प्रवचन—२

प्रश्न—पुरुषोंके पुनर्विवाहका विधान क्यों है? स्त्रियोंके लिये क्यों नहीं? ऐसा प्रश्न है।

पुनर्विवाहके विषयमें पुरुषों और स्त्रियोंके लिये एक-सा विधान नहीं है। शास्त्रोंमें पुरुषोंके लिये तो पुनर्विवाहका विधान है, पर स्त्रियोंके लिये पुनर्विवाह करनेका विधान नहीं है। मनुजीने लिखा है कि राजा बेनने स्त्रियोंके लिये पुनर्विवाहकी जो छूट रखी थी, वह शूद्र वर्णमें मानी गयी और किसी वर्णमें नहीं, ऐसी बात मनुजीकी आती है।

विवाहका पवित्र उद्देश्य

वास्तवमें देखा जाय तो विवाह करना कोई खास बात नहीं है। हमारे शास्त्रोंमें लिखा है कि मनुष्य-जन्म मिला है परमात्माकी प्राप्तिके लिये। इस वास्ते ब्रह्मचारियोंके दो भेद बताये हैं—एक नैष्ठिक ब्रह्मचारी और दूसरा उपकुर्वाण ब्रह्मचारी। ये दो विभाग क्यों किये? जो जन्मसे ही परमात्माकी तरफ लग जायँ और उनके यह बात समझमें आ जाय और परमात्माकी ओर ही चलें वे ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ होते हैं। परंतु जो विचारके द्वारा मनको नहीं समझा सके; भोगोंकी इच्छाका त्याग नहीं कर सके, तो वे भोगेच्छाका त्याग करनेके लिये विवाह करें। विवाह सुख-भोगके लिये नहीं करे, त्यागके उद्देश्यसे करे। बिना सुख भोगे अगर त्यागनेमें कठिनता पड़ती हो तो शास्त्रकी विधिसे विवाह करके गृहस्थाश्रममें रहे। जिस दिन वैराग्य हो जाय, उस दिन त्याग कर दे। तो त्याग ही तत्त्व है। यह हमारा सिद्धान्त है; भारतीय संस्कृतिकी रीति है।

मानव-शरीरमें‘एहि तन कर फल बिषय न भाई’। (मानस ७। ४४। १) मूलमें विचारपूर्वक त्याग न कर सके, उनके लिये यह बताया है कि उपकुर्वाण ब्रह्मचारी होकर फिर विधि-विधानसे स्नातक बनकर ठीक तरहसे विवाह करे। केवल उसका तत्त्व जाननेके लिये, सुख भोगनेके लिये नहीं। आजके युगमें सब लोगोंके लिये कहता हूँ कि आजके युगमें पुनर्विवाह न स्त्री करे, न पुरुष करे। पुनर्विवाह करे ही नहीं। एक बार कर लिया, देख लिया ‘माई बाई भाइली भाग पसाड़ली’ बस, खतम हुआ काम। अब भजन-स्मरण करो। परमात्माकी प्राप्ति करो।

पुरुषोंके लिये फिर पुनर्विवाहका विधान क्यों रखा गया? ‘लुप्तपिण्डोदकक्रिया:’। पितरोंको पिण्ड और पानी देनेके लिये सन्तान हो जाय तो फिर पुनर्विवाह नहीं करना चाहिये। सन्तान न होवे तो बड़ोंको पिण्ड-पानी देनेके लिये, वंश-परम्पराकी रक्षाके लिये विवाह कर सकते हैं; इस वास्ते शास्त्रमें इसकी खुली रखी है, परंतु सिद्धान्त भोगका नहीं है, सुखका नहीं है, केवल कल्याण करनेका है। मानव-शरीर मिल गया तो, ‘यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं तत:’। (गीता ६। २२) वह सुख प्राप्त करना है जिसके बादमें सुख प्राप्त करना बाकी न रहे। यह खास बात है।

प्रश्न—स्त्रियाँ कुँवारी रह सकती हैं क्या?

ऐसा विधान तो नहीं है। विधान न होनेपर भी त्याग करनेमें कोई पाप नहीं है; परंतु आज-कलकी जो रीति है कि छोरियाँ कहती हैं कि विवाह हम नहीं करेंगी, यह एक तरहसे अन्याय है, पाप है; क्योंकि भोगवृत्ति तो मिटती नहीं। अब विवाह करनेसे परतन्त्रता हो जायगी, इस वास्ते कुँवारे खुले स्वतन्त्र फिरेंगे। तो कुत्तियाँ बहुत स्वतन्त्र फिरती हैं, उनमें और इनमें क्या फर्क है? कुछ मूल्य नहीं उसका। परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करें, उसकी बहादुरी है, वह कोई भाई हो, चाहे बहन हो। कोई भी क्यों न हो। यह है बात खास।

प्रश्न—‘कर्म करनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है और फलकी प्राप्तिमें स्वतन्त्र नहीं है।’ धन चाहनेमात्रसे नहीं मिलता। इसका खुलासा कीजिये?

