया हुआ विकसित जीवन; परंतु वह विकसित जीवन तब होगा, जब बचपनमें ठीक होगा। बच्चोंको समझना चाहिये कि हमारेपर अभी जिम्मेवारी क्या है? आप पढ़ाई करो, बड़ोंकी आज्ञाका पालन करो, कहना मानो। आज बहुत बड़े दु:खकी बात है कि बच्चोंमें अनुशासनहीनता आ रही है। मानते ही नहीं, उद्दण्ड होते चले जा रहे हैं। अब ऐसे बालक हो रहे हैं। उनको सिखावो—तो क्या सीखेंगे वे? वे कहते हैं हम छोटे कैसे हैं? बड़प्पनका अभिमान प्रारम्भसे भर जाता है। मैं तो कहता हूँ कि जो आदमी समझता है कि मैं पढ़ गया, समझदार हो गया, बड़ा हो गया, उसकी अगड़ी विकासकी बात तो होती ही नहीं; खतम ही हो गयी। उसका विकास कैसे हो? समझदार तो मैं हो गया। हमें तो विद्यार्थीपना अच्छा लगता है। उमरभर विद्यार्थी रहें। मनुष्य-जन्म विद्यार्थी-जीवन है यह। चौरासी लाख योनियोंमें विद्यार्थी-जीवन है मनुष्य-शरीर।

‘एहि तन कर फल बिषय न भाई।’

(मानस ७। ४४।१)

यह ब्रह्मविद्या लेनेके लिये विद्यार्थी-जीवन है। छोटे बालक तो विद्यार्थी हैं ही, दोनों तरफसे ही मनुष्य-शरीरकी दृष्टिसे विद्यार्थी और अध्ययनकी दृष्टिसे भी विद्यार्थी।

विद्यार्थियोंपर जिम्मेवारी

अभी जो विद्यार्थी अच्छे बनते हैं, वे ही आगे चलकर अच्छे पण्डित बनते हैं। बचपनमें श्रेष्ठ बनेंगे, वे ही अगाड़ी चलकर श्रेष्ठ बनेंगे। बच्चोंके लिये याद रखनेकी बात बताता हूँ। जितने-जितने महात्मा हुए हैं, जितने महापुरुष हुए हैं वे सब-के-सब पहले बालक थे, बालक। आपको सोचना चाहिये कि हम भी बालक हैं। हम भी वैसे ही बन सकते हैं। तो बड़प्पनका जो अभिमान अपनेमें है, वह तो नहीं होना चाहिये, पर महत्त्वाकांक्षा जरूर होनी चाहिये। अपने जिस जगह हैं, उससे ऊँचे बढ़ें। ऊँचे तभी बढ़ेंगे, जब अपनेको छोटा मानेंगे। ‘जो कुछ थोड़ा सीखे हैं, किसीके होके सीखे हैं।’उनसे शिक्षा मिली है, उनसे शिक्षा लेनी चाहिये। आचरण अच्छा बनाओ, सेवा करो, खूब उमंगपूर्वक, उत्साहपूर्वक। बच्चियोंको भी चाहिये कि अपनी माँकी, भाभीकी सेवा करें। लड़कोंको भी चाहिये कि अपने माता-पिताकी, गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन करें, उनकी सेवा करें, उनको सुख पहुँचावें।

‘गुरुशुश्रूषया विद्या पुष्कलेन धनेन वा’

अपने पास और क्या है? सेवा ही कर सकते हैं। न तो ऐसा अलौकिक गुण है जिसके बदलेमें गुरुजी महाराज सिखा दें। न इतना धन है, जो उनको देकर राजी कर लें। सेवा करें, सेवा करना क्या है? ध्यान देना। बालको! असली सेवा क्या है? पढ़ाई करो तो गुरुजीकी सेवा क्या है? जो गुरुजीने पढ़ा दिया, वह ठीक याद हो, सब-का-सब, गुरुजनोंकी सेवा हो जायगी। सभाके बीचमें पूछा जायगा और आप ठीक तड़ातड़ (तुरंत) उत्तर दोगे तो दूर बैठे-बैठे गुरुजी खुश हो जायँगे, प्रसन्न हो जायँगे, धनसे उतने राजी नहीं होंगे। कितनी बढ़िया बात है, विद्या तो आपको मिले और सेवा हो जाय गुरुजीकी, दोनों बातें बढ़िया।

नमस्कारकी महिमा

(उदाहरण मार्कण्डेय)

