प्रवचन—४
मनुष्यको ऐसा स्वभाव बनाना चाहिये, जिससे अपना कल्याण हो। जीवमात्रकी इच्छा होती है कि हमारी बात रहे, लोग हमारी बात मानें—ऐसी एक आदत रहती है, उसीसे ही जन्म-मरण होता है। हमारे कुछ स्वभाव ऐसे हैं कि हम सुनावें तो दूसरा कहे जैसा सुनावें और जो कहे, वो काम करें। अपनी बात नहीं रखना ऐसा स्वभाव कुछ बनाया है। इस वास्ते कोई पूछ ले तो ठीक लगता है। हमारे सहारा लगता है कि ठीक है भाई! यों ही कहेंगे।
असली स्वतन्त्रता
यह जो गीतामें कहा है न, कामनाके त्यागकी बात, तो कामना क्या है? इस विषयमें मैंने पढ़ा भी, सोचा भी और प्रश्नोत्तर भी किये हैं। इस बातको समझनेके लिये प्रयत्न किया है। तो एक जगह हमें बहुत विलक्षण बात मिली। कामना नाम किसका है? ‘मेरे मनकी बात हो जाय’ बस, यही कामना है। मेरे कहनेके अनुसार चले, मेरे मनकी बात हो जाय। भगवान् कर दें तो वे ठीक, सन्त-महात्मा कर दें तो वे ठीक, लोग कर दें तो वे ठीक। हमारे मनकी बात करें—यही कामना है। इसका त्याग कर दें तो आदमीको शान्ति मिलती है, मुक्ति मिलती है, कल्याण होता है, बड़ा लाभ होता है। मनुष्य समझता है कि मेरा हुकुम चले तो मैं स्वतन्त्र हुआ और मैं दूसरोंकी बात करता हूँ, सुनता हूँ तो परतन्त्र हुआ। यह बिलकुल गलत बात है। स्वतन्त्रता-परतन्त्रता क्या है?
परतन्त्रतामें स्वतन्त्रता, स्वतन्त्रतामें परतन्त्रता, परतन्त्रतामें परतन्त्रता, स्वतन्त्रतामें स्वतन्त्रता—ऐसे चार भेद करके विवेचन करनेका काम पड़ा है। मनुष्य मानता है कि मैं स्वाधीन हूँ, चाहे सो करूँ, चाहे सो करवा लूँ, तो मैं स्वतन्त्र हो गया। यह स्वतन्त्रता नहीं है, महान् परतन्त्रता है। मामूली परतन्त्रता नहीं है; परंतु यह बात अकलमें नहीं आती। उलटी बात समझमें आती है। जैसे— कल्पना करो, हमारे मनमें घड़ी लेनेकी हो और घड़ीपर मन चले कि घड़ी अपनेको मिल जाय; परंतु रुपये पासमें नहीं हैं। इस वास्ते अनुभव होता है कि रुपये होते हैं तो हम स्वतन्त्र हैं और रुपये नहीं होते हैं तो हम परतन्त्र हैं। किसी चीजको लेनेकी मनमें होती है तो नहीं ले सकते, तो हम पराधीन हुए। रुपये हों तो घड़ी ले ली चट, तो स्वाधीन हो गये। इतनेतक ही अकलमें बात आती है; परंतु यह समझमें नहीं आती कि रुपये ‘स्व’ हैं क्या? रुपये स्वयं हो क्या आप? ‘पर’ ही तो हैं रुपये भी। स्वयं आप रुपये हो क्या?
रुपयोंके जो अधीन हुआ, वह स्वाधीन कैसे हुआ? वह तो रुपयोंका गुलाम हुआ। किसीके कहनेसे करता है तो उसका गुलाम हुआ। आपके कमाये हुए रुपयोंके आप वशमें हो गये, अधीन हो गये—यह स्वाधीनता कैसी? यह महान् पराधीनता है, जडकी पराधीनता है। रुपये ज्यादा हो जायँ तो खर्च करना मुश्किल हो जाता है। थोड़े रुपये तो खर्च कर सकता है आदमी। ज्यादा रुपये खर्च करना बड़ा मुश्किल होगा। वह समझता है कि स्वाधीन हूँ, पर महान् पराधीन हो जाता है। परंतु भाई! यह बात समझमें नहीं आती है, क्या करें? रुपयोंके अधीन काम हुआ तो स्वतन्त्रता कैसी?