मैंने यह कहा था कि चाहनेमात्रसे धन नहीं मिलता। ‘धनकी चाहना नहीं होनेसे ये निर्धन हैं’। अर्थात् ये धन चाहते नहीं थे, इस वास्ते निर्धन रह गये—ऐसे कितने आदमी मिलेंगे आपको? यह बात नहीं है। धनकी चाहना नहीं हो जिसके, वह निर्धन होता ही नहीं। जिसके वैराग्य है, त्याग है, धनकी चाहना नहीं है, वह निर्धन कभी नहीं होता, वह दरिद्री होता ही नहीं। वह बादशाहोंका बादशाह होता है।

चाह गई चिन्ता मिटी मनवा बेपरवाह।

जिसको कछु नहिं चाहिए सो साहनपतिसाह॥

दरिद्रता तो मनकी है। लोग समझते हैं कि धनके अभावसे दरिद्री है; बिलकुल गलत बात है यह।

को वा दरिद्रो हि विशालतृष्ण:

श्रीमांश्च को यस्य समस्ततोष:।

जो धनवान् ज्यादा है आपकी दृष्टिमें; वह दरिद्री ज्यादा है कसौटीपर कसनेपर। जैसे, साधारण आदमीके तो सौ-पचास रुपयोंकी भूख होती है, फिर हजार रुपये चाहता है तो नौ सौकी भूख है! एक हजार हो जानेपर दस हजार चाहने लगता है तो अब नौ हजारकी भूख है और दस हजार होनेपर लखपति होना चाहता है तो अब नब्बे हजारकी भूख है। एक लाख रुपये रोकड़में हो जायगा तो अब केवल दस लाखकी इच्छा नहीं होगी। अब करोड़पति होनेकी इच्छा जगेगी, अब निन्यानबे लाखका घाटा है तो उनमें दरिद्री बड़ा कौन हुआ? जिनके धनकी ज्यादा भूख, वही दरिद्री ज्यादा। धनसे दरिद्रता नहीं मिटती।

‘सुन्दर’ एक संतोष बिना सठ

तेरी तो भूख कभी न भगेगी॥

प्रश्न—अशुभ कर्म कामनासे कैसे होते हैं?

‘काम एष क्रोध एष’ जिसके कामना नहीं होती उसके द्वारा अशुभ कर्म नहीं होते। शुभ कर्म होते हैं—निष्काम-भावसे, जिससे अन्त:करण शुद्ध, निर्मल होता है। निर्मल अन्त:करणमें जो विचार आदि पैदा होते हैं, उससे अपना कल्याण होता है। कामना रखनेसे शुद्धि नहीं होती। काम तो कर दिया, पर कामना रख ली भीतर, तो शुद्धि होगी कैसे? पदार्थोंकी, भोगोंकी, परिस्थितिकी इच्छा है न मनमें! तो सकाम-भाव रखनेसे अन्त:करण शुद्ध नहीं होता। इतने अंशमें शुद्ध होगा कि जो शुद्ध काम किया है विधि-विधानसे, उसका जो फल मिलेगा, उस फलको भोग सकता है, इतनी शुद्धि होती है। जैसे इन्द्र बना तो ‘शतक्रतु’—सौ यज्ञ करनेसे इन्द्र बनता है। तो जो इन्द्र बनता है, वह इन्द्रके भोग भोग सकता है। इन्द्रासनपर कुत्तेको बैठा दिया जाय या सुअरको बैठा दिया जाय तो वह इन्द्रका भोग क्या भोग सकेगा? इतनी-सी शुद्धि होती है। और दूसरी बात है ही नहीं। वह इतना काम कर सकता है बस। कोई यदि अशुभ काम नहीं करे और अगाड़ी सावधान रहे। परंतु पहले हम कर्म कर चुके हैं, उनका फल सामने आये तो भोग करके निकाल दो।

प्रश्न—अब हम मुक्तिके मार्गमें लग गये, केवल अपने कल्याणमें ही लग गये। पहले किये हुए बहुत कर्म तो पड़े हैं न? बहुत हैं वे तो। उनकी गिनती नहीं। उनकी क्या दशा होगी?

वह केवल परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये ही कर्म करता है, उसीको ही चाहता है तो वे सब-के-सब कर्म रोक दिये जायँगे। वे जबरदस्ती फल नहीं देंगे। जब हमारी नीयत कल्याण करनेकी है तो कर्म सब खतम हो जायँगे। भक्तिसे, ज्ञानसे, कर्म-(सेवा-)से तीनोंसे ही वे नष्ट हो जाते हैं।

भक्तिमें साफ कहा—‘सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि’। सब पापोंसे मैं मुक्त कर दूँगा। ‘ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा॥’ (४। ३७) ज्ञानरूपी अग्निमें समग्र कर्म भस्म हो जाते हैं। ऐसे ही ‘यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते॥’(४। २३) केवल यज्ञके लिये कर्म करता है तो समग्र कर्म लीन हो जाते हैं। कर्म अगाड़ी खतम हो जायँगे। जब वह साधनमें लगा है तो भजन करते-करते, पूर्ण होनेपर सब खतम हो जायँगे। अधूरा साधन छोड़ेंगे तो वे कर्मफल देनेके लिये आयेंगे। साधनकी ठीक तरहसे वृत्ति नहीं रहेगी तो वह योगभ्रष्टकी स्थितिको प्राप्त होता है। ऐसे योगभ्रष्ट भी दो तरहकी गतिवाला होता है। एक तो स्वर्गादिमें जाकर पीछे लौटनेपर श्रीमानोंके घर जन्म लेता है और एक सीधा ही योगियोंके कुलमें जन्म लेता है उसका जन्म श्रेष्ठ बताया है। ‘एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम्॥’(गीता ६। ४२)ऐसा जन्म दुर्लभतर है। तो जिन योगियोंकी सूक्ष्म वासना रहती है, वे स्वर्गादिमें जाते हैं और यहाँ श्रीमानोंके घर जन्म लेते हैं। जिनकी वासना नहीं रही है और साधन करते हैं साधनमें कुछ कमी रह जाती है, अन्तमें विचलित हो जाते हैं तो वे योगियोंके कुलमें जन्म लेते हैं वहाँ वे मुक्त हो जाते हैं।

मन भगवान‍्में कैसे लगे?

