प्रवचन—५
मनुष्य-जीवनकी सार्थकता
मनुष्य-शरीरका समय बहुत मूल्यवान् है। भाइयों और बहनोंने रुपये-पैसोंको मूल्यवान् समझा है। चीज-वस्तु, आदर, प्रतिष्ठा, मान, सत्कार और आराम इनको महत्त्व देते हैं कि ये हमें मिल जायँ; परंतु इन सबसे विशेष मूल्यवान् है अपने जीवनका समय। समयके समान कोई मूल्यवान् वस्तु नहीं है; क्योंकि समय देकर हम मूर्खसे विद्वान् बन सकते हैं। समय लगानेसे पढ़ाई करके विद्वान् बन जायँ, समय लगानेसे धनवान् बन जायँ, समय लगानेसे बड़े यशस्वी बन जायँ, संसारमें कीर्ति हो जाय, समय पाकर हम बहुत बड़े परिवारवाले हो जाते हैं। समय लगाकर बड़े भारी मकान बना लें, बहुत-से काम कर सकते हैं। समयके बदले बहुत चीजें ले सकते हैं। संसारकी अच्छी-अच्छी चीजें ले लें। संसारका ही नहीं, धर्मका अनुष्ठान कर लें। स्वर्ग प्राप्त कर लें, स्वर्ग ही नहीं, परमात्माकी प्राप्ति कर सकते हैं, तत्त्व-ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, जीवन्मुक्त हो सकते हैं। सदाके लिये महान् आनन्दकी प्राप्ति और दु:खोंका आत्यन्तिक नाश हो सकता है। इस मानव-जीवनके समयके सदुपयोगसे हम सब कुछ प्राप्त कर सकते हैं। सब तरहकी उन्नति हम समय लगाकर कर सकते हैं। समय लगाकर सम्पूर्ण चीजोंको इकट्ठी कर ली जाय तो भी इनके बदलेमें समय नहीं मिलता। ६०-७० वर्षका आदमी मरता है। वह लखपति, करोड़पति बन गया, धन-सम्पत्ति, जमीन, परिवार, बहुत-से मकान उसके हैं। वह कहता है साठ वर्षोंमें की हुई सभी वस्तुएँ मैं देता हूँ, उसके बदलेमें साठ महीने मिल जायँ मेरेको और जीनेके लिये। तो साठ वर्षोंकी कमाई देनेपर भी साठ महीनेका जीवन मिल सकता है क्या? साठ न सही साठ दिन मिल जायँ। नहीं मिलेंगे।
काम क्या आयेगी कमाई? तीन कौड़ी नहीं बँटेगी, जिस समय मौत आ जायगी कुछ कौड़ी नहीं बँटेगी। चिन्ता और अधिक लग जायगी। कहाँ-कहाँ पड़ा है? कितना धन है?
आना आना जोड़कर करोड़ तहखाना भरे,।
खाना न खिलाना यह ताके मन माना है॥
दाना लोग दान देन कहे तो दीवानो कहे,।
प्रभुजी का बाना देख लेत खल काना है॥
जर जमीन जोरु अरु जायदाद जेती चीज,।
एक दिन जाना जाको नहीं जाना है॥
आखिर विराना ताकु सालग पिछाना नाहीं,।
ऐसे जग वंचक का ठौर न ठिकाना है॥
धन कमा-कमाकर इकट्ठा कर लिया खजाना; परंतु साथमें क्या चलेगा? यह सोचते नहीं हो। धन तो यहाँ इकट्ठा कर रहे हो। धनके लिये झूठ, कपट, बेईमानी, जालसाजी, विश्वासघात, धोखा आदि दे-देकर पाप इकट्ठे किये हैं, वे इकट्ठे होते हैं भीतर अन्त:करणमें। वे पाप आपकी खराब नीयत बनानेमें, महान् नीच बनानेमें बड़े भारी सहायक हैं। ऐसे पाप करके धन कमाया यहाँ रहनेवाला। मरते समयमें यह धन तो कौड़ी एक साथ चलेगा नहीं, पाप कौड़ी एक पीछे रहेगा नहीं। यह हरेक आदमीको सोचना है कि हम कर क्या रहे हैं, इतना समय हमने लगाया है