स्वतन्त्रता किसका नाम है? हमारे मनमें कोई बात नहीं, किसी बातकी इच्छा नहीं। किसी बातकी चाहना नहीं।
यह जो इच्छा होती है मनमें कि यह हो जाय, यह हो जाय—इसका नाम है कामना। गीताने इसके त्यागपर बड़ा जोर दिया है। ‘इदं मे स्यादिदं मे स्यादितीच्छा कामशब्दिता:’ यही कामना है। ऐसा हो जाय, ऐसा हो जाय। ‘पूरे हैं मर्द वे ही जो हर हालमें खुश हैं। जो हो जाय, उसमें ही खुश हैं।’ बहुत आनन्द है, वे स्वतन्त्र हैं। कैसी परिस्थिति आ जाय, कैसी अवस्था आ जाय, कैसी घटना घट जाय, जो कुछ हो जाय, उसमें मस्त रहे अपने। तब वे संसारसे ऊँचे उठ गये।
इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन:।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिता:॥
(गीता ५। १९)
परमात्म-स्वरूपमें कौन स्थित होते हैं? जो यहाँ जीवित अवस्थामें ही संसारमात्रपर विजयी हो जाते हैं। उसपर कोई संसारका प्राणी विजयी नहीं हो सकता। सबपर विजयी कौन है? ‘येषां साम्ये स्थितं मन:’ जिनका मन साम्यावस्थामें स्थित हो गया है। साम्यावस्था क्या? जो हो जाय उसीमें ही मस्त रहे। जैसे हो जाय ठीक है। करनेमें भगवान्के अधीन रहे। करनेमें शास्त्रके, भगवान्के अधीन रहना। इसमें परतन्त्रता दीखती है, पर इस परतन्त्रतामें महान् स्वतन्त्रता भरी है। जो बड़ा होकर माँ-बापका और गुरुजनोंका कहना नहीं करता, मर्यादाका पालन नहीं करता, वह समझता है कि मैं स्वतन्त्र हूँ। वह वास्तवमें अपनी इन्द्रियोंका, अपने मनका गुलाम है। आज समझते हैं कि हम तो नयी रोशनीके आदमी हैं। स्वतन्त्र विचारोंके हैं। किसीका कहना नहीं करेंगे, मर्जी आये सोई करेंगे। हम तो कहते हैं कि तुम्हारी नयी रोशनी है तो मनुष्योंमें पहले गधापन, कुत्तापन नहीं था यह बिलकुल नयी रोशनी होगी, बन्दर भी करता है अपनी मर्जीसे और डरता है तो केवल डण्डेसे। कुत्ता भी मेहतरके घरमें जैसे चला जाय, वैसे ही बिना पैर धोये ब्राह्मणके घरमें चला जायगा, क्योंकि यह स्वतन्त्र है। यह स्वतन्त्रता कोई स्वतन्त्रता होती है? जहाँ चाहे टट्टी फिर जाय, जहाँ चाहे पेशाब कर जाय; क्योंकि स्वतन्त्र हैं हम तो। ऐसी स्वतन्त्रता मनुष्योंमें नहीं थी। माता, पिता, धर्म आदिकी बात मानते थे। अब कहते हैं कि हम नयी रोशनीके हैं, बिलकुल नयी रोशनी। तुम नयी रोशनी कहते हो, पर यह बिलकुल अँधेरा है। मनुष्यमें ही अँधेरा हो गया। अँधेरा पशुओंमें, पक्षियोंमें तो था। अब मनुष्योंमें भी आ गया। रोशनी कैसी हुई है? परंतु इसको ही रोशनी कहते हैं।
अपनी स्वतन्त्रता कब होगी? जब अपने साथियोंको, अपने साथ रहनेवालोंको स्वतन्त्रता दी जाय। उनकी न्याययुक्त बात हो तो उसका आदर किया जाय। उनकी न्याययुक्त बात हो वह हमें माननी चाहिये। यह बात खयाल रखनेकी है। कुटुम्बियोंके साथ आप बर्ताव करें तो कुटुम्बमें रहनेवाले भाई-भौजाई, भतीजे, स्त्री-पुत्र, माता-पिता, काका-बाबा आदि जितने हैं उनकी बात अगर न्याययुक्त है तो उस बातको प्रधानता देनी चाहिये। अपनी मनमानीको प्रधानता नहीं देनी चाहिये। इससे आदमी स्वतन्त्र होता है। बड़ा श्रेष्ठ आदमी हो जायगा। समाजमें भी ऊँचा स्थान पा जायगा। भगवान्के यहाँ भी ऊँचा स्थान पा जायगा। सन्तोंके, महात्माओंके, शास्त्रोंके, धर्मोंके अनुसार वह श्रेष्ठ पुरुष बन जायगा। जो अपनी मनमानी करता है, अपनी हेकड़ी रखता है और अच्छा-मन्दा सब तरहका काम कर बैठता है तो उसके घरवाले भी उससे राजी नहीं होते। बाहरवाले एवं समाजवाले भी राजी नहीं होते। उसकी परतन्त्रता छूटती नहीं। पशु-पक्षी आदि योनिमें नरकोंमें जाओगे तो वहाँ तो परतन्त्रता है ही; परंतु मनुष्य-योनिमें यह स्वभाव डाल दिया। अब यह जहाँ जायगा, वहाँ दु:ख पायेगा, कष्ट उठायेगा।
स्वभाव सुधारनेका अवसर
यहाँ मनुष्य-शरीरमें आये हैं तो हमारेको खास बात क्या करनी है? आस्तिक हो, चाहे नास्तिक हो। अपने स्वभावको शुद्ध और निर्मल बनाना है। ऐसा निर्मल बने कि हमारे स्वभावसे किसीको तकलीफ न हो। अपनी नीयत तकलीफ देनेकी न हो, किसीको कष्ट देनेकी न हो। हमारी क्रिया भी न हो, हमारा भाव भी न हो; फिर भी किसीको दु:ख हो जाता है तो उसका भी खयाल करना बड़ा अच्छा कि उसे दु:ख न हो; परंतु यह हाथकी बात नहीं।
आपके स्वभावमें दूसरेको दु:ख देनेकी बात नहीं है। पर आपको देखकर जल उठे। उसका क्या किया जाय? रात्रिमें बिजली चमकती है तो गधी दुलत्ती मारती है। क्या आफत आ गयी? अब वह बिजली क्या करे बेचारी। उसने गधीको कोई दु:ख दिया है क्या? पर वह गधी दु:ख यों ही पावे। अब उसका क्या किया जाय? इस तरहसे दूसरेको देखकर दु:ख होता है, वह अपने स्वभावके कारण दु:खी होता है। हम अपना जीवन संयत रखें और ठीक तरहसे चलें। देख-देखकर ही किसीको जलन पैदा हो जाय तो अब उसमें भगवान्से प्रार्थना करें—‘हे नाथ ! हमारे द्वारा किसीको दु:ख न हो। हमारेको देखकर भी दु:ख न हो।’ ऐसा अपना स्वभाव रखें कि हरेकको सुख हो जाय।
सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया:।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:खभाग् भवेत्॥
सब-के-सब सुखी हो जायँ, कोई दु:खी न रहे, सब-के-सब नीरोग हो जायँ, किसीके रोग, आफत न रहे, सबके मङ्गल-ही-मङ्गल हो, शुभ-ही-शुभ काम हो। कोई भी, कभी, किसी अवस्थामें दु:ख न पावे। ऐसा अपना स्वभाव बना ले, ऐसा ध्येय बना ले, लक्ष्य बना ले। तब मनुष्य-जन्म सफल होगा। अपनी मनमानी त्याग करनेमें वही सफल होता है जो दूसरेके मनकी बात करता है। औरोंकी न्याययुक्त इच्छा पूरी करनेसे अपनी इच्छाके त्यागनेका बल आ जाता है। अपने मनकी बात त्यागनेकी योग्यता आ जाती है। अपने मनमानी करते रहो तो अपने मनमानी करनेका ही बल बढ़ेगा। वह स्वभाव तो अगाड़ी नरकोंमें डालेगा भाई!