प्रश्न—हम मन भगवान‍्में लगाना चाहते हैं; ध्यान-जप करने बैठते हैं तो पुराने भोगे हुए भोगोंके संस्कार आते हैं। सुख मिल जाय ऐसी इच्छा भी होती है। इसको कैसे मिटावें?

इसको लोग कहते हैं मनकी चंचलता। साधन करते हैं, मन नहीं लगता। इसका नाम चंचलता है। पहले भोग भोगे हैं, उनके संस्कारोंसे वे पुराने भोग याद आते हैं, अगाड़ी भविष्यमें कुछ करना चाहते हैं उसकी याद आती है। पाठमें बैठे हैं; जप कर रहे हैं; नित्य-नियम कर रहे हैं तो घड़ीकी तरफ देखते हैं कि अमुक जगह जाना है; क्योंकि मन नहीं लगता। बार-बार याद आती है, भूतकाल-भविष्यकालकी बातें याद आती हैं। इसमें मन लगता नहीं, इसको चित्तकी चंचलता कहते हैं। क्या करें होता नहीं। इसमें खूब ध्यान देवें। थोड़ा विस्तार करता हूँ।

आपका मन नहीं लगता तो सबसे पहले मुख्य बात तो यह कहनेकी है कि आप साधन न छोड़ें। बहुत भाई कहते हैं ‘क्या करें, राम-राममें मन तो लगता नहीं’। इसमें एक मार्मिक बात है; कृपा करके ध्यान दें और धारण कर लें, तो बहुत ज्यादा आपकी कृपा मानूँगा। मन पहले लग जाय, पीछे भजन होगा—ऐसा कभी नहीं होगा। भजन करते-करते ही मन लगेगा, इस वास्ते मन लगानेके उद्देश्यसे नाम-जप-कीर्तन करते रहो। हरदम साधनमें लगे रहो; विचार करते रहो। भजन करते रहनेमें मन नहीं लगता तो भी लाभ होगा।

एक धनी आदमीने एक आदमीको रखा कि तुम बैठो यहाँपर, दिनभर; जरूरी होगा, तब काम कहेंगे। कभी एक-दो बार काम कह दिया। दिनभर बीत गया, शामतक वह बैठा ही रहा। शामको कहता है ‘बाबू पैसे लाओ।’ वह पूछता है पैसे किस बातके? ‘दिनभर तो बैठा ही था।’ ‘बाबू! दिनभर बैठा था इस बातके’ उसको पैसे देने पड़ते हैं। इस वास्ते जब एक मनुष्यके कहनेसे बैठ जाय तो बिना काम किये पैसे मिलते हैं। आप भजन करने बैठ जायँगे अच्छी नीयतसे तो क्या ठाकुरजी इतने भी ईमानदार नहीं हैं? क्या आपका यह प्रयास निरर्थक जायगा? आप अपनी तरफसे मन लगानेकी चेष्टा पूरी करें। नाम-जप करें, कीर्तन करें, अपनी तरफसे गलती न करें। फिर मन नहीं लगेगा, इसका दोष आपपर है ही नहीं। मन नहीं लगाते हो, वह दोष आपका होगा। बिना गलती किये हमारेको दोष कैसे लगेगा? दुनियामें बहुत हत्याएँ होती हैं, उनकी हमें हत्या लग जायगी क्या? हम करना चाहते नहीं और करते नहीं; परंतु होती है, तो होनेका फल आपको नहीं मिलेगा। हाँ, विघ्न है जरूर भजनमें; परंतु उससे डरो मत।

मन न लगनेमें कारण

वास्तवमें कारण कुछ नहीं है; काम-धन्धा करते हो तो समय नहीं मिलता है चिन्तन करनेके लिये। भजन-ध्यान करने लगे तो उसमें तो मन लगता नहीं। मनको मिल जाता है वक्त, इस वास्ते सोचने लगता है, आपकी पोल खोलता है। यह क्यों होती है? जो भीतर इकट्ठी पड़ी थी, वह निकलती है। नयी कुछ नहीं होती पुरानी बात है अथवा अगाड़ी करेंगे, यह बात याद आती है। अभी वर्तमानकी है ही नहीं। अब ध्यान देकर समझना है इस बातको। पहलेकी बात याद आती है, वह पुरानी बात है, अभी नहीं है। भविष्यका चिन्तन होता है, वह भविष्यमें होगा, अभी नहीं है। अभी नहीं है, उसकी क्या चिन्ता करते हो? यह बात याद रखना कि अभी नहीं है। पहले थी, अभी नहीं है या अगाड़ी होगी, अभी नहीं है। जो अभी नहीं है, उसकी कोई चिन्ता नहीं। अभी है ही नहीं वह; उसका अभाव है। उसका क्या फल होगा?