रोजाना सुबह-शाम माता-पिताके चरणोंमें नमस्कार करो।

अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविन:।

चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्या यशो बलम्॥

जो रोजाना बड़ोंके चरणोंमें नमस्कार करता है और बड़ोंकी शिक्षा लेकर चलता है, उसके चार चीजें बढ़ती हैं, एक विद्या आती है, एक संसारमें यश-कीर्ति बढ़ती है और एक बल आता है। और एक बात है। उमर बढ़ती है, कितनी विलक्षण बात है।

मृकण्डु ऋषि थे, जिनके मार्कण्डेय हुए। वे नमस्कार करते थे। एक सिद्ध पुरुष वहाँ आ गये, पिताजीने कहा—‘बेटा! नमस्कार करो।’ तो महाराज देखने लग गये सामने! एक टकटकी लगाकर देखते रहे। पिताजीने पूछा—‘महाराज! क्या देखते हो?’ ‘बच्चा तो अच्छा है, पर इसकी उमर बहुत थोड़ी रह गयी।’ तो ऋषिने पूछा—‘महाराज क्या करें!’ उन्होंने कहा—‘सन्त-महापुरुष आवें, ऋषि-मुनि आवें उनके चरणोंमें नमस्कार करवाओ।’ सप्तर्षि आ गये। पिताजीने कहा—‘नमस्कार करो।’ (महाभारतकी कथा है यह) तो उन्होंने नमस्कार किया। उन्होंने ‘चिरंजीवी बन जाओ’ ऐसा आशीर्वाद दे दिया। पिताजीने पूछा—‘महाराज! आपने आशीर्वाद तो दे दिया है, पर देखा नहीं कि कितनी उमर है।’ उधर ध्यान दिया तो कहा—‘उमर तो कम रह गयी।’ पूछा—‘तो महाराज, आपके वचनोंका क्या होगा? और हाल क्या होगा इसका’? तो कहा—‘भाई! भगवान् शंकरकी सेवा करो।’ अब शंकरकी सेवामें लगा दिया उसको। समयपर महाराज! यमराज खुद भैंसेपर चढ़े हुए लाल वर्णवाले आये, वह डर गया, डरकर भगवान् शंकरको बाँहोंमें पकड़ लिया कि महाराज! यह यमराज आ गया। शंकर प्रकट हो गये त्रिशूल लेकर। ‘क्यों? कहाँ ले जाता है तू इसको!’ ‘महाराज! इसकी उमर खतम हो गयी।’ ‘देख तो सही चोपड़ीमें कहाँ खतम हो गयी?’ देखें तो बाकी है साहब। शंकर करे सो हो जाय। ‘हटो यहाँसे’। मार्कण्डेय ऋषि चिरंजीवी हो गये। ‘सप्तैते चिरजीविन:’ कितनी विलक्षण बात है। किस बातसे? नमस्कार करनेमात्रसे।

नमस्कारसे रामदास, कर्म सभी कट जाय।

जाय मिले परब्रह्ममें आवागमन मिटाय॥

‘एकोऽपि कृष्णस्य कृत: प्रणामो

दशाश्वमेधावभृथेन तुल्य:।

दशाश्वमेधी पुनरेति जन्म

कृष्णप्रणामी न पुनर्भवाय॥

(महा०, शान्ति० ४७। ९२)

शाठ्येनापि नमस्कार: क्रियते चक्रपाणये।

बद्ध: परिकरस्तेन मोक्षाय गमनं प्रति॥

भगवान‍्को शठतासे भी नमस्कार कर ले तो उसका कल्याण हो जाय। नम्रतासे सब चीज मिलती है भाई! इस वास्ते रोजाना माता-पिता, गुरुजन सबको नमस्कार करो। बड़ा भाई, बड़ी बहन है उसको भी नमस्कार करो। जो बड़े हैं, पूजनीय हैं, आदरणीय हैं उन्हें भी नमस्कार करो। भाई-बहनोंसे कहना है कि यह नियम तो अपने-अपने घरोंमें डाल ही दो। आप बड़े जब नमस्कार करेंगे तो ये छोटे आप-से-आप नमस्कार करेंगे। ‘यद्यदाचरति श्रेष्ठ:।’ आपसमें लड़ाई नहीं होगी। गृहस्थीमें साथमें रहना पड़ता है। हम तो साधुलोग हैं।