जितने संसारमें दु:खी हैं, जितने कैदमें पड़े हैं, जितने नरकोंमें जीव हैं, जितने रो रहे हैं, चिल्ला रहे हैं, जहाँ कहीं दु:ख पा रहे हैं तो कुछ-न-कुछ उनके भीतरकी चाहना है, इच्छा है कि यूँ नहीं होना चाहिये। ऐसी कामनावाले ही दु:ख पाते हैं। भीतरसे जिनके ऐसी कामना नहीं है, उनको दु:ख हो ही नहीं सकता। बुखार आ जाय, तकलीफ हो जाय, पर उनको दु:ख नहीं होता। दु:ख है मनका। अपने मनमानी नहीं होनेसे दु:ख होता है। बुखारमें क्या होता है? बुखार आदि प्रतिकूल परिस्थितिसे दर्द होता है, दु:ख नहीं।
दर्द और दु:ख अलग-अलग चीज है। ‘खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी॥’ (मानस ७। ३९।३) जिसका हृदय दुष्ट (दोषी) होता है, उसके ताप विशेष होता है। उसके जलन ज्यादा होती है; क्योंकि दूसरेकी सम्पत्ति देखकर जल उठते हैं। उसके इतना धन क्यों हो गया? उसके बेटा-पोता इतना क्यों हो गया? उसका कहना क्यों मानते हैं लोग? परिवारवाले भी उसके अनुकूल क्यों चलते हैं? ऐसे करके जलने लग जाय। उसका दु:ख कैसे मिटे? बताओ, यह प्रारब्धका दु:ख नहीं है। यह दुष्टताका दु:ख है। स्वभावसे दु:ख होता है, परिस्थितिसे दु:ख होता है, अपने सुख चाहते हैं और सुख न मिलनेसे दु:ख होता है। परिस्थिति अनुकूल न होनेसे जो दु:ख होता है, वह तो मूर्खताका है; परंतु दूसरेकी उन्नति देखकर दु:ख होता है, यह दुष्टताके कारणसे होता है।
सुख पहुँचानेका भाव
हृदयमें आनन्द होना चाहिये, हृदयमें मस्ती होनी चाहिये कि अच्छी बात है इतने घर तो सुखी हुए। इतनी हमारी माताएँ-बहनें सुखी हैं, बड़ा आराम है। कितने आनन्दकी बात है। दूसरे भी सब सुखी हो जायँ—ऐसी भावना रखो दूसरे तो सुखी होंगे कि नहीं होंगे, पता नहीं; परंतु आप सुखी हो जायँगे, इसमें सन्देह नहीं है। आपका ऐसा भाव होनेसे आपका कल्याण हो जायगा। जो सबका हित चाहता है, उसका हित स्वत: होता है, स्वाभाविक हित होता है। मनुष्योंके हृदयमें उसके लिये स्थान हो जाता है। जो सबका हित चाहता है, कल्याण चाहता है, उद्धार चाहता है, सबकी वास्तविक उन्नति चाहता है। जो दूसरे आदमी हैं, वे बिना कहे-सुने उसका हित करते हैं। उनके हृदयमें उसके प्रति सद्भाव पैदा हो जाते हैं स्वाभाविक ही और जो दुष्ट है, दूसरोंको दु:ख देना चाहता है तो उसके प्रति दूसरोंके भी दुर्भाव पैदा हो जाते हैं। यह मनुष्यको दिखता नहीं, इस वास्ते मानता नहीं; परंतु आप जैसे बीज बोओगे, वैसी खेती पैदा होगी। आप दूसरोंके दु:खके लिये भावना रखते हैं तो दूसरोंको तो दु:ख होगा, उनके प्रारब्धका दु:ख आ जाय तब, आपकी चाहनासे दु:ख नहीं होगा; परंतु आपके लिये तो दु:खका बीज बोया ही गया, इसमें संदेह नहीं है। अपनेको जो दु:ख दे, उसके लिये भी सुखकी इच्छा करनी चाहिये।
‘उमा संत कइ इहइ बड़ाई।
मंद करत जो करइ भलाई॥’
(मानस ५। ४१। ७)
विभीषणने रावणको कहा—‘हनुमान्जी दूत बनकर आये हैं इनको दु:ख नहीं देना चाहिये। इनको आराम देना चाहिये। नीतिकी बात करनी चाहिये।’ रावण मारने लगा तो विभीषणने कहा—तो यह बात उस समय तो मान ली। फिर जब काम पड़ा, फौज आ गयी है, जाना है तो उस समय विभीषणसे कहता है—‘मम पुर बसि तपसिन्ह पर प्रीती।’ रहता तो है मेरे शहरमें और प्रीति करता है तपस्वीके साथ। तो उसके साथ जाओ। ‘सठ मिलु जाइ तिन्हहि कहु नीती॥’ (मानस ५। ४१। ५)उसे नीति सिखाना। एक बार हनुमान्जीके लिये तेरी नीति मानी तो घर जल गया, सारा गाँव जल गया। तेरी नीति उनको ही दे, जिससे उनका ही नाश हो जाय। हम नहीं मानेंगे तेरी बात। विभीषणको जोरसे लात मारी।‘अनुज गहे पद बारहिं बारा।’ (मानस ५। ४१। ६) विभीषण रावणके चरण पकड़ते हैं और कहते हैं—‘आप बड़े भाई, पिताके समान हैं। बेशक आपने मुझे मारा—‘तुम्ह पितु सरिस भलेहिं मोहि मारा। रामु भजें हित नाथ तुम्हारा॥’ (मानस ५। ४१।