तो क्या लाभ किया? पचास, साठ, सत्तर वर्ष आ गये, इतने वर्ष तो गये, पर इतने वर्षोंमें हिसाब पूछनेवाला हो कि तुमने साथ चलनेकी पूँजी कितनी इकट्ठी की है। पूँजी साथ चलनेकी बढ़िया ली है कि घटिया। दूसरोंको सुख पहुँचानेकी नीयत रखी है कि स्वार्थ करनेकी। अपकार करके धन अपने इकट्ठा करना, स्वार्थ ही कर लेना, इसमें समय लगाकर नीयत अपनी खराब-ही-खराब बनायी है क्या? वही बनायी है तो किसके काम आवेगी? यह जरा सोचो।
वर्तमान पतनका कारण
ऐसा विचार करनेका मौका मनुष्य-शरीरमें ही है। गाय, भैंस, कुत्ता, गधा आदि नहीं सोच सकते। और दूसरी योनिमें सोचनेकी ताकत नहीं है, बुद्धि नहीं है, विवेक नहीं है, जो भगवान्ने इस मनुष्य-शरीरमें दिया है। अब भोग भोगना, संग्रह करना, रुपये इकट्ठे करना, इस प्रकार करते-करते फूँक निकल जायगी, राम-नाम सत् बोल जायगी। खराब नीयत रह जायगी, यह दुर्दशा होगी। सज्जनो! हमें इस बातका दु:ख होता है। हमारे भाई संग्रह करनेमें लगे हैं। केवल संख्या बढ़ानेमें ही लगे हैं, केवल संख्या ही। इतना धन हो गया, दस हजार हो गया कि लाख हो गया, करोड़ हो गया। संख्या बढ़ानेमें रात-दिन लगे हैं। वह संख्या अभिमान बढ़ायेगी, केवल अभिमान। अभिमानरूपी बहेड़ेके वृक्षकी छायामें आसुरी सम्पत्तिरूपी कलियुग विराजमान रहता है। अभिमान बढ़ेगा कि हम धनवान् हैं। वह अभिमान आपको न सत्संग करने देगा, न भजन करने देगा, न धर्म करने देगा, न आध्यात्मिक उन्नति करने देगा, पतनकी तरफ लगायेगा।
अभी कोई धनी आदमी करोड़पति है वह सुन ले कि सत्संग बड़ा अच्छा होता है। किसीने प्रशंसा कर दी तो मन चलेगा भी तो पूछेगा कि वहाँ कौन-कौन आते हैं? अमुक-अमुक सेठ आते हैं क्या? वे तो नहीं आते, साधारण आदमी आते हैं—ऐसा सुनेगा, तो मन चलनेपर भी जा नहीं सकेगा। वहाँ बेइज्जती कैसे करवावे? साधारण आदमियोंमें बैठ करके। हमारी इज्जतका तो कोई आता ही नहीं आदमी। वहाँ जाकर हम बैठ जायँ। अपनी बेइज्जती करवावें। वहाँ न कोई बैठनेका ठिकाना है। हम कैसे जावें? अब दो-चार आदमियोंका भी अगर मन करे तो उनमेंसे पहले कौन जाय? कौन नाक कटावे पहले, इसके बाद दूसरा भी कोई हिम्मत करे तो ऐसी आफत हो गयी। धन होनेसे हुई न? मान हुआ, धन हुआ, पद मिल गया, अधिकार मिल गया, ऊँचे बन गये तो आफत और कर ली। ऊँचे बननेमें समय लगाया है, मेहनत की है, बुद्धि लगायी है। सिफारिश बहुतोंकी ली है तब जाकर ऊँचे बने और अब आफत हो गयी। भजन, ध्यान, सत्संग करना, अपनी आत्माका उद्धार करना, कठिन कर लिया। इस तरहके समझदार कहलाते हैं।