दूसरी बात और ध्यान देनेकी है कि आप चिन्तन करते हो पुराना अथवा भविष्यका। जो चिन्तन होता है, उसमें परमात्मा जरूर हैं। ‘है’ उसको तो आप मानते नहीं। ‘नहीं है’, उससे आप परेशान हो रहे हैं। ‘नहीं है’ यह तो ‘नहीं’ है, ऐसा मान लो और इस चिन्तनमें परमात्मा हैं। भूतकालका चिन्तन है तो उसमें परमात्मा हैं। भविष्यका चिन्तन है तो उसमें परमात्मा हैं। वर्तमानमें भजन करते हो तो परमात्मा हैं। हरदम अखण्ड परमात्मा हैं। इस तरफ लक्ष्य रखो यह खास उपाय है।

भोगे हुए संस्कार कैसे नष्ट हों?

फिर समझ लो। पुरानी कोई भी बात याद आ जाय, घटना याद आ जाय, मन विचलित हो जाय, तो मन रस लेने लगता है तब तो नया कर्म हो जाता है। याद आनेमात्रसे कर्म नहीं होता। इस वास्ते उसकी परवाह मत करो। यह भोगे हुए संस्कार हैं, वे समय मिलनेपर उद‍्भूत होते हैं, पर होते हैं, नष्ट होनेके लिये। आप उनमें सहमत हो जाते हैं तो ये नये कर्म हो जाते हैं। आप सहमत न हों तो मिट जायँगे, मिटनेके लिये ही उत्पन्न होते हैं। इस वास्ते वह घटना अभी नहीं है। अगाड़ी करना है उसको भी आपने विचार करके पकड़ रखा है। पकड़नेके कारणसे भविष्यकी बातें याद आती हैं। वह भी अभी नहीं है।

उसको आप कह दो कि अभी यह काम कर रहे हैं। उसको अभी छोड़ दो; फिर करेंगे विचार—ऐसा करके उसका त्याग कर दो। फिर याद आ जाय तो फिर छोड़ दो। भविष्यवाली बात भी आपकी पकड़ी हुई है। वह भी है नहीं। परमात्मा सबमें है, अभी भी है, भूतकालवाली घटनाओंमें भी है, भविष्यवाली घटनाओंमें भी है। दोनोंका चिन्तन अभी हो रहा है तो इस समयमें भी है। परमात्मा इन सबमें है, यह बात याद रखो। भजन करते हुए जो याद आ जाय उसमें परमात्मा है, एकदम सच्ची बात। परमात्माकी तरफ लक्ष्य होनेसे संकल्प-विकल्प नष्ट हो जायँगे। जो है, वह सच्ची बात हो जायगी। जो नहीं है, वह तो सच्चा है ही नहीं; उसकी अभी केवल फुरणामात्र—यादमात्र है, वह मिट जायगी। इस वास्ते परमात्मा इसमें है, यह ठोस बात है। इस बातको पकड़ लो; अब दूसरी बात आप-से-आप मिट जायगी।

बुरे संस्कार क्यों पड़ते हैं?

अगर मनसे भोगोंका चिन्तन करते हुए उसमें सुख लेने लगोगे तो नया संस्कार पड़ जायगा। चाहे भोगोंको भोगते समय मन लगाकर भोगो और चाहे चिन्तन करते हुए मन लगाकर चिन्तन करो। दोनोंमें नये संस्कार पड़ेंगे। वे संस्कार अगाड़ी और तंग करेंगे; फिर याद आवेंगे। इस वास्ते उसमें सुख-दु:ख लो मत। अच्छा आया, चाहे मन्दा आया, पकड़ो मत। चाहे अच्छा आवे, चाहे मन्दा आवे, उसमें अपने मनको राजी मत होने दो। मन राजी होता है, तब वे संस्कार पड़ जाते हैं।

मन तो लाखकी तरह, मोमकी तरह है। उसको ऐसा माना है मधुसूदनाचार्यने और कहा है कि लोहा साधारणतया कठोर है; परंतु साथमें तापक द्रव्य हो जाते हैं तो पिघल जायगा। ऐसे ही चित्त कठोर होता है; परंतु तापका संग होनेसे पिघल जाता है। अब वह तापक कौन है? तो बताया है—

कामक्रोधभयस्नेहहर्षशोकदयाऽऽदय:।

तापकाश्चित्तजतनुस्तच्छान्तौ कठिनं तु तत्॥

काम, क्रोध, भय, स्नेह, हर्ष, शोक, दया आदि ये सात तापक हैं जिससे चित्त पिघलता है। कामना बहुत ज्यादा होती है और भोग मिलता है तो भोगते समय उसके बड़े संस्कार पड़ते हैं। वर्षोंतक तीस, चालीस, पचास वर्ष हो जायँ, तब भी मानो अभी ही हुई हो, ऐसी घटना दीखेगी; क्योंकि पिघले हुए चित्तमें संस्कार पड़ गये। अब वह कठोर बन जाय, तब भी संस्कार वैसे ही पड़े हुए हैं। जितना अधिक चित्त पिघलेगा, उतना ही जोरदार संस्कार पड़ेगा। ऐसे ही क्रोधके समय कोई घटना घटी है तो वह ज्यादा समयतक याद आयेगी। कारण कि उस समय चित्त पिघल गया, उसमें क्रोधके संस्कार पड़ गये। ऐसे कोई बड़ा भारी भय लगा तो भय लगते ही चित्त पिघलता है, उसमें भयके संस्कार पड़ जाते हैं तो बहुत वर्षोंतक भयकी याद आती है। ऐसे ही मित्रसे अधिक स्नेह होता है और जब आपसमें मिलते हैं तो उसके भी संस्कार पड़ते हैं। ऐसे ही हर्ष-शोक हो जाता है, उसके संस्कार पड़ते हैं। अधिक हर्ष होता है तो किसीके मिलनेका तो वह संस्कार पड़ता है। दया आती है बहुत विशेषतासे तो वे भी संस्कार चित्तपर पड़ जाते हैं।

बुरे संस्कार कैसे मिटें?