‘मन मिले तो मेला कीजे, चित्त मिले तो चेला।

ज्ञान मिले तो सतगुरु कीजे, नहीं तो भला अकेला’॥

जरा खटपट होते ही तुंबी लेकर चल देंगे, तुम कहाँ जाओगे? इस वास्ते तुम्हारेको तो प्रेम रखना आवश्यक है, प्रेम रहता है नमस्कार करनेसे।

देवरानी रोजाना जेठानीके चरणोंमें नमस्कार करे तो कभी लड़ जाय तो, राँड कह सकती है क्या? देवर चरणोंमें पड़ता है रोजाना आ करके भाभीजीके, तो क्या वह कड़वी जबान कह सकती है? लड़ाई नहीं हो सकती। हो जाय तो टिक नहीं सकती। शामको उनको नमस्कार करो, मिट जायगी। रात्रिमें खटपट हो तो सुबह नमस्कार करो तो मिट जायगी। लड़ाई रखोगे तो नमस्कार नहीं होगा। नमस्कार करोगे तो लड़ाई नहीं रहेगी। यह है नियम। दोनों एक साथ खटेंगी नहीं। आपके घरोंकी लड़ाई मिट जाय। कितनी बढ़िया बात।

काम-धन्धा करे अगाड़ी हो करके; वह कहे मैं करूँ, मैं करूँ। ऐसे ही बालक-बालिकाओंको चाहिये कि काम तो हम करेंगे। बच्चियोंको चाहिये कि सब काम सीखें, सब बातें सीखें। कातना सीखें, गूँथना सीखें, पीसना सीखें, झाड़ू देना सीखें, रसोई बनाना सीखें। सीखोगी तो अगाड़ी जाओगी तथा आपकी और आपके माताकी, कुटुम्बकी प्रशंसा होगी। नहीं तो महाराज सास गाली देगी, गाली। ‘माँ राँड सिखाई कोनी इनै’ (माँने इसको सिखाया नहीं) बताओ घर बैठे माँको गाली मिले। अगर तुम ऐसा सीख जाओ, घरमें ऐसी चतुराईसे काम-धन्धा करो तो ‘वाह-वाह भयी, अच्छे माँ-बापकी बेटी है, बहुत ठीक है, अच्छे घरानेकी लड़की है’ ऐसी प्रशंसा करेंगे। तो आपकी प्रशंसा, आपके कन्याकी प्रशंसा, कुटुम्बकी प्रशंसा। नहीं तो सबका नीचापन होगा। ऐसे आदर करो, प्रेम करो। बड़ोंको तो चाहिये छोटोंको प्यार करें, छोटोंको चाहिये कि बड़ोंकी आज्ञा मानें, हुक्म मानें, आचरण सीखें, अच्छी-अच्छी बातें उनकी सीखें और कहीं कोई बतानी हो बात तो नम्रतासे कह दें।

सुधारका सुन्दर तरीका

हमने सुनी है (पुस्तकोंमें नहीं देखी है)। एक बार युधिष्ठिरजी महाराजने किसी ब्राह्मणको कह दिया कि हम आपको कल-परसों दान देंगे तो भीमसेनने जा करके नगाड़े बजाये। युधिष्ठिरने पूछा, ‘नगाड़े किस बातके’? तो भीमसेन बोला ‘बड़े आनन्दकी बात है कि परसोंतक आप-हम सब जीते रहेंगे, मौज हो गयी हमारे। आप सत्यवादी हो, आपने कह दिया कि कल-परसोंतक दान देंगे तो कोई मरेगा तो दान कैसे करेगा?’ तो खुद भी नहीं रहोगे तो दान कैसे दोगे? इस वास्ते अब तीन दिनतक तो मरेंगे नहीं। बड़े आनन्दकी बात है। युधिष्ठिरने कहा—‘भैया ! भूल हो गयी’। ‘अब हितकी बात कह दी तो भूल हो गयी’ तो बड़ोंको शिक्षा कैसे दी जाय? यह थोड़े ही है कि ऐसा कहो, ‘आप झूठ बोलते हैं, आपने कैसे कह दिया’? और खुशी मनाओ।