कितना काम कर लिया, साधारण आदमी था, इसके बाप तो मामूली थे, यह लखपति, करोड़पति बन गया, बड़ा भारी काम किया है। बड़ा भारी काम नरकोंमें जानेके लिये किया है। साङ्गोपाङ्ग दु:ख पानेके लिये; जो दु:ख कभी मिटे नहीं सदा दु:खकी परम्परा ही भोगते रहें। ऐसा काम किया तो क्या यही बुद्धिमानी है। मनुष्य-शरीर प्राप्त करके ऐसा ही करना बुद्धिमानी है क्या? एककी ही नहीं दूसरोंपर भी यही असर पड़े—हम भी धनी बनें। अरे भाई! करोगे क्या? किसके आगे रोएँ? कोई सुननेवाला नहीं। संस्थाएँ बनाते हैं, उनमें भी धन-संग्रह करते हैं। संस्थाओंके द्वारा उपकार कैसे किये जायँ, इसकी तरफ खयाल नहीं। बनाते तो हैं संस्था उपकारके लिये और लगी है भीतरमें धुन धन इकट्ठा करनेकी, अधिक धन संग्रह हो जाय, अधिक धन इकट्ठा हो जाय। धन अधिक हो जाय जिसके पास वही बड़ा है। आज माप-तौल यह हो गया कि धन जिसके पास ज्यादा हुआ वही बड़ा हुआ। सज्जनो! धनसे बड़ा नहीं होता है। बड़ा वह है जिसके मरनेके बाद भी बड़प्पन रहे, ऊँचा बना रहे। जो नरकोंमें जावे, चौरासी लाख योनिमें सूकर-कूकर योनिमें जावे, वह बड़ा क्या हुआ? महान् पतन कर लिया न; परन्तु अब कहे कौन? सिखावे कौन? हमारे सन्तोंकी वाणीमें आता है—‘जगत भेष एकण मतो एकण दिश जावे।’ जगत् इधर जा रहा है, भेष (साधु) भी इधर जा रहे हैं, मकान बनाओ बड़ा-बड़ा और धन इकट्ठा कर लो। सब एक ही तरफ जा रहे हैं। सिखावे कौन? साधु-ब्राह्मण जिनको लोग अच्छी दृष्टिसे देखते हैं, अच्छे भी हैं, साधन-भजन करते भी हैं; परंतु उनके भी लगी है कि मान-बड़ाई कैसे हो जाय? धन कैसे हो जाय! बड़प्पन कैसे मिल जाय? ऊँचे हम कैसे बन जायँ। अरे, वास्तविक ऊँचे बनो, तत्त्वबोध प्राप्त कर लो, परमात्माकी भक्ति प्राप्त कर लो, सगुण-निर्गुण, साकार-निराकारकी बातें जो शास्त्रोंमें पढ़ी हैं, उनका साक्षात् करके अनुभव करो। इसके लिये यह ऊँचा पद है। इसकी प्राप्ति नहीं की तो क्या किया?
मनुष्य-जीवनकी सफलता—किसमें?
सन्तोंने कहा—‘एक राम बोलबो न सीख्यो तो सीख्यो गयो धूल में।’ और सब सीख लिया परंतु भजन-स्मरण नहीं सीखा तो धूलमें गया कुछ कामका नहीं। जैसे बिना जलका कुआँ खोदनेसे क्या लाभ? पचास-साठ फुट गहरा खोद लिया पर पानी तो है ही नहीं। तो क्या करें? इतनी तो कहीं दिवाल बनाते, मकान बनाते कोई छायामें बैठता। अब कुएँमें गाय, भैंस बाँधें कि सामान रखें या बैठे क्या करें? वह क्या काम आयेगा? पानी तो है ही नहीं उसमें। कुआँ बहुत गहरा है पर पानी नहीं है। ऐसे मानव-शरीर मिला मुक्ति नहीं की, भगवान्की प्राप्ति की नहीं। सगुणके दर्शन किये नहीं, निर्गुणका ज्ञान प्राप्त किया नहीं। तो क्या लाभ हुआ मानव-शरीर पाकर?
आपने उस तत्त्वका अनुभव किया है कि नहीं, ये केवल बातें करनेके लिये नहीं हैं। भगवान्की बातमें भी बड़ा लाभ है; परंतु केवल बात ही नहीं करनी है उसे प्राप्त करना है। प्रह्लाद भक्त हुए, ध्रुवजी महाराज हुए तो अच्छी बात है। तुमने कितनी भक्ति की है। काम तो खुदकी भक्ति आवेगी। भक्तोंके नाम लेनेसे भी पवित्रता होती है; परंतु जबतक करके नहीं देखें तो क्या हुआ भाई?