८) तुम्हारा हित तो भगवान्के भजनसे है। ऐसा कहता ही रहा। रावणने धमकी दी। लातका प्रहार किया। बात अच्छी कहनेपर भी लातका प्रहार मिला तो वास्तवमें क्या नतीजा निकला? विभीषणका कहना तो ठीक निकला ही। रावणने काम तो अहित होने लायक ही किया, परंतु भगवान्के हाथसे मरनेसे उसका उद्धार हो गया। विभीषणने अहित नहीं किया। उसके हृदयमें यह भाव है कि आपका हित भगवान्के भजन करनेसे है। सीताको आप दे दो तो बड़ा अच्छा है, राड़ नहीं होगी, लड़ाई नहीं होगी, आपका काम ठीक बैठ जायगा; परंतु जिनके विपरीत बुद्धि होती है न, उनके विपरीत बात जँचती है। ‘विनाशकाले विपरीतबुद्धि:।’ ठीक बातको भी सही नहीं समझता; परन्तु संतोंका हृदय क्या होता है? यह बता दिया।‘मंद करत जो करइ भलाई।’ मन्दा करनेपर भी वे भलाई ही करते हैं अपनी तरफसे। वे सबका भला चाहते हैं। उनका भला स्वाभाविक होता है। वायुमण्डल बनता है। प्रकृतिमें शक्ति है, जिसका हृदय शुद्ध होगा और सबका भला चाहेगा तो प्रकृतिसे उसका भला होगा। यह प्रकृतिमें ताकत है, विलक्षणता है, स्वाभाविक ही हित होगा।
अपने द्वारा सबका हित हो, किसी तरह सबका कल्याण हो, दूसरोंको लाभ हो जाय, दूसरोंको सुख हो जाय, औरोंको आराम मिले—ऐसा भाव रहेगा तो सब-के-सब लोग सुखी हो जायँगे, ये हाथकी बात नहीं; क्योंकि परिस्थिति उनके कर्मोंके अनुसार आवेगी; परंतु आपने जो भावना की है, यह परिस्थिति नहीं है। यह आपका नया उद्योग है, नया कर्म है, नया भाव है। ऐसा आपका उद्देश्य है तो आपका कल्याण होगा। आपके लिये इसका भला-ही-भला नतीजा होगा; क्योंकि सम्पूर्णके हितमें आप रत हैं न। ‘ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रता:॥’ (गीता १२। ४) सबका हित कर देना, यह बात हाथकी नहीं है; परंतु बुरा किसीका भी नहीं चाहना चाहिये। सज्जनलोग कहते हैं भाई ! वैरीका भी अहित न हो। भगवान् राम लंकामें पहुँच गये, फिर विचार हुआ। सोचा तो कहा ‘पहले अंगदको भेजना चाहिये। उनको खबर कर देनी चाहिये पीछे देखो क्या होता है?’ अंगदको भेजा उस समय रामजीने कहा—‘काजु हमार तासु हित होई।’ काम तो हमारा बने और हित रावणका हो। ‘रिपु सन करेहु बतकही सोई॥’(मानस ६। १७। ८)जरा सोचो, कितनी विलक्षण बात है।
शुद्ध स्वभावकी आवश्यकता
हमारा काम बन जाय और उसका हित हो जाय। तो ‘काम’ बड़ा है कि ‘हित’ बड़ा है। कोई भाई हो, उसके प्लेगकी बीमारी लग जाय तो उस बीमारीसे बचते हुए उसकी सेवा करें। उसके साथ वैर नहीं। वह तो बीमार है बेचारा; परंतु बीमारीके साथ स्नेह नहीं। बीमारीको तो मिटाना चाहते हैं। ऐसे मनुष्यमात्र परमात्माके अंश हैं। मनुष्योंमें जो खराब स्वभाव आ जाते हैं, ये आगन्तुक हैं। ऊपरसे आये हुए हैं, इस वास्ते इन दोषोंको मिटाना है। इन बीमारियोंको दूर करना है न कि बीमारको ही मार देना है। दोषी आदमीके दोषोंको दूर करना है अपने तो। कैसे दोष दूर हो? इसका चिन्तन करो, इसका विचार करो, युक्ति सोचो, किस तरहसे इसका दोष दूर हो? उसके दोषको देखना दोषदृष्टि नहीं है। वह तो निर्दोष देखना चाहते हैं कि उसमें दोष यह न रहे। अपना पुत्र है, अपना शिष्य है, अपना नौकर है, अपना प्यारा मित्र है, उसमें कोई अवगुण आ जाय तो अवगुण दूर हो। जैसे रोगीका रोग दूर हो—ऐसा विचार होता है। ऐसा नहीं कि रोगी मर जाय। ऐसे ही किस तरहसे उनका अवगुण दूर हो, तो यह अवगुण दूर कैसे होता है? आपके हृदयमें सद्भावना हो और आदरसहित उनके साथ बर्ताव किया जाय तो अवगुण दूर होता है। उनका निरादर करोगे तो उनके मनमें भी निरादर पैदा हो जायगा। उसका असर अच्छा नहीं पड़ेगा। प्यारसे, स्नेहसे उनका हित करते हुए, सेवा करते हुए ऐसी शिक्षा दो, जिससे उनका दोष दूर हो जाय। दुष्टता ज्यादा होती है, तब वे मानते नहीं। सेवा करो, नम्रता करो तो भी वे समझते हैं कि गरज करता है। यह कायर आदमी है, ऐसा ही है यह तो। ऐसे दोषदृष्टि करेंगे। पहलेसे दोषदृष्टि करते हैं, फिर और दोषदृष्टि कर लेंगे और क्या होगा? परंतु अपनेको अपना स्वभाव शुद्ध, निर्मल बनाना है।