इस वास्ते कहा है—

‘काठिन्यं विषये कुर्याद् द्रवत्वं भगवत्पदे’

(भक्तिरसायन १। ३२)

साधकको चाहिये कि विषयोंके सम्बन्धमें तो चित्तको कठोर बनाये रखे और भगवत्सम्बन्धी बातोंमें, तात्त्विक बातोंमें मनको द्रवित करे। द्रवित चित्तमें वे संस्कार पड़ जायँ। जब द्रवित होता है अन्त:करण, उस समयमें और सभीको छोड़ देता है, तब रसानुभूति होती है। साहित्य आदिकी रसानुभूति उसीमें होती है। हास्य, करुण, रौद्र, वीर, शृंगार, वात्सल्य, वीभत्स—ये सात रस होते हैं। रसकी अनुभूति उसीमें होती है, जब पिघला हुआ अन्त:करण होता है। पिघला हुआ अन्त:करण तदाकार हो जाता है और दूसरेकी याद नहीं आती। विषय और विषयीकी भी याद नहीं आती। इतना चित्त द्रवित होता है तो उस समय वह रस आता है। वे संस्कार पड़ते हैं साहित्य आदिके लौकिक रसोंसे। वह षड्‍रस, नवरस होते हैं तो हर्ष होता है भीतरमें, उसका संस्कार पड़ जाता है। ऐसे पुराने संस्कार तंग करते हैं, उनकी याद आती है बार-बार। उसको मूल्य न दें। पुराने संस्कार हैं, अभी नहीं है। ‘यह अभी नहीं है’, यह अभी नहीं है’, ‘यह अभी नहीं है’—यह इसका बड़ा भारी मन्त्र है। जब भी याद आवे तो ‘ना, यह अभी नहीं है, अभी है ही नहीं’—ऐसे दूर करोगे तो दूर हो जायगा वह रहेगा नहीं। उनमें राग-द्वेष करोगे तो एक नया संस्कार और पड़ जायगा; क्योंकि आपने सुख ले लिया, आपने दु:ख ले लिया। भोगते समयमें भी राग किया है, सुख लिया है, वे संस्कार नहीं मिटेंगे। इस वास्ते इसमें साधकको सावधान रहना चाहिये कि हमारा उद्देश्य यह नहीं है।

अगाड़ी भोग भोगनेकी इच्छा हो जाय किसी तरहसे तो उसे हटा दें कि ना, हमारा उद्देश्य यह नहीं है, हमारा लक्ष्य नहीं है। हमें इस मार्गमें जाना ही नहीं है। यह जितना जोरदार दृढ़ निश्चय होगा, चित्त आप-से-आप शुद्ध होने लगेगा। इधर-उधर जाना बन्द हो जायगा, आपका साधन चल पड़ेगा। हम इसके ग्राहक ही नहीं हैं; हमारेको यह करना ही नहीं है। हमें इस मार्गमें जाना ही नहीं है। बहुत बड़ा भारी बल है इसमें। बड़ी ताकत है। साधन करनेवाले भाई-बहनोंको चाहिये, कुछ भी याद आ जाय—अच्छी-मन्दी याद आ जाय तो कह दो, ‘अभी यह है ही नहीं, अगाड़ी ऐसा करना ही नहीं है, इस मार्गमें हमें जाना है ही नहीं’, तो स्वाभाविक चित्त शान्त हो जायगा; स्वत: ही शान्त हो जायगा।

मनुष्य तो समझता है कि चित्त खराब है। चित्त खराब नहीं है। खराब स्वयं होता है। चित्त तो अन्त:करण है। करण कर्ता नहीं होता। कर्ता करण नहीं होता। अन्त:करण, बहि:करण करणोंकी क्या शुद्धि, क्या अशुद्धि? कर्ताकी अशुद्धि ही करणमें मालूम होती है। इस वास्ते गीताने कहा—‘इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।’और ‘इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ’—विषय, इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि—ये इसके अधिष्ठान (वास-स्थान) हैं ‘रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते।’

इसका यह आशय नहीं है कि तत्त्वकी प्राप्ति बिना यह मिटता नहीं। मानो जहाँ परमात्माकी प्राप्ति होगी, वहाँ ही रस मिटेगा, यह व्याप्ति नहीं है; किन्तु परमात्माकी प्राप्ति होनेपर रस रहेगा नहीं, यह भाव है। रसकी निवृत्ति पहले भी हो सकती है। जोरदार वैराग्य होगा तो रसबुद्धि मिट जायगी। इस वास्ते वह रसबुद्धि भीतर है, वह कर्तामें रहती है, वही मनमें, बुद्धिमें, इन्द्रियोंमें, विषयोंमें प्रतीत होती है, है खुदमें। खुदके जब तेजीका वैराग्य होगा, पक्‍का विचार होगा कि हमें इस मार्गमें जाना ही नहीं है, यह जितना दृढ़तासे निश्चय हो जायगा, उतनी ही इसकी निवृत्ति हो जायगी। थोड़ा दीखे तो उसकी परवाह मत करो, वह चला जायगा। दर्पणमें मुख दीखता है तो ज्ञान रहता है कि वास्तवमें दर्पणमें मुख नहीं है। इसी तरहसे संकल्प-विकल्प आते-जाते हैं, वे दीखते हैं, पर हमारेमें नहीं हैं।