पर धन की बाताँ कियाँ, घर की भूख न जाय।
घर की भूख जब जाये, जो धन हाथ में आय॥
वह धनवान् है, वह करोड़पति है, राजा-महाराजा है, ऐसा है अच्छी बात। तुम्हारे तो उसका मुट्ठी चना भी काम आवेगा नहीं। उसके पास धन है तो पड़ा है, क्या फायदा? कोरी बातें करनेसे हमारे क्या लाभ? अपने कमाई करो। मिठाईकी बात करो कि ऐसा रसगुल्ला होता है, अमुक मिठाई ऐसी होती है, ऐसी होती है करते रहो क्या फायदा? अरे भाई! अपने भोजन बन जाय, भोजन पाकर तरान्तर हो जायँ तब ठीक है।
परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाय, कृतकृत्य हो जायँ, ज्ञात-ज्ञातव्य हो जायँ और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जायँ—तीन बात। मनुष्यमें तीन शक्ति है—जाननेकी, करनेकी और पानेकी। वह पानेके लिये कुछ करता है कि कुछ मिल जाय तो पानेकी शक्ति है; कुछ जाननेके लिये चेष्टा करता है तो जाननेकी शक्ति है और कुछ कर लें तो करनेकी शक्ति है। जानना कब समाप्त होता है जब जानने लायक बाकी न रहे ‘यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥’(गीता ७। २)जिस तत्त्वके जाननेके बाद जानना कुछ बाकी न रहे। वह जान लिया तो ज्ञानशक्तिका उपयोग हुआ। संसारकी बहुत-सी विद्या जान ली, बहुत-सी लिपि जान ली, तरह-तरहकी कला जान ली। बड़े-बड़े कलाकार कारीगर हो गये, पर पूछे कि मुक्ति हुई कि नहीं? अगर नहीं हुई तो जाननेसे क्या फायदा निकला? वह जानना क्या काम आयेगा? मुफ्तमें फँसावट होगी। फायदा क्या होगा? ईर्ष्या पैदा होगी। बड़ी-बड़ी जानकारी करके विद्वत्ता अनेक प्राप्त कर लें, विद्वत्तासे यश भी कर लें तो समझता है कि वाह-वाह हो गयी सा। ‘यश: शरीरे भव मे दयालो’ यश प्रापणीय वस्तु है; परन्तु यश प्राप्त करके किया क्या तुमने? तुम्हारे हाथ क्या लगा? थोड़ा आप सोचो,विचार करो। संस्कृत-साहित्यके कवियोंमें कालिदास प्रसिद्ध कवि हुए।
पुष्पेषु चम्पा नगरीषु लंका
नदीषु गङ्गा च नृपेषु राम:।
योषित्सु रम्भा पुरुषेषु विष्णु:
काव्येषु माघ: कविकालिदास:॥
कालिदासका नाम है तो वह कोई तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त था सो बात नहीं है, उसका अभी पीछा जन्म हो जाय और यहाँ अभ्यास करे, पूर्वके अभ्यासके कारण विद्वान् बन जाय और संस्कृतका विद्वान् बनकर संस्कृतमें कविता करने लगे। लोग भी कहें वाह! वाह! कविता बड़ी सुन्दर है। कोई कहता है—‘कविता तो कालिदासके समान है।’ कोई कहे—‘कालिदासके समान तो नहीं पर अच्छी है कविता।’ कालिदासकी पहले प्रसिद्धि हो गयी। उसके खटकती है कि कालिदास दुष्ट कौन हुआ? जो हमारे यशमें धब्बा लगा दिया। हमारी कविता कैसी बढ़िया? पर लोग कहते हैं कालिदासके समान नहीं है। कालिदास कौन है? याद तो है नहीं कि तू ही था पहले।
आप कमाया कामड़ा किणने दीजे दोष।
खोजेजी की पालड़ी कांढे लीनी खोस॥
आपका बनाया हुआ यश है अब आपके ही चुभता है, खटकता है। तो क्या निहाल करेगा? बताओ। उस यश-प्रतिष्ठाके लिये लोग मेहनत करते हैं, समय लगाते हैं, बुद्धि लगाते हैं।
अरे मनुष्य-शरीर प्राप्त किया है भाई! क्या मान-बड़ाईके लिये? वह भी चाहो तो भजनसे मिल जायगी सज्जनो! भगवान्की तरफ चलोगे तो यश, प्रतिष्ठा, मान, आदर सब चरणोंमें लोटेंगे। ऋद्धि और सिद्धि जाके आकर खड़ी है आगे। सब आपके सामने आ जायगी। गर्ज करेंगे वे। आज धनवान्की गर्ज धनवान् करते हैं, राजा-महाराजा करते हैं। वे नहीं करें तो क्या हुआ? भगवान् करते हैं खुद। भगवान्के दरबारमें उनका ऊँचा दर्जा है—