दो सज्जन थे। एकने कहा—‘आप मेरी परीक्षा कर लो, मेरेको क्रोध नहीं आता है। आप कुछ भी कर लो, मेरेको क्रोध नहीं आयेगा।’ दूसरे सज्जनने कहा—‘बड़ी अच्छी बात! काम, क्रोध, लोभ तुम्हारेपर आक्रमण न करे, क्रोध नहीं आवे तो बड़ी अच्छी बात है, पर तुम्हारी परीक्षाके लिये मैं मेरा स्वभाव क्यों बिगाड़ूँ बताओ? तेरेको क्रोध नहीं आवे तो बड़ी अच्छी बात, बड़े आनन्दकी बात है, खुशीकी बात है। अपना स्वभाव क्यों बिगाड़े भाई? स्वभाव चलेगा साथमें। ये चीजें, वस्तुएँ, घटनाएँ साथ नहीं रहेंगी। घटना घटती है और मिट जाती है; परंतु जैसा स्वभाव बना लिया वह तो साथमें चलेगा। चोरी करनेका जो स्वभाव बना है, यह जहाँ जाओगे, वहीं तंग करेगा। दूसरोंको दु:ख देनेका स्वभाव है तो जहाँ जाओगे, वहाँ भी तंग करेगा।
जिसका स्वभाव शुद्ध हो गया। किसी कारण उसे नीच योनिमें जन्म भी लेना पड़ेगा तो वहाँ वह सुख पायेगा। अगर खाने-पीनेमें चटोरपना पैदा कर लिया कि यह चाहिये, यह ठीक नहीं है। चटनी बढ़िया नहीं हुई, नीबू नहीं दिया। दो पत्ती डाल देते पोदीनाकी तो रंग खिल जाता। बढ़िया नहीं बनी। अब पोदीना डाल दिया। थोड़ा-सा नीबू निचोड़ देते तो क्या एक सुन्दर चटनी हो जाती। ऐसे चटोरपनेका स्वभाव बिगाड़ लिया। अब वह पशु हो जायगा तो उसे बढ़िया चरने नहीं देते। मैंने गाँवोंमें देखा है। ऐसी उस गायको, बैलको बढ़िया चारा नहीं देते। कहते हैं—‘आज बढ़िया चर लिया तो यह दो-तीन दिन चरेगा नहीं।’ उसके डण्डा पड़ते हैं, बढ़िया चारा चरने नहीं देते; क्योंकि स्वभाव बिगाड़ा हुआ है मनुष्य-जन्मका। तो अच्छा चारा मिलता ही नहीं। कुछ ऐसा बैल होता है कि भूख लगे तो बढ़िया दे दो, चाहे घटिया दे दो, पेट भर लेता है तो वह बढ़िया चारा चर भी ले तो कोई बात नहीं, अब बाँध दो। चारा चर लिया तो चर लिया। यह भूखा नहीं मरेगा। जिसके चटोरपना ज्यादा है तो मालिकको उसकी निगाह रखनी पड़ती है कि उसको बढ़िया चारा नहीं मिल जाय कहीं। स्वभाव बिगड़नेसे आड़ ही लगी। फायदा क्या हुआ?
शुद्ध स्वभाववालेका आदर
ऐसे स्वभाव खराब हैं तो महाराज सब घरवाले खराब मानते हैं। बहनों-माताओंमें जिनका स्वभाव खराब होता है, उनको पीहरमें बुलाते हैं तो भाई और भौजाई सब सतर्क हो जाते हैं। बाई सा आ गयी है। चीज-वस्तु सँभालकर रखो ठीक तरहसे, तालेमें रखो। यह देख लेगी, माँगेगी तो देंगे तो चीज खराब हो जायगी। नहीं देंगे तो मन खराब हो जायगा। तो यह देखे ही नहीं, बस! ‘न देखे न कुत्तो भूसे’ इसे पता ही न लगे। बेचारे घरके आदमी ऐसे डरते हैं; क्योंकि स्वभाव बिगड़ा हुआ है। स्वभाव सुधरा हुआ है तो बाई आ गयी तो भाई कहता है कि बाई चाबी तू ही राख। घरमें सब काम तू ही देख। वे अपने निश्चिन्त हुए। बाई तो दोनों ही हैं फर्क नहीं है। एक माँ-बापके पैदा हुए बहन और भाई। पर एक होते हुए भी स्वभाव जिसका शुद्ध है, उसको सब चाहते हैं। विधवा हो जाय तो देवर-जेठ आदि चाहते रहते हैं और यहाँ भाईलोग चाहते हैं। देवर आदि लेनेके लिये आते हैं—‘बहुत जरूरी है, बालक होनेवाला है, हम तो भौजाईको लेनेके लिये आ गये।’ भाई कहते हैं—‘नहीं सा, अब भेजेंगे नहीं।’ क्यों? ‘हमारे तो यह माँकी जगह है। जैसे माँसे सलाह लेते थे, ऐसे बाईसे सलाह लेते हैं—सब काम करनेमें। कैसे भेज दें? हमारे माँकी जगह है।’ अब बताओ शुद्ध स्वभाव होनेसे भाइयोंके भीतर कितना आदर है? कितना भाव है? उधर ससुरालवाले भी चाहते हैं। वे भी चाहते रहते हैं। जिसका स्वभाव खराब होता है तो माँ कह देती है, ‘बेटा! इन बाईने अपने घर पहुँचा दे। बड़ो टाबर आपरे घर ही आछो।’ कारण क्या? लखण बोदा तो कुण चावे? (स्वभाव खराब है तो कौन चाहे?)
