(दिनाङ्क २७ जुलाई १९८१)
प्रवचन—३
परमात्मतत्त्वकी नित्यता
भगवान्की ओर चलनेमें इन्द्रियोंकी, शरीरकी, मन-बुद्धिकी आवश्यकता नहीं है। परमात्माकी तरफ चलनेके लिये ‘खुद’ की आवश्यकता है। कोई मूक हो, बहरा हो, कैसा ही लूला-लँगड़ा क्यों न हो! भगवान्की तरफ खूब मस्तीसे चल सकता है। संसारमें योग्यताको लेकर अधिकार होता है। भगवान्के यहाँ केवल चाहनामात्रसे अधिकार होता है। यहाँ योग्यताकी कोई कीमत नहीं, कैसा है? कितना पढ़ा-लिखा है? कैसा शरीर है? किस वर्ण, देश, आश्रम, सम्प्रदायका है कोई जरूरत नहीं। आपका भाव चाहिये। ‘भावग्राही जनार्दन:।’ खास बाधा क्या है? इसे आप सुनें, जो मैं बार-बार कहता हूँ। उत्पत्ति-विनाशका आदर करनेसे नित्य-तत्त्वका निरादर हो जाता है। बस, उत्पन्न और नष्ट होनेवाली चीजोंको हम बड़ी मान लेते हैं—यही बाधा है। इनका उपयोग बाधा नहीं। ये वस्तुएँ बाधा नहीं। रुपये हो जायँ, पदार्थ हो जायँ तो कोई बाधा नहीं। न हो तो कोई बाधा नहीं। हृदयमें इनका महत्त्व देकर इनको बहुत बड़ी मान लेते हैं। ऐसे भगवान्का मूल्य घटा देते हैं, यह बाधा है खास।
यह जो बात समझानेके लिये कही थी कि हम चीजोंको ही देखते हैं तो चीजें दो नम्बरमें दीखती हैं, प्रकाश पहले नम्बरमें है। चीजोंके अधीन वह प्रकाश नहीं है। प्रकाशके अधीन वे चीजें दीखती हैं। सबसे पहले प्रकाश और पीछे चीजें दीखती हैं, यह दिया था दृष्टान्त। तात्पर्य यह है कि किसी चीजका हमें ज्ञान होता है, हमें याद आती है तो पहले एक प्रकाशमें, एक ज्ञानमें याद आती है। हम पढ़ाई करते हैं, समझते हैं, वह भी किसी ज्ञानमें समझते हैं। वह भी ज्ञान है। हर एक काम आप करेंगे तो पहले उसका ज्ञान होगा। ज्ञान होनेसे उस विषयमें प्रवृत्ति होती है। वह जो ज्ञान है, वह परमात्माका स्वरूप है, वह वास्तविक ज्ञान है। सूर्यका, चन्द्रमाका, अग्निका, तारोंका, बिजलीका, जुगनूका जो ज्ञान है, यह सब भौतिक ज्ञान भौतिक प्रकाश है। इससे ऊँचा इन्द्रियोंका प्रकाश है। इन्द्रियोंके द्वारा हम चीजोंको जानते हैं, नेत्रद्वारा देखते हैं, त्वचासे स्पर्श करते हैं कानोंसे शब्द सुनते हैं, रसनासे रस लेते हैं, नासिकासे गन्ध लेते हैं, तो यह जो ज्ञान होता है न—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धका ज्ञान। इस ज्ञानको प्रकाशित करनेवाली इन्द्रियाँ हैं। इन्द्रियोंको प्रकाशित करनेवाला मन है। मन अगर दूसरी जगह रहता है तो वह ठीक नहीं होता। जैसे, अभी मैं बोला, आपने सुना नहीं, मन चला गया दूसरी जगह ही। तो क्या कहा? पता नहीं। मन नहीं लगनेसे जय रामजीकी। इस वास्ते इनको प्रकाशित करता है मन। मनको प्रकाशित करती है बुद्धि। बुद्धिको प्रकाशित करता है स्वयं और स्वयंको प्रकाश मिलता है परमात्मासे। वह ज्ञान हर समय रहता है।
आपको नींद आती है तो भी परमात्मा वैसे-के-वैसे जागते हैं। आप जागते हैं तो भी परमात्मा वैसे-के-वैसे जागते हैं। आपको स्वप्न आता है तो उसमें भी परमात्मा वैसे-के-वैसे ही जागते हैं। आपके मनमें विचार आते हैं, उन विचारोंको भगवान् जानते हैं। मनमें कुछ भी खटपट होती है, उसको भगवान् जानते हैं। भगवान् सब बातोंको जानते हैं। वह ज्ञान है, केवल शुद्ध ज्ञान। उस ज्ञानके अन्तर्गत अनन्त सृष्टि फैल रही है। स्थिति हो रही है और लीन हो रही है। वह प्रकाश है, ज्यों-का-त्यों निरन्तर है। उसीको सच्चिदानन्द कहते हैं। वह सत्य होनेसे सत् है। ज्ञान होनेसे चित् है। आनन्द-ही-आनन्द है। दु:खका लेश भी नहीं है वहाँ।
राम सच्चिदानंद दिनेसा।
नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा।।
(मानस १। ११६। ५)
लवलेश भी दु:ख नहीं, सन्ताप नहीं, जलन नहीं। ऐसा आनन्द-स्वरूप है। वह सबसे पहले है और सबके खत्म होनेपर भी रहता है, सब सृष्टिके रहते हुए भी वह है, ज्यों-का-त्यों रहता है। उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। उसमें कोई घट-बढ़ नहीं होती।
वह ज्योतियोंका ज्योति है सबसे प्रथम भासता।
अद्वैत सनातन सर्व विश्व प्रकाशता॥
वह ज्योतियोंका ज्योति सबका कारण भगवान् है। इस तरफ लक्ष्य रखो आप।
हरेक काम करते हो तो आपका भी ज्ञान पहले होता है, पीछे वस्तुओंका ज्ञान होता है, तो परमात्माका ज्ञान पहले है, सबके रहते हुए है और सबके लीन होनेपर भी रहता है। सबके मिट जानेपर भी रहता है, बन जानेपर भी, बिगड़ जानेपर भी, परिवर्तनपर भी वह प्रकाश है, ज्यों-का-त्यों रहता है। उस प्रकाशको प्राप्त करना ही जीवका काम है। इसका खास कर्तव्य है। उस प्रकाशमें स्थित हो जाय तो बस, निहाल हो गये, मनुष्य-जन्म सफल हो गया। यह इतनी बात भी आपके-हमारे सामने आ गयी कि सबका प्रकाश करनेवाला, सबका आधार, सबका आश्रय, सबको सत्ता, स्फूर्ति देनेवाला, सबको शक्ति देनेवाला, सबकी रक्षा करनेवाला, सबकी सहायता करनेवाला, सबका भरण-पोषण करनेवाला परमात्मतत्त्व सब जगह, सब देशमें, सब कालमें, सब वस्तुओंमें, सम्पूर्ण घटनाओंमें, सम्पूर्ण व्यक्तियोंमें, सम्पूर्ण अवस्थाओंमें है, ज्यों-का-त्यों परिपूर्ण है। उसमें स्थिति हो जाय तो फिर कुछ भी करना, जानना, पाना बाकी नहीं रहेगा।