आपमें नहीं हैं तो ये कहाँ हैं? मन, बुद्धि, अहंकारमें हैं। आपका जो शुद्ध स्वरूप है, उसमें है ही नहीं—यह पक्‍की बात है। वह शुद्ध स्वरूप है। साधककी दशा कभी सात्त्विक, कभी राजस, कभी तामस होती है। ऐसे ही जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति—ऐसी अवस्थाएँ आती हैं, दशाएँ होती हैं। ऐसी परिस्थिति आती है तो परिस्थितियाँ बदलनेवाली होती हैं। ये घटनाएँ बदलनेवाली होती हैं। दृश्यका सम्बन्ध आने और जानेवाला होता है, इस वास्ते भगवान‍्ने कहा—

‘आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व’

(२।१४)

ये आने-जानेवाले हैं, इनको तुम सह लो। मानो इसमें तुम खुद घबराओ मत। ये तो अन्त:करणमें आते हैं। आपमें नहीं आते हैं। यह बात थोड़ी बारीक है; परन्तु इसको आप ध्यान देकर बड़ी सुगमतापूर्वक समझ सकते हो।

समता कैसे रहे?

गीतामें समताकी बड़ी भारी महिमा गायी है। ‘समत्वं योग उच्यते’ समताका नाम ही योग है। ‘समदु:खसुख: स्वस्थ:’ बहुत वर्णन किया है। ज्ञानयोगमें, कर्मयोगमें, भक्तियोगमें भी समताका खूब वर्णन है। वह समता कैसे हो? बहुत सीधी बात, बड़ी सरल बात; सब भाई समझ सकते हैं। ध्यान दें आपलोग। आपके सुखदायी घटना घटती है उस समय आप रहते हो कि नहीं? आप अगर नहीं रहते तो सुख-दु:खका अनुभव कौन करेगा? ऐसे दु:खदायी-से-दु:खदायी घटना घटती है तो उस समय भी आप रहते हो कि नहीं? आप नहीं रहते तो दु:खदायी घटनाका अनुभव कौन करेगा? सुख और दु:ख तो बदलते हैं, पर आप बदलते हो क्या? तो ‘पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍‍क्ते’(१३। २१) ‘पुरुष: सुखदु:खानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते’; (१३। २०) सुख-दु:ख भोगनेमें हेतु बनता है कौन? ‘पुरुष: प्रकृतिस्थ:।’ सुखके साथ, दु:खके साथ दोनोंमें आप वही रहे। सुख-दु:ख दोनोंके विभागका ज्ञान आपको कैसे हुआ? आपको ज्ञान होता है, तो सुखके समय भी आप रहते हैं और दु:खके समय भी आप रहते हैं। आप सुख-दु:खके साथ मिल जाते हैं तो सुखी-दु:खी हो जाते हैं। नहीं तो ‘समदु:खसुख: स्वस्थ:’अगर ‘स्व’ में स्थित रहे तो सुख-दु:ख समान रहेंगे। आपपर असर नहीं डालेंगे। आपपर असर तभी डालते हैं, जब आप उनमें तल्लीन हो जाते हैं; एक हो जाते हैं। तो ‘समदु:खसुख: स्वस्थ:’और ‘पुरुष: प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍‍क्ते’ उसमें उसका साथ मत करो।

आपका स्वरूप सम है, हरदम आप रहते हो। सुखदायी, दु:खदायी घटना घट जाय तो उन दोनोंमें आप रहते हो। अपनी तरफ देखो; अवस्थाकी तरफ मत देखो। परिस्थितिकी तरफ मत देखो। क्रियाओंकी तरफ मत देखो। अपने-आपकी तरफ देखो, तो वे मिट जायँगे। यह देखनेकी विद्या थोड़ा-सा अभ्यास करनेसे हाथ लगती है और वह हाथ लग जाय, अभी। मैंने कह दिया इतनेमात्रसे। साधक है, बुद्धिमान् है, तो उसके हाथ लग जायगी। नहीं तो समय पाकर आ जायगी। सच्ची बात है यह।

अब इसमें थोड़ा-सा विस्तार करके और बात बतावें। ध्यान दें कि आप और आपकी अवस्था, आप और आपकी परिस्थिति, आप और आपकी दशा, आप और आपकी वस्तुएँ। ये दो हैं, एक नहीं हैं। यह खास जाननेकी बात है। आप एक रहते हैं; परिस्थिति बदलती है; घटना बदलती है; दशा बदलती है; व्यक्ति बदलते हैं; वस्तुएँ बदलती हैं। आप एक रहते हो। तो आपकी ये चीजें हैं नहीं। न आपमें हैं, न आप इनमें हो, न आपका सम्बन्ध है। तीनों बातें नहीं हैं। इनमें आप नहीं, आपमें ये नहीं, आपके साथ इनका नित्य-सम्बन्ध नहीं। अगर नित्य-सम्बन्ध हो तो सुखी आदमीको दु:ख कैसे होगा? सुखमें ही स्थित रहेगा। दु:खी होनेवाला सुखी कैसे हो जायगा? दु:खमें ही स्थित रहेगा। परंतु ‘आगमापायिनोऽनित्या:’ भगवान् कहते हैं—‘भैया, ये तो आने-जानेवाले हैं। आना हुआ, सम्बन्ध हुआ, सम्बन्ध-विच्छेद हुआ। नित्य रहते ही नहीं।’ ‘तांस्तितिक्षस्व’—अपनेमें विकार क्यों लाते हो? आप सुख-दु:खके जाननेवाले हो। सुखको भी जान लिया; दु:खको भी जान लिया। तो जाननेवाले तो आप एक ही रहे न।