हम और काम करनेमें स्वतन्त्र नहीं हैं। धन कमानेमें स्वतन्त्र नहीं हैं। मेहनत करके धन कमा ही लें, यह हाथकी बात नहीं; परंतु स्वभाव सुधारनेमें आप स्वतन्त्र हो। आप अगर चाहें तो स्वभावको शुद्ध बना सकते हैं। स्वभाव बिगड़ा हुआ होता है तो सब दुनियाको दु:ख होता है। कष्ट होता है—
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
(मानस ७। ४१। १)
अपना स्वभाव शुद्ध होता है तो सबको सुख होता है। स्वभाव बिगड़ा हुआ होता है तो सबको दु:ख होता है। देवकिशनजी भोजक थे, वे कहते थे कि मैं चूरूमें स्टेशन-मास्टर था तो वहाँ एक दिन ‘मंगलदास डाकू’ आ गया। वह पोइंटवानका मित्र था तो उससे मिलने आ गया। वह आकर भीतर बैठ गया कुर्सीपर। वे कह रहे थे कि मैं पासमें ही बैठा था। किसीने कह दिया ‘यह मंगलदास है।’ इतना कहते ही बैठे-बैठे मेरा कुर्ता भीग गया पसीनेसे। यहाँ कुछ चोरी कर लेगा, कुछ ले जायगा तो क्या दशा होगी मेरी? ऐसे विचार करते-करते पसीना आ गया बैठे-बैठे। मौन ही था वह, पर स्वभाव बिगड़ा होनेके कारण परिचय होते ही भयसे पसीना आ गया और कोई सन्त आ जाय, महात्मा आ जाय तो गाँवमें एक आनन्द खिल जाय। महाराज पधार गये तो गाँवमें आनन्द-उत्सव होने लगता है। मनुष्य वे ही हैं, फिर फरक क्या है? एकका स्वभाव सुधरा हुआ है एकका स्वभाव बिगड़ा हुआ है। बिगड़े हुए स्वभावसे लोगोंको दु:ख होता है, भय होता है। दु:ख देना पाप है। पहले स्वभाव आप बिगाड़ा, पाप किया, फिर पाप करते जाते हैं। स्वाभाविक ही पाप होते चले जाते हैं। औरोंको कष्ट होता ही चला जाता है। स्वभाव अपना शुद्ध निर्मल बना ले तो कहीं रह जाओ, लोग कहते हैं कि यह तो ऐसा अच्छा है ‘आँखमें घाल्यां ही खटके कोनी।’ इतना निर्मल है। कैसी विचित्र बात है।
स्वभाव शुद्ध बनानेमें हरेक भाई-बहिन स्वतन्त्र हैं। धन कमानेमें परतन्त्र हैं, उसमें तो रात-दिन लगे हैं। स्वभाव शुद्ध बनानेके लिये परवाह ही नहीं करते। स्वभावको शुद्ध बना लिया तो जहाँ जाओ, वहाँ आनन्द-ही-आनन्द रहेगा। मौज-ही-मौज रहेगी। खुशी ही रहेगी। जिनका स्वभाव शुद्ध हो गया है, निर्मल हो गया है, उनको देखनेसे दुनिया सब-की-सब प्रसन्न होती है। दुनियाको बड़ा आनन्द मिलता है। जिन लोगोंने अपने स्वभावमें भगवान्को बसा लिया, भगवान्का भजन करते हैं, मात्र प्राणियोंके हितकी इच्छा करते हैं, उनकी तन, मन, वचनसे जो कुछ चेष्टा होती है, सबके हितके लिये होती है। उन पुरुषोंके दर्शन करनेसे शान्ति मिलती है। संकट मिट जाते हैं, दु:ख मिट जाते हैं, विघ्न टल जाते हैं। कारण क्या है? वह शुद्ध है, निर्मल है, पवित्र है। वह निर्मलता, श्रेष्ठता हरेक भाई प्राप्त कर सकते हैं।
पढ़े-लिखे हों, अपढ़ हों, गाँवके हों, शहरके हों, कैसी भी योग्यता क्यों न हो? अपना स्वभाव शुद्ध बनानेमें सब स्वतन्त्र हैं। धन पैदा करनेमें सब परतन्त्र; क्योंकि धन तो पैदा तब होगा, जब किसीकी तिजोरी खुलेगी। ऐसा हुनर करेंगे, जिससे दूसरेकी तिजोरी खुल जाय, तब पैसा मिलेगा। स्वभाव किसीकी तिजोरीमें बन्द थोड़ा ही है। पैसा तो तिजोरीमें बन्द रहता है, ताला लगा रहता है। शुद्ध स्वभावके कोई ताला लगा है क्या? यह तो हर एक कोई ले लो। सबके लिये खुली है एकदम ही। शुद्ध स्वभाव बना लेना, कितनी बढ़िया बात? ऐसी स्वतन्त्रता हमलोगोंको भगवान्ने कृपा करके दी है। अब ऐसी कृपा करो, अपना स्वभाव शुद्ध बनाओ।
स्वभाव शुद्ध करनेका उपाय