परमात्म-प्राप्तिमें खास बाधा
अब प्रश्न है कि उसमें स्थिति नहीं होती। उसमें कारण क्या है? सज्जनो! बार-बार सुनना भी अच्छा है, बार-बार कहना भी अच्छा है, पर वास्तवमें उसमें स्थित होना बढ़िया है। उसे ठीक हृदयंगम करें, उसका आदर करें। उसको महत्त्व दें। गलती क्या हो रही है? अब इस बातको आपलोग विशेष ध्यानसे समझें। हम जानते हैं कि लड़का पैदा हो जाता है और मर जाता है, धन आता है और चला जाता है, वस्तु मिलती है और अलग हो जाती है। ये जितनी चीजें हैं इनका भरोसा मनमें कर रखा है, बस, यह बड़ी भारी गलती है। मोटी गलती, सबसे बड़ी गलती, खास गलती। इन चीजोंको आधार मान रखा है, इतने रुपये हों तो मैं ठीक हो जाऊँ। रुपये चले जायँ तो मेरी क्या दशा होगी? इतना कुटुम्ब नहीं रहेगा तो मेरी क्या दशा होगी? यह अवस्था नहीं रहेगी तो मेरी क्या दशा होगी? बीमार हो जाऊँगा तो मेरी क्या दशा होगी? अरे भाई! ये सब तो जानेवाले ही हैं। उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुओंके अधीन क्या हो गया? यह तो सामने देखते-देखते उत्पन्न और नष्ट होते हैं न। आते हैं और जाते हैं कि नहीं! ये तो बदलते हैं न। इनके आने-जानेमें आप सुखी-दु:खी क्यों होते हैं? आ जायँ तो इनका उपयोग करो, चले जायँ तो भी उनका उपयोग करो। हमारे चाहिये ही नहीं। मिल गयी है तो अच्छी तरहसे काममें लाओ। सेवा करो, उपकार करो, हित करो। चली जाय तो अच्छी बात। भगवान्की मर्जी। ये तो आने-जानेवाले ही हैं।
भगवान् सबसे पहले यह बात बताते हैं गीताजीमें कि भाई! आने-जानेवाले हैं। ‘देहिनोऽस्मिन्यथा देहे’ शरीरधारीके इस देहमें ‘कौमारं यौवनं जरा’ कौमारावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था आती है। अब बालकसे जवान हो गया तो घरमें लोग रोते नहीं। क्या करें? छोरा जवान हो गया। जवानसे बूढ़ा हो जाय तो रोते नहीं सब मिलकर कि क्या करें यह तो बूढ़ा हो गया। बीमार हो जाता है तो बीमारी कैसे दूर हो? उद्योग करते हैं। पर बीमार क्यों हो गया, क्या करें? पाँच, सात, दस मिलकर रोवें। क्यों रोते हो कि बीमार हो गया। यह तो होता है। रोनेसे क्या हो? अपना काम उद्योग करो। इसकी बीमारी दूर कैसे हो? इसको आराम कैसे मिले? इसका दु:ख दूर कैसे हो? ऐसा उद्योग करना आपका काम है। उद्योग करनेपर यह ठीक हो जाय तो अच्छी बात, न हो तो हम क्या करें इसमें रोनेकी जरूरत नहीं। रोओगे तो इलाज नहीं होगा। सेवा नहीं कर सकोगे। व्याकुल हो जाता है, वह ठीक काम नहीं कर सकता। तो नुकसान ही होगा। ये तो आने-जानेवाले हैं।
प्रत्येक परिस्थितिमें सम रहें
सज्जनो, माताओ, बहनो! जरा आप ध्यान दो, थोड़ी कृपा करो। यहाँ सत्संगमें कोई पैसे नहीं मिलते। यहाँ कोई धन नहीं मिलता। माल नहीं मिलता, पर इतना बढ़िया माल मिलता है कि सदाके लिये सब निहाल हो जाओ। आज अभी इस बातसे ऐसा समझ लो, इस बातको मान लो, हृदयमें धारण कर लो कि भाई संसारकी वस्तु, परिस्थिति, घटना बदलनेवाली है। यह तो बदलेगी ही। एक समान किसीकी अवस्था नहीं रही। भगवान् राम अवतार धारण करते हैं। उनका शरीर कर्मजन्य नहीं होता है। हमारी तरह जन्मने-मरनेवाले नहीं हैं। स्वतन्त्रतासे प्रकट होते हैं। उनके भी आप जरा अवस्था देखो। वे कहते हैं—
यच्चिन्तितं तदिह दूरतरं प्रयाति
यच्चेतसापि न कृतं तदिहाभ्युपैति।
प्रातर्भवामि वसुधाधिप चक्रवर्ती
सोऽहं व्रजामि विपिने जटिलस्तपस्वी॥
हमने मनसे भी विचार नहीं किया कि हम जंगलमें रहेंगे। वनवास हो गया, बताओ कितनी विचित्र बात? और चिन्तन नहीं किया, वह तो आ गया। जो विचार किया था, वह दूर चला गया। सुबह ही राजा बन जाऊँगा, उसकी जगह चौदह वर्षका वनवास हो गया। तो विचार कुछ और ही करता है, होता कुछ और ही है। इसमें क्या चिन्ता करें?‘तू नर और विचार करे, तेरो विचार धरॺो ही रहेगो।’ यह तो विचार धरा ही रहेगा भाई! इस वास्ते विचार करो, पर उसकी चिन्ता मत करो। काम करना है, विचार कर लिया, हो गया तो बड़ी अच्छी बात न हो तो बहुत ही बढ़िया बात। अब मनचाहा न हुआ तो दु:खी हो जाते हैं, अमुकसे मिलना है, मिलना नहीं हुआ तो दु:खी हो जाते हैं। अपने कोई काम नहीं हुआ तो दु:खी हो गये। दु:खी क्यों होते हो भाई? उद्योग करो, पुरुषार्थ करो, यह भी सिद्ध हो जाय तो बड़ी अच्छी बात न हो जाय तो अच्छी बात। यह गीताकी शिक्षा है। यह महान् धन है। बड़ी भारी पूँजी है। ‘सिद्धॺसिद्धॺो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥’ (गीता २। ४८) प्राणायाम करो, श्वास रोको, मन लग जाय, समाधि लग जाय इसको योग कहते हैं लोग। पर गीता कहती है सिद्धि-असिद्धिमें सम रहो, यह योग है। कितनी बढ़िया बात। चलते-फिरते, काम-धन्धा करते, गृहस्थमें रहते हुए हानि-लाभमें दु:खी-सुखी नहीं होना। यह योग है, योग। प्राणायाम करके नाक पकड़कर करना इतना ऊँचा योग नहीं है। समाधि लगाना इतना ऊँचा नहीं है।