एक ब्याह करके लड़की आयी अपने घरपर ससुरालमें। लड़का एक ही था, तो एक लड़का, एक सास, एक दादी सास। तो वहाँ जाकर देखा तो दादी सासका अपमान हो रहा है, तिरस्कार हो रहा है। ठोकर मार दे, गाली दे दे, छोरीकी सास। यह देखा तो छोरीको बड़ा बुरा लगा, अब कहूँ कि माँ, ऐसा मत करो, तो कहेगी कि कलकी छोरी आकर उपदेश देती है, गुरु बनती है। अत: ऐसा नहीं कहा उसने। वह काम-धन्धा सब करके दोपहरमें जाकर दादीजीका चरण चम्पी करे, उनके पास बैठे। अब वह ज्यादा बैठे तो सासको सुहावे नहीं। वह कहती है ‘बीनणी! वहाँ क्या करती हो?’ ‘बोलो! काम बताओ।’ ‘काम क्या बतावें! वहाँ क्यों जा बैठी’, तो बहूने कहा—मेरे पिताजीने कहा है—‘देखो बाई। जवान छोकरोंके पास बैठना ही नहीं कभी; छोरियोंके साथ भी नहीं बैठना; बडे़-बूढ़े हों उनके पास बैठना; उनसे शिक्षा लेना।’ हमारे घरमें सबसे बूढ़ी ये ही हैं तो और किसके पास बैठें? मैं उनसे यह पूछती हूँ कि मेरी सास आपकी सेवा कैसी करती है? क्योंकि मेरे पिताजीने कहा है बेटा! हमारे घरकी रिवाज नहीं चलेगी वहाँ, वहाँ तो रिवाज तेरे ससुरालकी चलेगी। तो मेरेको यहाँकी रिवाज सीखना है, सीख लूँ।

सासने पूछा—बुढ़ियाने क्या उत्तर दिया? ‘वह बोली कि ठोकर नहीं मारे, गाली न दे तो मैं तो सेवा ही मान लूँ। क्या तू ऐसा करेगी’? मैं नहीं कहती हूँ ऐसा। पिताजीने कहा है, ‘बड़ोंसे सीखना’। सासजी डरने लग गयी कि जो आचरण करोगे अभी अपनी सासके साथ, वह तेरे साथ आचरण तैयार होने लग जायगा। डर गयी! उसका आचरण सुधर गया। एक जगह कोनेमें ठीकरी इकट्ठी पड़ी थी, ‘वीनणी, ये ठीकरी क्यों इकट्ठी की है’? आज तो घड़ा मटकी आपण घणा ही है सासूजीको देवो हो न आप भोजन ठीकरीमें, तो मैं काहेमें दूँगी? इस वास्ते पहले ही जमा कर लिया’! ‘तू मेरेको ठीकरीमें भोजन करायेगी। मेरे पिताजीने कहा है तेरे वहाँकी रिवाज चलेगी।’ तो सास कहती है ‘यह रीति थोड़े ही है’ ‘तो आप देते क्यों हो’? थाली माँजे कौन, ‘थाली माँज तो मैं दूँगी’। ‘तो तू थालीमें दिया कर। उठा ठीकरा बाहर फेंक, अपने क्या करना है’? अब थालीमें भोजन देवे। सबको भोजन देनेके बादमें जो बाकी बचे, वो खिचड़ी-खिचड़ाकी खुरचन और दाल बची हुई जिसमें नीचे काँकरा बचे, अब वे देवे तो बहू देखे। ‘वीनणी ! क्या देखें? देखूँ कि बडेरोंको भोजन कैसे दिया जाय’? देखै क्या है? ‘ऐसा भोजन बड़ोंको देना चाहिये न’। देनेकी कोई रीति थोड़े ही। तो, पहले ‘कुण (कौन) देवे’? तो आज्ञा दे दो ‘मैं दे दूँगी’। ‘तो तू पहले भोजन दे दिया कर’। ‘अच्छी बात?’ रसोई बनते ही चट ताजी खिचड़ी, फुलका, साग ले जाकर माँजीको दे दे।