स्वभाव शुद्ध कैसे बनावें? इसके लिये क्या उपाय है? उपाय एक ही बताया न, अपना अभिमान छोड़ो। अभिमान चुभता है। वह दूसरोंको खटकता है बुरा लगता है। सच्ची बातका अभिमान भी खटकता है और बुरा लगता है। अभिमान तो खटकता है ही। इसमें कहना ही क्या है? आप सच्चे हृदयसे किसीको मानते हैं कि ये पढ़े-लिखे हैं, अच्छे विद्वान् हैं, ऐसा आप हृदयसे मानते हैं, पर वह कहे कि ‘क्या देखते हो? तुमने इतनी पुस्तकें देखी नहीं, जितनी हमने पढ़ी हैं। क्या समझते हो तुम?’ यह बात आपको बुरी लगेगी। सच्ची बात है तो भी बुरी लगती है; क्योंकि उसके भीतरमें अभिमान बस गया है न। हमने ऐसा-ऐसा पढ़ा है, हम इतने विद्वान् हैं। अभिमान खटकता है। क्यों खटकता है? परमात्माके अंश हैं। सभी भाई बराबर हैं, किसीने गुण उपार्जन अधिक कर लिया तो अधिक हो गया। किसीमें वह गुण नहीं है तो कम रह गया। पर कम रहनेसे क्या हुआ? क्या वह परमात्माका प्यारा नहीं है? क्या परमात्माका अंश नहीं है? वहाँ तो बराबर ही है।
समाजमें कोई धनी हो गया। कोई गरीब हो गया। धनी और गरीब तो अलग-अलग हो गये पर रोटी-बेटीका जहाँ बर्ताव होगा तो हम भाई हैं, इसमें बड़ा-छोटा क्या है? सब एक समान ही हैं। धन किसीके ज्यादा हो गया। किसीके कम हो गया। इसी तरहसे आपकी योग्यता कम-ज्यादा हो गयी, पर परमात्माके लिये तो बराबर हो। अभिमान आप करते हो तो दूसरेको बुरा लगता है; क्योंकि वह तुम्हारेसे कम थोड़ा ही है। अभी कम हो गया है, पर वास्तवमें तो कम है नहीं। उसको दु:ख होगा बेचारेको! आप अभिमान रखते हो, उस अभिमानसे अपना पतन होता है और दूसरोंको दु:ख होता है। अभिमान दूर करो तो यह स्वभाव सुधर जाय और स्वार्थकी भावना दूर करो तो स्वभाव सुधर जाय। ये दोनों स्वभाव बिगाड़नेवाले हैं। एक तो हमारी बात रहे और एक हमारा मतलब सिद्ध कर लें। हरेक बातमें यह घात रहे, किसी तरहसे मतलब सिद्ध हो जाय। मेरेको धन मिल जाय, मान मिल जाय, मेरेको आदर मिल जाय। मेरेको आराम मिल जाय, यह भाव रहता है न, इससे स्वभाव बिगड़ता है। तो अभिमानसे, अहंकारसे, स्वार्थ-बुद्धिसे स्वभाव बिगड़ता है! दोनों जगह निरभिमान हो करके—
सरल सुभाव न मन कुटिलाई।
जथा लाभ संतोष सदाई॥
(मानस ७। ४६। २)
कपट गाँठ मनमें नहीं सब सों सरल सुभाव।
नारायण वा भगत की लगी किनारे नाव॥
कोई कपट करे तो उसके साथ भी कपट नहीं। ‘मंद करत जो करइ भलाई’ ऐसा स्वभाव है। उसको याद करनेसे शान्ति मिलती है। ऐसी सरलता धारण करनेमें क्या जोर आता है, बताओ? कुटिलता करनेमें आपको जोर आयेगा। कुछ-न-कुछ मनमें कपट-गाँठ गूँथनी पड़ेगी न। सीधे सरल स्वभावमें है, जैसी बात कह दी। झूठ-कपट करोगे तो महाराज कई बातें खयालमें रखनी पड़ेंगी, फिर कहीं-न-कहीं चूक जाओगे। कहीं-न-कहीं भूल जाओगे। सच्ची बात है। सरलता है तो सब जगह मौज-ही-मौज है। अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग कर दूसरेके हितकी सोचो। कैसे हित हो? क्या करूँ? कैसे करूँ? दूसरोंका हित कैसे हो? दूसरोंका कल्याण कैसे हो? दूसरोंको सुख कैसे मिले? ऐसे सोचते रहो। आपके पास धन न हो तो परवाह नहीं, विद्या नहीं हो तो परवाह नहीं, कोई योग्यता नहीं, कोई पद नहीं, कोई अधिकार नहीं हो तो कोई परवाह नहीं। ऐसा न होते हुए भी आपका भाव होगा दूसरोंके हित करनेका तो स्वभाव शुद्ध होता चला जायगा। जहाँ झूठ, कपट, अभिमान, अपनी हेकड़ी रखनेका स्वभाव होगा, वहाँ स्वभाव बिगड़ता चला जायगा। वह बिगड़ा हुआ स्वभाव पशु-पक्षी आदि शरीरोंमें भी तंग करेगा। वहाँ भी आपको सुखसे नहीं रहने देगा। अच्छे स्वभाववाला पशु-योनिमें भी सुख पायेगा। मनुष्य भी श्रेष्ठ हो जायगा।