बड़ी भयंकर घटना घटी। किसी आदमीका जवान बेटा मर गया, उसका समाचार आया कि अमुक जगह गया था, लड़का मर गया और एक समाचार आया कि जो आपका दूसरा लड़का रहता था, उसके लड़का जन्म गया। पोतेके जन्मका समाचार मिलनेपर खुशी हुई। बेटा मर गया तो दु:खी हुए। ये सुख-दु:ख दो हुए न; परंतु आपका जानना जो है, बेटेकी मृत्युका ज्ञान और पोतेके जन्मका ज्ञान—इस ज्ञानमें क्या फर्क आया? जाननामात्र तो एक ही हुआ न। जाननेके विषय दो हुए। जानना एक हुआ। जब विषय दो होनेपर जाननेमें ही फर्क नहीं तो जाननेवालेमें फर्क कैसे आया? आपमें फर्क नहीं है। आप पोतेके साथ लगकर खुशी मनाते हैं, बेटेके साथ चिपककर ‘बेटा मर गया’—इसका शोक मनाते हैं। ऊपरसे भले ही शोक मनाओ चाहे उत्सव मनाओ, मनमें समझो कि बेटा न तो पहले था, न अब है और न हमारे साथ अगाड़ी रहेगा। यह पोता पहले नहीं था, अब जन्मा है, साथ यह भी नहीं रहेगा। यह अपनी आयु लेकर आया है। हम भी अपनी आयु लेकर आये हैं। हमारा-इसका सम्बन्ध नहीं है। सच्ची बात यह है। सच्ची बातको तो पकड़ते नहीं, झूठी बातको पकड़कर सुखी-दु:खी मुफ्तमें होते हैं।

समता स्वत:सिद्ध है

सत्संगद्वारा क्या होता है? पैसे नहीं मिलते, दु:ख मिटता है। आपको असली बात बतायी जाती है कि आपके साथ इनका सम्बन्ध नहीं है। सच्ची बात है, उसको पकड़ लो तो दु:ख मिट जायगा। लाखों, करोड़ों, अरबों रुपये मिलनेसे भी दु:ख नहीं मिटता। दु:ख इस बातसे मिट जाता है; टिकता ही नहीं। ये तो आने-जानेवाले हैं। बिलकुल अपना अनुभव है, आप वे ही हो। बाल्यावस्था आयी तो आप वे ही हो, जवान अवस्थामें आप वे ही हो, वृद्धावस्थामें आप तो वे ही हो। यह आपका ज्ञान है कि नहीं? आपका एक ज्ञान है कि मैं वही हूँ। परिस्थिति वह नहीं है, अवस्था वह नहीं है; पदार्थ वे नहीं हैं; घटना वह नहीं है; स्थिति वह नहीं है; भाव वे नहीं हैं, संकल्प-विकल्प वे नहीं हैं। आपके सिद्धान्त वे नहीं हैं, जो बचपनमें थे। वे सब-के-सब बदले हैं, पर आप नहीं बदले हो। आप और आपकी परिस्थिति, आप और आपकी अवस्था, आप और आपकी दशा—ये दो हैं। केवल इस बातको आज आप मान लें। समझ लें तब तो निहाल ही हो जायँ। शंका हो तो फिर पूछ लेना।

आप और आपकी अवस्था, आप और आपकी परिस्थिति, आप और आपके जन, आप और आपकी वस्तु, आप और आपका घर—ये दो हैं। एक नहीं हैं। आप वे ही रहते हो; ये बदलते हैं। ये बदलनेवाले अलग हैं। आप एक रहनेवाले अलग हैं। ध्यान देकर आप समझें। भाई-बहनो! थोड़ी बात बारीक है, पर बड़ी सरल और सीधी है। यह तो आपकी-हमारी सबकी भोगी हुई है। अवस्थाएँ बदल गयीं। खुद आप कहते थे कि मैं बच्चा हूँ। बालक हूँ। आज कह सकते हो कि मैं बालक हूँ? बालकपना आपने कब छोड़ा? कोई तारीख हो तो बताओ कि अमुक तारीखसे हमने बचपन छोड़ दिया। आपने नहीं छोड़ा; वह सामने होकर निकल गया। जब बचपन निकल गया तो क्या जवानी टिकेगी? क्या वृद्धावस्था टिकेगी? रोगी अवस्था टिकेगी? नीरोगी अवस्था टिकेगी? संकल्प-विकल्प टिकेंगे? चाहे बाहरकी परिस्थिति हो, चाहे भीतरकी परिस्थिति हो। सब बहती है, बहती। दरवाजेपर खड़े हो जायँ, मोटरें खूब आवें तो खुशी मनावें कि अहा! मौज हो गयी आज! कितनी मोटरें आ गयीं। दूसरे दिन खड़े रहें, मोटर एक भी नहीं आयी तो रोने लगे। आज तो मोटर नहीं आयी। धूल नहीं उड़ी तेरे हर्ज क्या हुआ? अब रोने लग गये। ऐसे बेटा, पोता,धन हो गया तो खुश हो गये। चला गया तो दु:खी हो गये। यह है नहीं, था नहीं, रहेगा नहीं। अब धूल ज्यादा उड़ गयी तो उससे ज्यादा खुशी। बेटा मर गया, पोता मर गया, धन चला गया! अरे चला गया तो जानेवाला ही गया है। बिना जानेवाला कैसे गया? जो चला गया वह रहेगा कैसे? वह तो जानेवाला ही है।