लोग कहते हैं मन नहीं लगता। मन लगना न लगना इतनी ऊँची चीज नहीं है। यह ऊँची चीज है कि सिद्धि-असिद्धिमें सम रहना। सिद्धि भी टिकनेवाली नहीं और असिद्धि भी टिकनेवाली नहीं।
रज्जब रोवे कौन को हँसे सो कौन विचार।
गये सो आवनके नहीं रहे सो जावनहार॥
जो मर गये, उनके लिये रोएँ क्या? वे तो आनेवाले हैं नहीं। अब इनको लेकर हँसें तो क्या हँसें? सब जानेवाले हैं। क्या रोएँ और क्या हँसें? करो तो सेवा करो उत्साहपूर्वक, सबको सुख पहुँचाओ। ऊँचे-से-ऊँचा अच्छे-से-अच्छा बर्ताव करो। यह तो है काम करनेका। पर यह क्या धन्धा शुरू कर दिया—रोना-हँसना, राजी होना, नाराज होना। मुफ्तमें यूँ ही। राजी-नाराज न होकर प्रसन्न रहो। भगवान् जो विधान करे।
‘जाहि विधि राखे राम ताही विधि रहिये।
सीताराम सीताराम सीताराम कहिये’॥
भगवान्का नाम लो, प्रसन्न रहो। यह तो आता है और जाता है, रहता नहीं। बनता है, बिगड़ता है, यह तो ऐसा होता है। एक कहानी आयी है। वह कोई खास सिद्धान्तकी नहीं है, पर बात बहुत बढ़िया है।
चिन्ता मिटानेके विषयमें एक कहानी
एक राजकुँवर था, उसके साथ पाँच-सात-दस घुड़सवार घोड़ोंपर घूम रहे थे। बहुत-सी गुजरियाँ कोई छाछ, कोई दूध, कोई दही ऐसे लेकर बिक्री करनेको जाती थीं। तो याद आ गयी कि भगवान्ने ऐसे ही दही-दूध लूटा था तो अपने भी चलो। फिर उनको दाम दे देंगे, एक तमाशा कर लें। राजकुमार गये और लूट लिया, उनके मटके फोड़ दिये। बेचारी रोने लगीं। एक उनमेंसे थी, जिसका छाछका मटका फोड़ दिया था, छाछ बिखर गयी। वह चिन्ता ही नहीं करती, वह वैसे ही प्रसन्न है। छाछका मटका लिये जाती थी, मटका फूट गया, छाछ बिखर गयी तो भी वैसे ही राजी है। तो राजकुँवरने कहा—‘तू रोती नहीं क्या बात है? तेरे चिन्ता क्यों नहीं हो रही है?’ तो कहा—महाराज! मेरी बात लम्बी है। मैं इस छाछका सोच क्या करूँ?‘महाराज कुमार भई गुजरी! अब छाछको सोच कहा करिये।’ अब छाछका सोच क्या करूँ? क्या बात हुई? तो उसने अपनी कथा सुनायी। राजकुँवरने सब साथियोंसे कह दिया सुनो भाई! बात सुनो।
वह कहने लगी—अमुक-अमुक शहरके एक सेठकी मैं पत्नी थी और मेरे गोदमें एक बालक था। वे सेठ बाहर देशान्तरमें चले गये कमानेके लिये। वहाँके राजाकी बुद्धि खराब थी। मेरी अवस्था छोटी और रूप सुन्दर था। उसने मेरेपर खराब दृष्टि कर ली और कहा—‘अमुक दिन तेरेको मिलना पड़ेगा, आना ही होगा, तुम कब आती हो जवाब दो?’ तो मैंने कहा—‘अभी ठहरो!’ अपने पतिको याद किया, पत्र दिया कि जल्दी आओ मेरे आफत आ गयी, आप जल्दी आओ। वह सेठ बेचारा आ गया तो बीती बात कही और पूछा कि ‘मैं क्या करूँ?’ तो आपसमें सलाह की कि कोई बात नहीं। तुम उसको समय दे दो। और राजाको कह दिया कि अमुक जगह शहरके बाहर आप आ जाओ, ‘पर शर्त यह रहे कि मीलभर नजदीकमें कोई अन्य व्यक्ति न रहे।’ राजाने स्वीकार कर लिया। दोनों पति-पत्नी घरसे निकल गये, कारण कि यहाँ टिक नहीं सकेंगे। तो रात्रिमें वहाँ तलवार लेकर गयी। जब राजा आया तो उसका टुकड़ा कर दिया और भाग गयी। राजासे कह रखा था कि रातभर कोई नहीं आना चाहिये, तो कोई नहीं आयेगा। भागनेके पहलेसे पतिको कह दिया था कि आप अमुक जगह टूटे-फूटे मकानमें रहो, जो वहाँ था। वहाँ रहा तो पतिको जहरीला साँप काट गया, जिससे वह मर गया। जब पतिके पास आयी तो उसे मरा पाया, फिर तो अकेली भागी कोई रक्षा करनेवाला नहीं था। पकड़ी गयी तो लोग टुकड़े-टुकड़े कर ही देंगे। बढ़िया गहने पहने हुए वहाँसे भागी।
आगे डाकू मिल गये। उन लोगोंने पकड़ लिया, सब गहने छीन लिये और वेश्याके घर ले जाकर बिक्री कर दिया। वेश्याने छोटी अवस्था देखकर खरीद ली। छोरा पीछे ही रह गया। अब वहाँ रहने लगी। अब उधर दूसरा राजा बैठा तो उसने मेरे छोरेको पालकर बड़ा किया। वह मेरा लड़का वहीं राज्यमें नौकरी करने लगा। बड़ा हो गया। इधर मैं वेश्या हो गयी। अब एक बार वह छोरा भी मेरे यहाँ आया। रातभर रहा मेरे वहम हो गया, कौन है यह? सुबह होते ही पूछा तो उसने नाम-ठाम बताया, तो पता लगा अरे! यह तो मेरा ही लड़का है। बड़ा दु:ख हुआ, क्या तेरी दशा थी? बड़ी ग्लानि, बड़ा भारी दु:ख हुआ। पण्डितोंसे पूछा—‘ऐसा किसीसे पाप घट जाय, तो क्या करे? तो कहा—‘चिता बनाकर आगमें बैठ जाय।’ विचार किया कि प्रायश्चित्त करना है। क्या मैं थी और क्या दशा हो गयी? ऐसा विचार आया कि चितामें बैठ जाऊँगी तो पीछे कौन गङ्गाजीमें डालेगा? नदीके किनारे काठ मँगाकर इकट्ठा कर बैठ गयी और आग लगा दी। वह काठ खूब जलने लगा। इतनेमें पीछेसे आयी बाढ़ तो उसमें बह गयी। बहते-बहते काठपर बैठी तो नौका हो गयी और आग बुझ गयी। अगाड़ी किसी गाँवके किनारे काठ ठहरा तो नीचे उतरी। उधर गाँवमें गूजर बसते थे। अब वहाँ उनकी चीज बिक्री करके काम चलाती हूँ। अब वह छाछ लेकर आयी। आज ढुल गयी। अब क्या चिन्ता करूँ?