स्वभाव सुधारनेका मौका यहाँ ही है। जैसे बाजार होता है तो रुपयोंसे चीज मिल जाती है। बाजार न हो तथा जंगलमें रुपये पासमें हों तो क्या चीज मिलेगी? यह बाजार तो यहाँ ही है अभी लगा हुआ। इस बाजारमें आप अपना शुद्ध स्वभाव बना लो, निर्मल बना लो। यहाँ सब तरहकी सामग्री मिलती है। मनुष्यशरीरसे चल दिये तो फिर हो जैसे ही रहोगे। फिर बढ़िया तो नहीं होगा, घटिया तो हो सकता है, वहाँ भी स्वभाव खराब हो सकता है; परंतु वहाँ उसको बढ़िया बात मिलनी बड़ी कठिन है। कुछ बढ़िया मिलेगी भी तो सांसारिक बातें मिलेंगी, पारमार्थिक नहीं। वहाँ स्वभावका सुधार नहीं हो सकता है। बढ़िया शिक्षक मिल जायगा तो वह शिक्षित हो जायगा, मर्यादामें चलेगा और नहीं तो ऐब पड़ जायगी तो उम्रभर दु:ख पायेगा।
पशुके बचपनमें ही ऐब (आदत खराब) हो जाती है न। तो वह दु:ख देनेवाला, मारनेवाला बन जाता है। छोरे उसे हाथ लगाते हैं, चिढ़ाते हैं, तब ऐसा करके वह मारना सीख जाता है। फिर बड़ा होनेपर मारता है सबको ही। अब सिखा दिया बच्चोंने पहले। बुरा स्वभाव बन जायगा वहाँ भी। अत: बुराई तो वहाँ भी मिल जायगी। कौन-सी बाकी रहेगी? भलाईका मौका तो यहाँ ही है। यहाँ भी हर समय नहीं। अच्छा सत्संग मिलता है, विचार मिलता है, सत्-शास्त्र मिलता है, इन बातोंसे हमें अच्छाई सीखनी चाहिये। मौका खोना नहीं चाहिये। बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥ (मानस ७। ४३। ७) देवताओंके लिये दुर्लभ है। ऐसा मानव-शरीर मिला। जिसमें अपना स्वभाव शुद्ध बना लें; निर्मल बना लें। फिर महाराज! मौज-ही-मौज। यह पूँजी सदा साथमें रहनेवाली है; क्योंकि जहाँ कहीं जाओगे तो स्वभाव तो साथमें रहेगा ही। बिगड़ा हुआ होगा तो बिगड़ा हुआ ही साथ रहेगा। जहाँ कहीं जाओ तो स्वभावको निर्मल बनाओ। अहंकार तथा अपने स्वार्थका त्याग करके दूसरेका हित कैसे हो? दूसरेका कल्याण कैसे हो? दूसरेको सुख कैसे मिले? अपने तनसे, मनसे, वचनसे, विद्यासे, बुद्धिसे, योग्यतासे, अधिकारसे, पदसे किसी तरह ही दूसरोंको सुख कैसे हो? दूसरोंका कल्याण कैसे हो? ऐसा भाव रहेगा तो आप ऐसे निर्मल हो जायँगे कि आपके दर्शनोंसे भी दूसरे लोग निर्मल हो जायँगे।
तन कर मन कर वचन कर देत न काहू दु:ख।
तुलसी पातक झड़त है देखत उसके मुख॥
उसका मुख देखनेसे पाप दूर होते हैं। आप भाई-बहिन सब बन सकते हो वैसे। अब मीराबाईने हमारेको क्या दे दिया? परंतु उनके पद सुनते हैं, याद करते हैं तो चित्तमें प्रसन्नता होती है। पद गावें तो भगवान्के चरणोंमें प्रेम होता है। उनके भीतर प्रेम भरा था, सद्भाव भरा था, इस वास्ते मीराबाई अच्छी लगती है। एक दिन भी उनकी भिक्षा नहीं की। फिर भी मीराबाई अच्छी लगे, उनकी बात भी अच्छी लगे, उनके पद अच्छे लगें क्योंकि उनका अन्त:करण शुद्ध था, निर्मल था। नहीं तो मीराबाईकी सास थी, पूजनीया थी वह मीराबाईके। पर उसका नाम ही नहीं जानता कोई। मीराबाई विदेशोंतक सब जगह प्रसिद्ध हो गयी, भगवान्की भक्ति होनेसे, नाम चाहनेसे नहीं।
नाम नाम बिन ना रहे, सुनो सयाने लोय।
मीरा सुत जायो नहीं शिष्य न मुंडयो कोय॥
न मीराबाईके बेटा हुआ। न मीराबाईने चेला बनाया। पर नाम उसका सब जगह आता है। साधुओंमें यह होती है कि हमारे चेला हो जाय तो हमारा नाम रह जाय। गृहस्थ कहते हैं, हमारे छोरा हो जाय तो हमारा नाम हो जाय। छोरा सबके हुआ, पर नाम हुआ ही नहीं। तीन-चार पीढ़ीके पहलेवालोंको आज घरवाले ही नहीं जानते, दूसरे क्या जानेंगे? भगवान्का भजन करो तो महाराज! कितनी विचित्र बात है? नाम रहे-न-रहे। आपका कल्याण हो जायगा। दुनियाका बड़ा भारी हित होगा। इस वास्ते अपने स्वभावको शुद्ध बना लें। शुद्ध कैसे बने? अपनी हेकड़ी छोड़ें। अपना अभिमान छोड़ दें। दूसरोंका आदर करें, दूसरोंका हित करें। जहाँ न्याययुक्त बात हो तो दूसरोंकी बात मानें। दो बात सामने आ जाय तो हमारी नहीं उनकी सही। उनकी न्याययुक्त बात है, बढ़िया बात है तो अपनी बात छोड़कर उनकी बात मानें। दोनों बढ़िया होनेपर भी उनकी बातका आदर करनेसे अपने स्वभावका सुधार होता है।
(दिनाङ्क ११ अगस्त, १९८१)