माँजी तो मन-ही-मन आशीर्वाद देने लगी। जीवन सुधर गया माँजीका, बेचारीकी सेवा होने लग गयी। अब बाहर साली (बाहरका कमरा)-में खटिया डाली हुई उसीपर पड़ी रहती बूढ़ी माँजी। वह टूटी हुई खटिया, बन्दनवार होवे ज्यों लटके उसमें मूँज। तो वह बहू देख रही थी। सास पूछे कि क्या देखे? ‘निगह करूँ कि माइतोंको खाट कैसी दी जाय’? ‘ऐसा दिया थोड़ा जाता है, टूट जानेसे ऐसा हो जाता है। तू बिछा दे दूसरी’। ‘आप आज्ञा दो’। अब बढ़िया निवारका ढोलिया लाकर बिछा दिया। कपड़ा धोने दिया तो कपड़ा ‘सांगरी-सांगरी होयोड़ा। क्या देखती है’? देखती हूँ कि बुड्ढोंको कपड़ा कैसा दिया जाय’। सास बोली ‘फिर वही बात! ऐसा कोई दिया थोड़ा जाता है? यह फट जाता है, तो हो जाता है ऐसा’। बहूने पूछा, फिर वही रहने दें क्या? ‘तू बदल दे’। अब महाराज! पथरना, सोड़िया, (बिछौना, रजाई) बदल दिया, कपड़ा बदल दिया। अच्छी तरहसे माँजीकी सेवा करे। अच्छी तरहसे सफाई रखे खूब। अब देखो सासुको शिक्षा कैसे दी जाय? कितनी चतुराईसे दी, अगर उसको वह उपदेश देने लगे तो मान लेगी क्या?

माँ-बापकी सेवा

लड़कियोंको चाहिये कि ऐसी बुद्धिमानीसे अच्छा-अच्छा गुण अपनेमें लावें और स्वयं सेवा करें। सब सेवा करती, सब रसोई बनाती, झाड़ू देती, बर्तन माँजती, सब काम करनेपर भी राजी करना सासको भी और दादी सासको भी। तो ऐसे काम आप करोगी तो उसका असर पड़ेगा। कोरी बातोंसे असर नहीं पड़ता। आचरणका असर पड़ता है। तो ऐसे बच्चोंको भी चाहिये अपने घरोंमें खूब काम करें, उत्साहपूर्वक काम करें। गाय आदि है तो उसका काम करें, घरका काम करें। आज-कलके लड़के बड़े हो जाते हैं तो स्वयं सेवक बन जाते हैं। लाठी लेकर जाते हैं कि समाजकी सेवा करेंगे। स्वयं सेवक हैं वे, अपने ही सेवक हैं वे। जहाँ महिमा होती है, वहाँ काम करेंगे। पिताजी चाहे बीमार पड़े रहें। माँ-बाप बूढ़े हों, बीमार हों तो दवाई भी लाकर नहीं देते। क्योंकि घरमें वाह-वाह करनेवाला कोई भी नहीं है। हम स्वयं सेवक हैं।

हमारे काम पड़ा है। हरिद्वार ऋषिकेशमें रहते हैं तो लड़के आते हैं जवान-जवान। ‘कैसे आये? घरसे भागकर आये हैं’। ‘अरे कागज तो लिखो कम-से-कम कि हम यहाँ आ गये हैं। वे लोग ढूँढ़ते होंगे, कितना रुपया लगेगा, कितनी चिंता होगी, क्यों आ गये’? ‘सेवा करेंगे’। ‘माँ-बापकी सेवा करते।’ ‘माँ-बाप तो स्वार्थी हैं, वे तो अपना काम कराते हैं।’ तुम परमार्थी कहाँसे आ गये भाई? स्वार्थियोंके परमार्थी कैसे जनम गये? अरे! माँ-बापकी सेवा ली है, कर्जा तो उतारा ही नहीं, दान करनेको चले। पहले कर्जा तो उतारो। माँ-बापने किस तरहसे पालन किया है। बड़ा किया है, योग्य बनाया है, पढ़ाया है, खर्चा किया है उनकी सेवा छोड़ देते हो। दुनियाकी सेवा करेंगे। दुनियाकी सेवा पीछे; पहले माँ-बापकी सेवा। घरवालोंकी सेवा पहले करो। क्योंकि उनका कर्जा है सिरपर। कर्जा तो उतारो कम-से-कम तब सेवा होगी। तो ऐसा अभिमान भर गया कि माँ-बाप तो स्वार्थी हैं, हम तो सेवा करते हैं। वे स्वार्थी हैं तो क्या हुआ तुमने तो उनसे लिया है। दुनियामें चाहे वे अपना स्वार्थ करते हों पर तुम्हारा तो परमार्थ किया है कि नहीं? तुम्हारी तो सहायता की है कि नहीं? ऐसे माँ-बापकी सेवा करो, आज्ञाका पालन करो।