नृप मार चली अपने पिव पे,
पिव भुजंग डस्यो जो गयो मर है।
मग चोर मिले उन लूट लयी,
पुनि बेच दयी गणिका घर है॥
सुत सेज रमी, चिता पे चढ़ी,
जल खूब बह्यो सरिता तरि है।
महाराज कुमार अब भयी गुजरी,
अब छाछको सोच कहा करि है?
अब छाछकी चिन्ता क्या करूँ? क्या-क्या घटना घटी है, मटकी फूट गयी, छाछ ढुल गयी क्या हो गया इसमें? इस वास्ते क्या चिन्ता करूँ? तो ऐसी भाई कितने जन्मोंमें क्या दशा हुई है? थोड़े-से नुकसानमें रोने लगा जाय। अब छाछको सोच कहा करिये? क्या इसकी चिन्ता करें। ऐसी घटनाएँ होती रहती हैं, यह तो बीतता रहता है।
हत्वा नृपं पतिमवेक्ष्य भुजंगदष्टं
देशान्तरेऽपि विधिवशाद् गणिका च याता।
पुत्रं पतिं समधिगम्य चितां प्रविष्टा
शोचामि गोपगृहिणी कथमद्य तक्रम्॥
सुखी-दु:खी होनेमें कारण—मूर्खता
गोप-गृहिणी होकर छाछको सोच क्या करूँ? ऐसी कई अवस्थाएँ हुई हैं, कितने जन्म बीत गये हैं। उसमें यह मर गया, बेटा मर गया, पति मर गया, पत्नी मर गयी। कई बार मरा है, क्या हो गया तेरे? तू यहाँका है नहीं, ये तेरे हैं नहीं। तू बहता आया है, साथमें मिल गये हैं। नदीमें काठ बहते हैं, बहते-बहते पानीका फटकारा लगे तो काठ इकट्ठे हो जायँ। दूसरे फटकारेमें अलग-अलग हो जायँ तो अब तो मिलें ही नहीं। अब क्या रोएँ, क्या करें? यह तो ऐसा आता है। हवा चलती है तो फूस कहीं-का-कहीं आकर इकट्ठा हो जाता है। दूसरे झोंकेमें अलग हो जाय, अब क्या नयी बात हो गयी? यह बात आने-जानेवाली है। अगर इस बातको मनुष्य याद रखे कि इनके लिये क्या चिन्ता करें, क्या फिकर करें? अपना काम है—सदा नित्य-निरन्तर रहनेवाला आनन्द है उसे प्राप्त करना। पर संसारमें तो क्या है? धन हो गया तो क्या, धन चला गया तो क्या? उसके लिये झूठ-कपट करें, बेईमानी करें, धोखेबाजी करें, विश्वासघात करें, महान् अन्याय करें। वह अन्याय तो पल्ले बँधेगा। धन यहीं रहेगा। धन साथमें रहेगा नहीं। साथमें रहना तो दूर रहा, उम्रभरमें जितना इकट्ठा किया है, खर्च कर सकोगे नहीं। छोड़कर मरोगे और पाप साथ ले जाओगे। यह जरा सोचो, होश आना चाहिये। कमाओ, रखो। कोई खावे अच्छी बात है। अपने तो बस—
खावो खरचो भल पण खाटो सुकृत हुवे तो हाथे।
दिया बिना न जातो दीठो सोनो रूपो साथे॥
इस वास्ते उपकार करो, हित करो, शरीरसे परिश्रम करो, सेवा कर दो। शास्त्रकी आज्ञा, धर्मकी मर्यादा, अपने कुलकी मर्यादामें रहते हुए सबकी सेवा कर दो। सुख पहुँचा दो। मौजसे रहो, आनन्दसे रहो, क्यों दु:ख पाओ? क्यों दु:खी होओ? धन हो गया राजी हो जाते हो, क्या हो गया तुम्हारे? धन हो गया तो हो गया। धन चला गया तो चला गया। आदर हो गया, हो गया। निरादर हो गया, हो गया। यह तो होता रहता है ‘आगमापायिनोऽनित्या:’ ये तो आने-जानेवाले हैं, अनित्य हैं। इसमें क्या सुखी होवें, क्या दु:खी होवें? ‘न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्’। (गीता ५। २०)। जो प्रिय लगे उसके प्राप्तमें हर्षित न होवे, अप्रिय हो गया तो अच्छी बात। वह भी चला जायगा। न सुख स्थिर रहता है न दु:ख। मनमें विचार करें पर हो जाय कुछ और ही, तो होना है भगवान्के अधीन। इस वास्ते होनेमें तो प्रसन्न रहें; क्योंकि यह हमारे हाथकी बात नहीं है।
करनेमें अच्छे-से-अच्छा, उत्तम-से-उत्तम काम करना है। नीचा काम नहीं करना है। करनेमें हरदम सावधान रहें और होनेमें प्रसन्न रहें। ये चीजें सत्संगसे मिलती हैं। अब इनको ले लो आप, तो निहाल हो जाओ। मस्त रहो संसारमें, सुख-दु:ख तो आते रहेंगे भाई! नफा और नुकसान तो होते रहेंगे। इनको कोई मिटा नहीं सकता, अपने मस्त रह सकते हैं। हो जाय तो बड़े आनन्दकी बात, न हो तो आनन्दकी बात। अपने आनन्दमें फर्क क्यों पड़े? इन आने-जानेवाली चीजोंको लेकर हम सुखी-दु:खी क्यों होवें? मुफ्तमें ही। कोई उड़ता तीर जा रहा हो, उसके सामने जावें और कहें लग गयी। तो क्यों गया सामने? फिर कहें लग गयी। यह प्रारब्धका दु:ख नहीं है। प्रारब्धका है घटना घट जाना, परिस्थिति बन जाना। यह तो है—प्रारब्धका फल और दु:खी हो जाना यह है—मूर्खताका फल।