अपने-आपमें स्थित होना

इस वास्ते आप जरा ‘स्व’ में स्थित हो जायँ। अपने-आपमें, जो आप वास्तवमें स्थित हैं। उसमें तो आप स्थित रहते हैं। अपने-आपमें स्थिति स्वत: है आपकी। इसको केवल सँभालना है। ये ‘आगमापायिन:’ आने-जानेवाले हैं। आप और आपकी वस्तुएँ अलग हैं। आप और आपकी परिस्थिति अलग है। आप और आपकी अवस्था अलग है। आप और आपकी दशा अलग है। इसमें यह परिवर्तन हो रहा है। संकल्प-विकल्प मनमें होते हैं, अन्त:करणमें होते हैं। कारण आप नहीं हो। इनके संकल्प-विकल्प आपमें नहीं हैं। आने-जानेवाले हैं। आप इनको देखनेवाले हो, तभी तो तरह-तरहकी घटनाओंका अलग-अलग भोग होता है, अगर आप नहीं रहते तो अलग-अलग घटनाओंका भोग कौन करता? पर आप इनके साथ मिल करके भोगी बन जाते हो। अगर इनके साथ न मिलो तो योगी हो और मिल गये तो भोगी।

भोगी ही सुख-दु:ख भोगता है, योगी तो ‘समदु:खसुख: स्वस्थ:’ स्वस्थ रहता है। बिलकुल अलग रहते हो आप। आप तो अलग ही होते हो; हो ही अलग। बनावटीपनेमें साथ हुए हो। बनावटीपना छोड़ा और आपकी स्थिति हो जायगी। बोलो क्या फर्क है इसमें? यह तो ऐसा ही होता है। आता है और जाता है। यह तो संसारका स्वरूप है। ‘सम्यक् प्रकारेण सरतीति संसार:।’ चलता रहे उसका नाम संसार है। ‘गच्छतीति जगत्’ जो जाता रहे। वह जाता रहता है आप रहनेवाले हो।

मेरी एक प्रार्थना है। मेरा एक निवेदन है; आप ध्यान दें। मिल भी जाय, दु:ख भी हो जाय तो भी यह बात याद रखो कि हम इनके साथी नहीं हैं। यह बात सच्ची है। मिलनेवाली बात कच्ची है, नहीं मिलनेवाली बात याद रखो तो मिलनेपर भी दु:ख नहीं होगा। आज दु:खी हो भी जाओ तो घबराओ मत। मेरेपर सुख-दु:खका असर पड़ जाय तो कोई बात नहीं। यह असर पड़ गया, यह चला जायगा, रहेगा नहीं। इतनी-सी बात याद रखो। इसमें क्या कठिनता है, बताओ? सुखदायी परिस्थिति आयी तो आ गयी, दु:खदायी परिस्थिति भी आयी तो आ गयी। आयी और गयी। इसमें हमारे क्या लगता है? केवल इतना-सा खयाल रखो कि ये आने-जानेवाले हैं। हम हैं रहनेवाले। हमारे क्या फर्क पड़ता है इसमें? आ जाय तो अच्छी बात; चली जाय तो अच्छी बात। आपके फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ भी जाय तो कोई परवाह नहीं। पर याद तो रखो कि मैं तो वही रहता हूँ।

सुखके समयमें भी, दु:खके समयमें भी आप जो एक रहते हो उसका नाम ‘समता’ है। समतामें स्थिति स्वत: आपकी है। मनुष्य समझता है कि समता बड़ी कठिन है। समता कठिन है तो क्या विषमता सुगम है? विषमता तो आपकी बनायी हुई है। समता तो स्वत:सिद्ध है; मिटती नहीं। उसमें क्या कठिन है? समता तो स्वत:सिद्ध है।

‘निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद‍्ब्रह्मणि ते स्थिता:॥’ (५। १९) इस वास्ते ‘न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्॥’(५। २०) प्रियको प्राप्त करके राजी मत होओ, अप्रियको प्राप्त करके दु:खी मत होओ। केवल इतनी बात है। आप सुखी-दु:खी होते हो, यह गलती होती है। पहले गलती हो जाय तो भी परवाह नहीं; मिट जायेगी; परंतु आप न सुखको पकड़ो, न दु:खको पकड़ो। आप इनसे अलग हो और ये आने-जानेवाले हैं। आने-जानेवालेको हम क्यों पकड़ें? यह आ गयी तो बड़ी खुशीकी बात; नहीं आयी तो बड़ी खुशीकी बात। हम अपने दरवाजेपर खड़े हैं। बेटा, पोता बहुत हो गया तो बड़े आनन्दकी बात। मर गये तो बहुत अच्छी बात। जनम गये तो जन्मकी विधि है वो कर दो। इस प्रकार समतामें आपकी स्थिति स्वत: रहती है।