‘अग्या सम न सुसाहिब सेवा’ मनुस्मृतिका दूसरा अध्याय आप पढ़ो, ये देवता हैं साक्षात्, माँ और बाप। माँ पृथ्वी है, अन्तरिक्ष देवता हैं पिता। इनकी सेवा करनेसे त्रिलोकीकी सेवा हो जाती है, त्रिलोकी तृप्त हो जाती है। इस वास्ते बड़ोंकी सेवा करनेसे भगवान् बड़े खुश होते हैं। आप भजन करोगे, माँ-बापका कहना नहीं मानोगे, गुरुजीका कहना नहीं मानोगे तो भगवान् स्वीकार नहीं करेंगे कि यह अपने माँ-बापका भी नहीं हुआ तो तुम्हारा कबतक होगा भाई यह? क्या भरोसा है इसका? गुरुजन भी महाराज, उसको पसन्द नहीं करते, जो माँ-बापकी सेवा नहीं करता। उनकी सेवा करो।

पढ़ाईका उद्देश्य

पढ़ाई करो तो वहाँ गुरुजनोंकी सेवा करो। आज लड़कोंमें उद्दण्डता आ गयी। पहले तो महाराज! गुरुजन जिसको रखते वह विद्यार्थी रहता और जिसको निकाल देते वह निकल जाता। आज विद्यार्थी बना लेते हैं यूनियन। निकालो हमारे पण्डितजीको निकालो, गुरुजीको निकालो। आज छोरा रखें जिसको, वह तो गुरुजी रहे और वे निकाल दें तो निकल जाय। उनको समझते हैं नौकर। नौकरसे काम होता है विद्या नहीं ली जाती, विद्या बड़ोंसे ली जाती है। इस वास्ते आज देख लो बड़ी-बड़ी विद्याओंमें, बड़ी-बड़ी परीक्षाओंमें पास हो जाते हैं, पर ज्ञान नहीं है। शास्त्री और आचार्य हो जायँ, मध्यमामें, शास्त्रीमें पास हो जायँ तो आभ्यन्तर प्रयत्न और बाह्य प्रयत्न बता नहीं सकते ठीक तरहसे।

ऐसे काम पड़ा है। एक पण्डितजी कहते थे, इतना भी ज्ञान नहीं ‘संज्ञाप्रकरण’ का। पढ़ गये ऊँचे और पास हो गये। तो क्या धुन रहती है? बस, पास हो जायँ। अरे भाई! पास होनेके लिये पढ़ाई नहीं होती है। पढ़ाई करनेके लिये परीक्षा दी जाती है। पढ़ाई करना परीक्षाके लिये नहीं। परीक्षाके लिये पढ़ाई करता है तो याद नहीं रहती है, अभी परीक्षा है। इस वास्ते याद करके दे दी परीक्षा; फिर भूल गये। अरे! पढ़ाईके लिये परीक्षा होती है, जिससे अपनेको संतोष हो जाय, गुरुजनोंको संतोष हो जाय। हमारे संरक्षक महानुभाव हैं, उनको संतोष हो जाय, इस वास्ते परीक्षा देते हैं। पढ़ाई तो बोधके लिये करना है। उस तत्त्वको किस तरहसे समझना है हमें! जो पढ़ गये और दूसरोंको पढ़ा नहीं सकते तो क्या पढ़े? ठीक तरहसे बुद्धिमान् लड़कोंको पढ़ा सको आप, तब तो आपने ठीक पढ़ाई की, इस वास्ते अध्ययन पूरा करो, अच्छी तरहसे। जिस काममें लगो, उस कामको साङ्गोपाङ्ग ठीक तरहसे पालन करो।

मैं तो कहता हूँ बुद्धिमान् मनुष्य अपना समय बर्बाद नहीं करता। विद्यार्थीको तो—

क्षणश: कणशश्चैव विद्यामर्थं च चिन्तयेत्।

क्षणत्यागे कुतो विद्या कणत्यागे कुतो धनम्॥

एक क्षण भी निरर्थक न जावे। न जाने दे। महाराज! एक-एक क्षण बड़ा कीमती है। याद रखो, बड़ी अवस्था होनेपर आपको पूछेंगे कितना बरस पढ़े? बीचमें चाहे पढ़ाई करें, चाहे प्रमाद करें, चाहे बीमार हो गये, चाहे घरपर चले गये, स्कूलमें नहीं गये। यह कोई गिनती नहीं करेंगे। अमुक वर्षसे अमुक वर्षतक इतनी पढ़ाई करी। इतनी पढ़ाई हुई तुम्हारी? क्या उत्तर दोगे? नहीं तो भाई, इतना वर्ष पढ़े, हमारेको पूछ लो इतना पढ़ा है इतने दिनोंमें। लोग भी कहेंगे कि इतने दिनोंमें इतनी पढ़ाई कर ली, बड़ी अच्छी बात। आजकलका कोर्स तो बहुत छोटा है। पढ़ाई बहुत कम होती है, छुट्टियोंमें बहुत समय बर्बाद होता है; विशेष बर्बाद होता है; पर आपलोग सजगतासे रहोगे कि समय एक क्षण भी खराब नहीं करना है। खर्चा अपने शरीरके लिये थोड़े-से-थोड़ा करना है।