सुख-दु:ख प्रारब्धका फल नहीं है। सुखी-दु:खी होते हैं भीतर। यह प्रारब्धका फल नहीं है। सुखदायी परिस्थिति आ जाय, दु:खदायी परिस्थिति आ जाय—यह प्रारब्धका फल है। वह निकल जायगी। फल भोगनेके बाद टिकेगी नहीं। सुखी-दु:खी होकर मुफ्तमें ही क्यों दु:ख पावें? होनेपर क्या होता है? प्रारब्ध-अनुसार परिस्थिति तो आती है। क्या बूढ़ा नहीं होगा? क्या ज्ञान होनेपर बीमार नहीं होगा? वह गृहस्थ होता है तो उसके बाल-बच्चे नहीं मरेंगे क्या? ज्ञान होनेपर धन आयेगा तो जायगा नहीं क्या? यह तो ऐसे ही होगा। ज्ञान होनेपर वह हर हालतमें मस्त रहेगा।‘पूरे हैं मर्द वे ही, जो हर हालमें खुश हैं।’ क्यों दु:ख पावें मुफ्तमें? परिस्थिति तो प्रारब्धजन्य है, आ गयी, आ गयी। निकल जायगी, हम बीचमें ही क्यों दु:ख खड़ा कर लें? वह हमारे अधीन है। हम क्यों दु:ख पावें? हम तो मौजमें रहेंगे। धन रहे तो बड़ी अच्छी बात, उपकार करेंगे। नहीं तो मौजकी बात, अपने कुछ करना ही नहीं पड़ेगा। ज्यादा धन हो तो ज्यादा जिम्मेवारी, ज्यादा विद्या हो तो ज्यादा जिम्मेवारी, ऊँचा वर्ण, ऊँचा आश्रम हो तो ज्यादा जिम्मेवारी और आश्रम, वर्ण नीचा हो तो जिम्मेवारी कम। मौज हो गयी। हर्ज क्या हुआ? सीधी-सादी बात है।
करनेमें सावधान होनेमें प्रसन्न
छाछ ढुल गयी, बड़ा गजब हो गया। क्या हो गया? अपने घरका इसमें क्या गया? मैं किस घरकी थी, क्या थी क्या-से-क्या हो गयी? अब छाछ ढुल गयी तो ढुल गयी। यह तो होता है ऐसा। अब इसपर कौन विचार करे? इस वास्ते वह परमात्मा रहता है, यह सब-का-सब ज्ञानके अन्तर्गत है कि नहीं। सुख होता है, दु:ख होता है, दोनों जाननेमें आते हैं। जाननेमें क्या फर्क पड़ा? थोड़ा-सा ध्यान दें। समाचार मिला कि अमुक जगह बेटा मर गया, अमुक जगह पोता पैदा हो गया। बातें दोनों बड़ी विरुद्ध हैं, बेटेका मरना और पोतेका जन्म होना। कितनी विरुद्ध? एक दु:खकी बात और दूसरी आनन्दकी बात। पर दोनोंका जो ज्ञान हुआ। ‘जानना’ उसमें क्या फर्क पड़ा? दोनों बातें जान लीं, ज्ञान हो गया। ज्ञानमें कोई फर्क नहीं। तो ज्ञान तो है ज्यों-का-त्यों रहता है। सुख हुआ और दु:ख हुआ तो उसमें राजी और नाराज होना हमारा काम नहीं है। हमें तो भगवान्की लीला देखकर प्रसन्न रहना है, मस्त रहना है।
रामायणमें बालकाण्ड आता है, अयोध्याकी बात भी आती है। जनकपुरीकी बात भी आती है और लंकापुरी व वनवासकी बात भी आती है। एक ही रामायणमें है। क्या रामायण अलग है? एक तो जनकपुरीमें पधारते हैं, एक लंकामें पधारते हैं। है कि नहीं फर्क? पर रामायण तो एक ही है न। ऐसे ही एक ही कथा है, उसमें आता है। कभी जनकपुरी आ गयी, कभी लंकापुरी आ गयी यह आता है। रामजीने भी करके बता दिया कि ‘बेटा! तुम चिन्ता मत करो।’ माता सीताने बता दिया ‘बेटी! तुम चिन्ता मत करो।’ कैसे महाराज जनकके यहाँपर पली। प्यारी पुत्रीपर उनका कितना स्नेह? लक्ष्मीनिधि उनके बड़े भाई थे, उनका कितना स्नेह था। माँ-बापका भी बहुत स्नेह था। सिद्धि महारानी थी भौजाई, उसका बड़ा ही स्नेह था। परिवारके सभी लोगोंका स्नेह था। जनकपुरी नगरीके लोग तो—महाराज! ‘हमारी राजकुँवरी है। हमारे महाराजकी प्यारी पुत्री है!’ सबका बड़ा आदर था और वहाँसे अयोध्या चले गये। शुक (तोता) मैना भी रोते हैं—कहाँ है जानकी? लोगोंके हृदयमें चोट लगे, आँसू आ जाय पक्षियोंकी बात सुन करके! इतना स्नेह! वहाँ अयोध्या गयी तो किस ढंगसे पाला कौशल्याजीने? किस रीतिसे प्यार किया? दीप बाति नहिं टारन कहऊँ, सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा॥ (मानस २। ५९) कड़ी जगह सीताजीने पैर नहीं रखा। जहाँ सीताजीके घूमनेका स्थल था, वहाँ मखमलके गद्दे बिछाये रहते थे। वहाँ घूमती थीं सीताजी।
आज जंगलमें जा रही है। गर्म लू चले जोरदार, कभी ठण्डी चले, कभी वर्षा हो जाय, खानेका ठिकाना नहीं, रहनेका ठिकाना नहीं। ऐसी अवस्थामें सब कहते हैं तुम यहीं घरपर रह जाओ। सासने, ससुरने, पतिने, सबने कहा—मन्त्रियोंने कहा—वनवास साथमें मन्त्री गया। उसने कहा—‘बेटी! तुम पीछे चलो।’ राम! महाराज दशरथने कहा है कि ‘आप वापस पधारो, आप नहीं तो कम-से-कम इस जनकराजदुलारीको तो पीछे ले ही आओ। इसका सुकोमल शरीर है, कैसे वनवासका कष्ट सहेगी? इसको ले आओ।’ दशरथजीने कहा कि ‘मैं जनकराज-पुत्रीको भी देखता रहूँगा तो मेरे प्राण बच जायँगे। हमारे रामललाका शरीर है यह। उसका ही आधा अंग है। मेरे प्राण बच सकते हैं।’ कितना महाराज, श्वशुरका उपकार-सेवा हो सकती है। वनवास आपको तो है नहीं। परंतु नहीं, मैं तो महाराजकी सेवामें रहूँगी। कष्ट सह लूँगी, पर महाराजकी सेवामें रहूँगी। बताओ! अपने कर्तव्यका पालन करना ठीक तरहसे दु:खी-सुखी क्या होना? क्या राजी-नाराज होना है? होनी रामजीमें भी हो गयी तो हमारे हो जाय, इसमें क्या बड़ी बात हो गयी? बड़े-बड़े अवतारोंमें, महापुरुषोंमें, जीवन्मुक्त सन्तोंमें सुख भी आया और दु:ख भी आया। न सुख ठहरे, न दु:ख ठहरे। यह संयोग-वियोग होता रहता है, अब इसमें क्या सुखी-दु:खी होवे?
‘समत्वं योग उच्यते’ गीता इसको योग कहती है। ऐसे संयोग-वियोगमें अपने तो एक ही बात है—एक रस रहे। सूर्य उदय होता है तो भी लाल। अस्त होता है तो भी लाल। यह नहीं कि उदय होनेमें खुशी ज्यादा आ जाय और दूसरा रंग हो जाय, अस्त होनेमें और दूसरा रंग हो जाय। वह तो एक ही है। ऐसे कितनी ही उन्नति हो जाय, कितना ही आदर हो जाय, चाहे कितना ही निरादर हो जाय। यह तो आता-जाता है। ‘आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व।’, ‘यं हि न व्यथयन्त्येते’ जिनको व्यथा नहीं पहुँचाते हैं। न सुख आकर हलचल करता है और न दु:ख आकर हलचल करता है। हृदयमें जो हलचल है—यह व्यथा है व्यथा, यह पीड़ा है पीड़ा, यह आफत है आफत। सुख लेकर खुशी होते हैं—‘यह भी आफत है और महाराज, विपरीत अवस्था लेकर दु:खी होते हैं, यह भी आफत है। इस वास्ते पाप मत करो, अन्याय मत करो, न्यायपूर्वक सब काम करो। अब सुख आ जाय, दु:ख आ जाय।’ अन्याय करनेपर सुखी हो ही जाओगे, यह बिलकुल गलत बात है।
धनके लिये अन्याय मत करो
‘पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं॥’ (मानस २। २५१। ५) लज्जा-निवारण करनेके लिये तो कपड़ा नहीं, पेट भरनेके लिये अन्न नहीं और पाप रात-दिन करते हैं। पाप करना-न-करना यह हाथकी बात है, पर सामग्री मिलना-न-मिलना हाथकी बात नहीं है। पाप नहीं करेंगे। अन्याय नहीं करेंगे। न्याययुक्त धर्मका आचरण करेंगे—इसमें मनुष्य स्वतन्त्र है। ऐसा कभी मत समझो कि हमारे पाप लिखा है, इस वास्ते पाप करते हैं। बड़ी भारी गलती है। अगर यह लिखा है, वैसा ही होता है तो हमें जो शिक्षा दी जाती है कि ऐसा करो और ऐसा मत करो—इसका क्या अर्थ होगा? क्योंकि जिसके प्रारब्धमें लिखा है पाप करना, वह तो पाप करेगा ही और जिसके प्रारब्धमें पुण्य लिखा है, वह पुण्य करेगा ही। तो पाप मत करो और पुण्य किया करो, इसका क्या मतलब हुआ? शास्त्र निरर्थक, शिक्षा निरर्थक, विधि-निषेध निरर्थक। इस वास्ते अपने करनेमें सब स्वतन्त्र हैं। होनेमें परतन्त्र हैं। अब क्या होगा, कब होगा, कैसा होगा? इसका पता नहीं; परंतु जो करते हैं, इसमें पाप, अन्याय, झूठ, कपट, बेईमानी नहीं करेंगे। ईमानदारीको सुरक्षित रखो। आपकी रक्षा करेगी ईमानदारी।
नरकोंमें क्यों जाते हो भाई? मुफ्तमें ही। झूठ-कपटसे थोड़ा धन बचा लिया तो क्या कर लोगे? धन तो यहीं पड़ा रहेगा, मर जाओगे। फूँक निकल जायगी। पर असत्य बोला हुआ आपके साथ जायगा। धन एक कौड़ी जायगी नहीं। केश-जितना भी पाप पीछे रहेगा नहीं। तो मनुष्यको अपना भला-बुरा सोचना चाहिये, मैं क्या कर रहा हूँ? यह मनुष्य-शरीर नरकोंमें जानेके लिये मिला है क्या? इसमें आप स्वतन्त्र हैं, इसमें आप पराधीन नहीं हैं। पर इसका होश नहीं है, मनुष्यको तो पता नहीं है। यह बिना पता लगे आदमी गलती करता है। एक सज्जन मिले थे, उनकी बात मैंने सुनी थी। बूढ़े हो गये थे, वे रोने लगे। बात क्या हुई? उन्होंने कहा—मैंने माँकी सेवा जैसी की जाय, वैसी नहीं की। पीछे मेरेको पता लगा कि माँके समान संसारमें उपकार करनेवाला कोई नहीं है। ‘मात्रा समं नास्ति शरीरपोषणम्’ इस शरीरको पुष्ट करनेवाला माँके समान दूसरा कोई नहीं है। जन्म दिया है, पालन किया है। खाना-पीना-चलना भी सिखाया है जिसने। ऐसी माँकी सेवा करनी चाहिये। परंतु पहले पता नहीं था, पीछे पता लगा, माँका शरीर शान्त हो गया। मैंने माँकी सेवा नहीं की। तो जब पता लगेगा न, तब आपके पश्चात्ताप होगा। तो पहलेसे बताते हैं कि माता-पिता, बड़े पूज्य, आचार्य हैं, उनकी सेवा करो, उनको सुख पहुँचाओ। बूढ़े हैं, बड़े हैं, चले जायँगे फिर क्या करोगे। सास हैं, ससुर हैं, ये आपके घरोंमें तीर्थ हैं। साक्षात् —इन तीर्थोंका सेवन करो।
सती सुकलाकी कथा
एक कृकल नामके वैश्य थे, पद्मपुराणमें कथा आती है। उसके सुन्दर स्त्री थी, कृकल वैश्य भी धर्मात्मा पुरुष था। कृकलकी पत्नी सुकला भी बड़ी सुन्दर, सदाचारिणी, पतिव्रता स्त्रियोंमें शिरोमणि थी। गाँवके लोग तीर्थयात्रामें जा रहे थे तो यह मनमें विचार करने लगा कि हम भी तीर्थयात्रामें जायँगे। अपनी सती-साध्वी स्त्री सुकला थी, उसके सामने विचार किया तो उसने कहा—‘आप तीर्थोंमें जाओ तो मैं भी साथमें चलूँगी।’ वह सुन्दर तो थी ही, शरीर भी बड़ा सुकुमार था और तीर्थयात्रा आजकलकी तरह नहीं थी, जो सैर-सपाटा हो गया है। पैदल जाना पड़ता, वर्षोंतक घूमना पड़ता था। ज्यादा कपड़ा नहीं रखना, ज्यादा सामान नहीं रखना। तीर्थोंके कष्टोंको सहना है। भूख, प्यास, गर्मी, सर्दी सहना है। लोगोंमें कहावत है—‘कैसे थक गया, तीर्थोंका भक्त होवे ज्यों।’ तीर्थोंमें जाता है तो थक जाता है। ऐसी दशा थी तो कृकलने देखा, यह निभ नहीं सकेगी। अभी तो कहती है साथ चलूँगी, पर मार्गमें बड़ा कष्ट है। यह सह सकेगी नहीं। इसका शरीर बहुत कोमल है, बहुत अमीर है। इस वास्ते उसे सोती हुई छोड़कर रात्रिमें अकेले ही चल दिये। सुबह इधर-उधर पता लगा कि वे तो तीर्थयात्रामें गये। बड़ी दु:खी हुई, क्या करे, नहीं ले गये। वहीं रहने लगी।