कलकत्तामें एक छोरेकी माँग पूरी नहीं हुई, खर्चा ज्यादा किया, माँगा ज्यों नहीं मिला तो जलकर मर गया। बताओ, माँ-बापको कितना दु:ख होता है। अपने खर्चा क्यों चाहिये? माँ-बाप दें उतने खर्चेसे काम चलाओ अपना। खर्चीला जीवन होनेसे आदमी परतन्त्र होता है। बचपनमें खर्चीला होनेसे बहुत ही ज्यादा दु:ख पायेगा उम्रभर। सादगीसे पढ़ा हुआ उम्रभर सुखी रहेगा। हमारे क्या चाहिये? साधारण कपड़ा पहन लिया, रोटी खा ली बस। खर्चा है ही नहीं ऊलफेल (फालतू)। इस वास्ते हरेक भाई-बहनको यह बात चाहिये। बड़ोंकी सेवा करो। ये बड़ी अवस्थावाले हैं न उनमें भी जो माँ-बाप हैं, पूजनीय हैं, आदरणीय हैं, उनके सामने हम भी बालक ही हैं; इस वास्ते हमें अच्छा काम करना चाहिये, जिससे उनकी सेवा बन जाय और वे प्रसन्न रहें। प्रसन्नता लो उनकी, आशीर्वाद लो उनका, जिससे विद्या आदि आवेगी। माता-पिताकी सेवासे, गुरु-सेवासे बड़े-बड़े ऋषि-मुनि हो गये, सन्त हो गये, राजा-महाराजा हो गये, विद्वान् हो गये।

आज्ञा-पालनसे लाभ

हमने ऐसे दृष्टान्त सुने हैं और कुछ-कुछ देखे हैं। कलकत्तामें बहुत पुरानी बात है। दो हजार संवत् से पंद्रह-बीस वर्ष पहलेकी बात है। एक दादू-पंथी सन्त थे। मैंने उनसे कहा, ‘महाराज, आप भी कुछ सुनाओ तो खड़ा होकर बोलने लगे।’ अच्छे पण्डित थे। वाल्मीकिका एक श्लोक बोल दिया; अब अर्थ करने लगे तो श्लोक नहीं उठा। दु:खी हो गये। बात क्या है! तो कहा कि मैं पढ़-लिखकर अपने गुरुजीके स्थानपर गया। हमारे गुरुजी भजनानन्दी थे, पढ़े-लिखे नहीं थे, विद्वान् थे नहीं, मैं पुस्तक लिख रहा था। गुरु महाराजके घरमें काम था, ‘ईंट-चूना पड़ा है, इतना पत्थर मँगाओ, आदमी बुला लाओ,’ ऐसा कहते तो कई बार तो मैंने किया, एक बार कह दिया कि ‘यह तो कोई मूर्ख ही काम कर देगा’। गुरुजीने कहा ‘तू मूर्ख हो जा’। तबसे यह दशा हो गयी। फिर मैं घबराया चरणोंमें गिरा तो कहा ‘इतने वर्षों बाद ठीक हो जायगा’। अब एक-दो वर्ष बाकी है। गुरुजनोंकी राजी लेनेसे फायदा होता है, नुकसान नहीं होता।

एक आत्मानन्दजी थे वे पढ़े-लिखे थे, पढ़ाते थे। उनके शिष्य नारायण मुनिजी महाराज, नाम सुना होगा, बड़े प्रसिद्ध सन्त हुए हैं। रतलाम आदिके दरबार उनको मानते थे। बड़े सुन्दर-मूर्ति और भव्य थे। मेरे दर्शन किये हुए हैं। गुरुजीके खाँसी-दमेकी शिकायत थी, उन गुरुजीकी सेवा करते। वे प्रसन्न होकर कहते ‘बेटा नारायण! अब पढ़, तब पढ़ते, नहीं तो वे सेवामें ही रहते। दमेकी शिकायतमें तो बोलना कम होता ही है। ऐसी सेवा की महाराज! जिसमें इतने नामी विद्वान् हो गये फारसी और संस्कृतके। हिन्दू और मुसलमानोंकी दोनोंकी सभामें वे सुनाते थे अच्छी तरहसे। गुरु-सेवासे लाभ होता है और गुरुका तिरस्कार करनेसे हानि होती है।