सुकला बहुत ही सुन्दर थी। देवराज इन्द्रका उसपर मन चला, जिनके अनेक अप्सराएँ हैं। उसने रतिको अपनी दूती बनाकर भेजा जो कामदेवकी अत्यन्त सुन्दरी स्त्री है। वह उसके पास आकर बातें करने लगी। मित्रता कर ली, मित्रतामें ही इन्द्रकी कुवासनाकी बात छेड़ी तो वह तेज हो गयी। एक बार बगीचेमें घूमते हुए बता दिया कि इन्द्र सामने आया है और तेरेको चाहता है, तो जोरसे बोली—‘भस्म कर दूँगी! एक जबान कहूँ जिसमें खतम हो जाओगे!’ डर गया वह भी। वे सब चले गये। वह अपना ठीक धर्मका पालन करती हुई रही।
विधि आती है कि तीर्थोंमें श्राद्ध जरूर करना चाहिये, तिथि आवे, चाहे न आवे। अच्छा ब्राह्मण मिल जाय और अच्छा तीर्थ मिल जाय, वहाँ पिण्डदान करो और ठण्डी नदी ‘नदीषु बहुतोयासु।’ नदी जिसमें बहुत जल भरा हुआ हो और ‘शीतलाषु विशेषत:’ उसमें पूर्वजोंको पानी जरूर देना चाहिये। वहाँ जल दान करना चाहिये। तो कृकल तीर्थोंमें बडेरोंको खूब अच्छी तरहसे पिण्ड-पानी दिया, श्राद्ध किया। दान-पुण्य करके ब्राह्मणोंको सन्तुष्ट किया। वह जब लौटकर आने लगा तो सामने बहुत बड़े शरीरवाला एक पुरुष मिला। वह एक-एक हाथमें तीन-तीन, चार-चार आदमियोंको पकड़े हुए था। वे चीं-चीं कर रहे थे। उससे कृकलने पूछा—‘तुम कौन हो?’ मोटे पुरुषने कहा—‘मैं साक्षात् धर्म हूँ।’ कृकलने पूछा—‘ये तुम्हारे हाथमें कौन हैं?’ उसने कहा—‘ये तेरे माँ-बाप और दादा-दादी हैं। बिना पत्नीके तुमने पिण्ड, पानी, श्राद्ध किया और ले लिया इन्होंने। इस वास्ते ये अपराधी हैं। इस वास्ते इनको दण्ड दूँगा।’ कृकल बड़ा घबराया। घरपर आनेपर उसकी स्त्री सुकलाने बड़ा उत्सव मनाया। आज हमारे तो सूर्योदय हुआ है। जो रात थी, वह बीत गयी, खुशी मनायी।
कृकलने कहा—‘अपने श्राद्ध-तर्पण करो, पहले बडेरोंको राजी करो, बडेरे किस तरहसे सुखी हो जायँ? तो पत्नीके सहित विधि-विधानसे ब्राह्मणोंको पूछकर अच्छी तरहसे श्राद्ध-तर्पण किया। श्राद्ध-तर्पणमें देवता प्रकट हो गये। उन्होंने कहा—‘तू पहले अकेला तीर्थयात्रामें गया। वहाँ तूने उनको पिण्ड दिया। इस वास्ते दोष लगा। अब तेरे पितरोंको शान्ति मिलेगी; क्योंकि तेरी स्त्री पतिव्रता है। वह बेचारी पीछे रोती रह गयी। उसे साथ नहीं ले गया। तूने बड़ा अपराध किया।’ वहाँ वर्णन आया है—‘पत्नीतीर्थ’—जो पतिव्रता स्त्री होती है, वह तीर्थ होती है। माता-पिता तीर्थ, भाई तीर्थ, भौजाई तीर्थ और पतिव्रता स्त्री भी तीर्थ होती है। विदेशोंमें जैसे ठेकेदारी होती है, कांट्रैक्ट होते हैं, ऐसे हमारे यहाँ विवाह नहीं है। यहाँ विवाह पुण्यकारी काम है। बड़ा निर्मल काम है। स्त्रीके लिये कहा गया है कि पतिको ईश्वर समझे। पतिके लिये ऐसा नहीं कहा है कि पत्नीका तिरस्कार करो, अपमान करो। बड़ा भारी पाप लगता है। जो अपनी स्त्रीका अपमान करता है, तिरस्कार करता है, त्याग करता है, दु:ख देता है, हाथ उठाता है तो वह बड़ा खराब काम करता है। बड़ा पाप करता है। यह आपका आधा शरीर है, अर्धाङ्गिनी है। उससे सलाह पूछो, दोनोंकी सलाहसे काम करो। ऐसा विवाहके समय वचन देते हैं एक-एकको। इस तरहसे करो। पर तूने ऐसा नहीं किया। पत्नीकी कृपासे ही तुझे माफ हुआ है, नहीं तो माफ नहीं होता। ऐसे उसने श्राद्ध-तर्पण आदि किया, देवताओंको, बडेरोंको राजी किया।
संसारमें रहनेका तरीका
पत्नी भी तीर्थ है सज्जनो! तीर्थ है तीर्थ। घरमें माता-पिता हैं, बड़े-बूढ़े हैं, वे तीर्थ हैं। उनका निरादर करते हो, तिरस्कार करते हो। उनका बड़ा भारी अपमान करते हो। तो ऐसा तिरस्कार करनेवालेका भगवान् भी विश्वास नहीं करते। जो माँ-बापका तिरस्कार करता है,जो स्त्री पतिका तिरस्कार करती है, जो पुरुष पत्नीका तिरस्कार करता है, जो कुटुम्बका तिरस्कार करता है; अपमान करता है, दु:ख देता है तो भगवान् उसकी भक्तिका विश्वास नहीं करते। सज्जनो! भगवान्की भक्ति भी करो और यहाँ जो बड़े हैं, पूजनीय हैं, आदरणीय हैं उनका आदर-सत्कार करो। अच्छा बर्ताव करो। फिर कब करोगे? बताओ। यह मनुष्य-शरीर हाथसे निकल जायगा तब क्या करोगे? प्राणोंके रहते-रहते अच्छा आचरण करके सबकी सेवा करो। दुनियामें भलाई होगी महाराज! परलोकमें कल्याण होगा। भगवान् राजी हो जायँगे। सन्त, शास्त्र, महात्मा खुश हो जायँगे, प्रसन्न हो जायँगे। जैसे, बालककी उन्नति देखकर माँ-बाप खुश होते हैं, ऐसे ऋषि, मुनि, महापुरुष भी आपका सदाचार, सद्गुण देखकर खुशी हो जायँगे। प्रसन्न होंगे, राजी हो जायँगे। ये बड़े अच्छे लड़के-लड़की हैं, जो धर्मका पालन करते हैं। ऋषि-मुनियोंकी, भगवान्की बड़ी भारी सेवा हो जायगी।