एक कनफटे कृष्णानन्द थे। वे पढ़े नवद्वीपमें, पढ़ करके अपने ही गुरुजीसे कहा—‘शास्त्रार्थ कर लीजिये मेरेसे न्यायके विषयमें’। तो गुरुजीने कहा—‘जा भूँकता फिरेगा कुत्तेकी तरह’। उन दिनों महामहोपाध्याय केशवानन्दजी महाराज कनखलमें थे। वहाँ वह आया कि आपसे शास्त्रार्थ करूँगा। आप भारत-भूषण हुए हैं और महामहोपाध्याय हैं तो मेरेसे बात कर लीजिये। लोगोंने कहा—‘अरे कुत्तेको निकालो, कहाँसे आ गया? निकालो इसे’। तिरस्कार करके निकाला। अब नामी विद्वान् था। शास्त्रार्थमें झड़का दे हरेकको, पर अपमान ही हुआ; तिरस्कार ही हुआ। तो गुरुओंका तिरस्कार करनेसे तिरस्कार होता है।

आप कहते हो कि हमारी वीनणी काम नहीं करती तो तुमने दूसरोंके घरपर वीनणी कैसी भेजी है? छोरीको सिखावे कि ‘तू धन तेरा इकट्ठा कर लेना; वह तेरा तेरे पास रह जायगा। जब अलग होओगे तब तो तेरे पास आ जायगा। काम तू अकेली क्यों करे? सभी करो’। अब ऐसे काम-धन्धा तो नहीं करना और धन ले लेना, ये दो महान् पतनकी बातें है। वे सिखा-सिखाकर आप छोरियोंको भेजते हैं, घरोंमें शान्ति होगी कि अशान्ति? उनको यह सिखाना चाहिये, ‘ना बेटा! अपने तो काम करो, जहाँ जाओ, उत्साहसे घरका काम-धन्धा करो, उनकी प्रसन्नता लो’।

ऐसे ही लड़कोंको चाहिये कि उदारता रखो भाई। काम-धन्धा करो, सेवा करो, चीज-वस्तुओंके द्वारा भी सेवा करो, तो कितना बढ़िया काम होगा। ऐसी बात जाननेकी कमी नहीं है करनेकी कमी है। जाननेकी कमी तो कोई जानकार है, वह दूर कर देगा। पर करनेकी कमीको तो आपको ही दूर करना होगा। उसे काममें लाओ। दूसरोंको समझाते समय तो विद्या आ जाती है महाराज!

पर उपदेस कुसल बहुतेरे।

जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥

(मानस ६। ७८। २)

परोपदेशवेलायां शिष्टा: सर्वे भवन्ति हि।

विस्मरन्तीह शिष्टत्वं स्वकार्ये समुपस्थिते॥

अपना काम आ जाय, तब भूल जाते हैं—यही तो बड़ी गलतीकी बात है।

‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।’

(गीता १८। ४५)

ठीक तरहसे बालकों-बालिकाओंको अपना कर्तव्य पालन करना चाहिये। गुरुजनोंकी आज्ञा माननी चाहिये। माता-पिता, गुरुजन हैं—ये महाराज! तीन लोक हैं। ऐसा मनुजीने लिखा है। लड़कोंके लिये यहाँतक लिख दिया कि तीर्थपर जायँ तो उसका फल भी माँ-बापके ही अर्पण करें। अपने लिये धर्म, पुण्य आदि कुछ करना ही नहीं है, केवल माँ-बापकी सेवा करना है। लड़का समझता है कि हम तो परतन्त्र हैं, आप जितने छोटे हो, आप तबतक स्वतन्त्र हो। बड़े बन जाओगे, तब पराधीन हो जाओगे, समाजके, बहुत-से आदमियोंके। आपपर उलाहना आयेगा। अभी छोटे हो तो आपको कौन पूछे? गलती हो गयी तो हो गयी। इस वास्ते स्वतन्त्रता उसका नाम है, जिसमें पराधीनता न हो।

(दिनाङ्क ९ अगस्त, १९८१)