‘आग्या सम न सुसाहिब सेवा’ उनकी आज्ञा पालन करना बड़ी भारी सेवा है। इस वास्ते ‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धिं लभते नर:।’ (गीता १८। ४५) अपने-अपने कर्तव्य करते हुए मनुष्य संसिद्धिको प्राप्त हो जाता है। इस वास्ते बड़े उत्साहके साथ, बड़ी लगनके साथ सेवा करो। और पहले कोई गलती हो गयी है उसके लिये उनके चरणोंमें गिरकर माफी माँग लो। बड़े पुरुष माफी देनेको तैयार हैं। माँ-बाप माफी दे देते हैं। पैरों पड़ जाओ तो माँ माफ कर देती है। माँको तो माफ करनेकी मनमें ही आती है। वह अपराध मानती ही नहीं। गोदीमें टट्टी फिर दे, पेशाब कर दे, उसको भी साफ कर देती है।
एक पण्डितजी महाराज कहते थे—विवाह करानेके लिये गये। तो वहाँ बहनें बड़ा सुन्दर-सुन्दर शृंगार करके आयीं। तो एक बहनकी गोदीमें छोटा बालक था। वह बढ़िया रेशमी जरीदार साड़ी पहने हुए थी। तो बच्चा टट्टी फिर गया तो पासमें बैठी स्त्री बोली—‘छोरा टट्टी फिर गया है।’ तो वह छोरेकी माँ बोल पड़ी—‘चुप रह जा, हल्ला करेगी तो छोरेकी टट्टी रुक जायगी, बीमार हो जायगा।’ पण्डितजी मदनमोहनजीकी कही हुई बात, जो काशीमें अच्छे विद्वान् थे। बड़े त्यागी थे, उन्होंने यह बात सुनायी। तो देखा कि माँ कितना सहती है। दूसरी स्त्री चेता रही है कि ऐसी बढ़िया साड़ी खराब हो रही है। तो कहती है, हल्ला मत कर छोरेकी टट्टी न रुक जाय कहीं। अपने कपड़े खराब हो भले ही। इसके समान कौन है संसारमें सेवा करनेवाला?
ये भाई-बहन बड़े-बड़े चतुर बने हैं। हम भी बातें बनाते हैं तो हम सबकी दशा क्या थी? वही दशा थी। इस माँने पालन किया। माँकी कृपासे आप और हम बैठे-बैठे राजी हो रहे हैं। दशा क्या थी? टट्टी-पेशाब कर दिया और उसीमें लकीरें निकालते थे बैठे-बैठे। माँ कहती क्या कर रहा है? तो समझते ही नहीं थे। पता ही नहीं था। टट्टी-पेशाबका ज्ञान ही नहीं था कि यह अशुद्ध है, अपवित्र है कि क्या है? ऐसा ज्ञान था क्या? वही मैलेसे भरा हाथ यूँ सामने कर दिया। माँ कहती—‘अरे क्या करता है?’ माँ कहती तो समझते कि क्या हो गया? होश नहीं था। यही दशा थी कि नहीं। वह खिलाती तो मुँहसे गिरा देते थे। चाहे जहाँ लोट लेते, चाहे जहाँ टट्टी कर देते, चाहे जहाँ पेशाब कर देते थे। ऊँचे-से-ऊँचा ज्ञान भी माँने दिया और नीचे-से-नीचा काम टट्टी-पेशाब भी माँने उठाया। धोबीका काम किया, दर्जीका काम किया, मेहतरका काम किया, गुरुका काम किया। कौन-सा ऐसा बड़े-से-बड़ा काम, छोटे-से-छोटा काम, जो माँने न किया हो। उस माँका तिरस्कार करते हो, अपमान करते हो। बड़े भारी पापकी बात है। इस वास्ते भाई! माँकी सेवा करो, घरमें ही तीर्थ है।
जिसको संसारमें रहना आता है, वह मुक्ति कर लेगा। संसारमें रहना नहीं आता है तो बड़े त्यागी, महात्माजी बन जाओ तो भी कल्याण थोड़े ही हो जायगा। क्योंकि संसारमें ही रहना नहीं आता तो मुक्ति कैसे हो जायगी? जो तुम्हारे सामने परिस्थिति भेजी है, उसका भी उपयोग तुम ठीक नहीं कर सकते, तो इससे कल्याण कैसे हो जायगा? जो भगवान्ने अवसर दिया है, मौका दिया है, उसका अच्छी तरहसे उपयोग करो। ये बातें सत्संगके द्वारा सीखनी हैं और कोरी याद ही नहीं करनी हैं, काममें लाना है। आचरण अपना शुद्ध, निर्मल बनाना है। व्यवहार अपना सबके साथ अच्छे-से-अच्छा, ऊँचे-से-ऊँचा करना है फिर देखो। खुदको शान्ति मिलेगी, आनन्द मिलेगा, प्रसन्नता होगी। पहले माँ-बापका खुद तो आदर नहीं करता, फिर चाहे कि छोरा-छोरी हमारा आदर करे। तो क्यों भाई? तुमने रीति क्या निकाली है? अब पीछे दु:ख पाते हैं। ‘छोरे कहना नहीं मानते’, तो ‘तैने कैसा कहना माना है?’ ‘म्हारे बीनणी कह्योको मानेनी।’ तो थे कितोक मान्यो कह्यो। आप तो ‘करत कुसंग चाहत कुसल।’ आप अच्छा करो, वह करे न करे। कोई हर्ज नहीं। आप अच्छे-से-अच्छा बर्ताव करो, वो न करे तो समझावो प्यारसे। बुरा मानो मत। बर्ताव अपना अच्छे-से-अच्छा करो। लड़का-लड़की नहीं मानें, बहुएँ नहीं मानें तो कोई हर्ज नहीं। बड़ी अच्छी बात। लड़का-लड़की-बहुएँ कहना मानें, उसमें तो है खतरा। मोह हो जायगा, फँस जाओगे। वे कहना नहीं मानें, उसमें आपके बड़ा लाभ है। उसके बड़ा नुकसान है।
तेरे भावे जो करे भलो बुरो संसार।
नारायण तूँ बैठके अपनो भवन बुहार॥