न वेत्ति यो यस्य गुणप्रकर्षं
स तं सदा निन्दति नात्र चित्रम्।
यथा किराती करिकुम्भजातां
मुक्तां परित्यज्य विभर्ति गुञ्जाम्॥
‘मैं तो हूँ भगतन को दास भगत मेरे मुकुटमणि।’
भगवान् जिसका आदर करे तो दुनियाका आदर क्या चीज है? दुनियाकी प्रशंसा, दुनियाका आदर कोई मूल्य रखता है क्या? आज गुण दीखे तो आज प्रशंसा कर दी, कल उसका कोई दोष हुआ तो निन्दा करना शुरू कर दिया। इनमें मान-बड़ाई करके भी क्या कर लिया? भैया! वह पद प्राप्त करो, जिसके पानेके बादमें करना बाकी न रहे। वह पद मिल जाय तो मिलना बाकी न रहे।
तीन शक्तियाँ—जानना, करना और पाना
मनुष्यमें तीन शक्तियाँ हैं। जाननेकी शक्ति है, करनेकी शक्ति है और कुछ हासिल करनेकी भी शक्ति है। जाननेकी शक्ति पूरी कब होगी? जब स्वयं अपनेको जानेगा तब जाननेका सदुपयोग हुआ। संसारको बहुत जान लिया। खुद तू कौन है इसका पता है ही नहीं। अमुक गाँवका अमुक नामका मैं हूँ। अरे! यह तो जन्मके बादका नाम, गाँव, जाति है; परंतु पहले तू कौन था असली? अभी कौन है? और मरनेके बाद कौन रहेगा? तेरा स्वरूप-तत्त्व वास्तवमें क्या है? इस बातको जाना ही नहीं और सब जान लिया। अरे, असली बात जाननेकी थी वह नहीं जाना तो क्या जाना?
जो अपने-आपको जान लेता है ठीक तरहसे, अपरोक्ष रीतिसे किंचिन्मात्र भी सन्देह न रहे, तो वह जीवन्मुक्त हो जाय। तब इसका जानना समाप्त होता है। अपने-आपको जाननेसे जानना पूरा होता है। इतना किया, यह किया पर यह तो नहीं किया। तो करना भी समाप्त हो जाता है तब मनुष्यका जन्म सफल है। करना समाप्त कब होता है? अपने लिये काम करेगा तो कभी करना समाप्त नहीं होगा। अनन्त जन्मोंतक करते जाओ कभी काम समाप्त नहीं होगा। बाकी-का-बाकी रहेगा। अपने स्वार्थका, अभिमानका त्याग करके दूसरेके हितके लिये किया जाय तो आप कृतकृत्य हो जायँगे। जब अपने लिये कुछ भी करना बाकी न रहे तो ‘यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते’(गीता ७। २)। ऐसे ‘बुद्धिमान् स्यात् कृतकृत्यश्च भारत’ वह कृतकृत्य हो जाता है। करना बाकी नहीं रहता। करने लायक सब काम कर लेता है। यह करना तभीतक बाकी रहता है, जबतक अपने लिये करता है। अपने लिये नहीं करता है तब उसका करना पूरा हो जाता है।
पापका फल—दु:ख-प्राप्ति
तो किया क्या? कुछ नहीं किया, बाकी क्या बचा आपके पासमें? मेहनत की और क्या किया है? लाभ ले लिया, इतना ले लिया पर किया कुछ नहीं। लाखों-करोड़ों रुपये मिल गये। आज मरता है तो क्या साथ चलता है?
अरब-खरब लों द्रव्य है, उदय अस्त लों राज।
तुलसी जो निज मरण है तो आवे केहि काज॥
अरब रुपया देंगे-सा पर अभी गला काट देंगे तो लेकर क्या करेंगे? जहाँ पड़ा है वहीं पड़ा रहेगा। उधर-से-इधर पड़ा रहा और क्या हुआ? तुम्हारे साथ क्या चला? कुछ नहीं। ऐसे क्या किया तुमने? बहुत काम किया। ये ऐसे बड़े जज हैं, बैरिस्टर हैं, वकील हैं। इतने रुपये लेते हैं रोजाना। रोजाना हजार रुपये कमाते हैं तो हजार कागज है, कागज। एक तुलीका काम। पहले जमानेके सिक्के हजार रुपयोंके साढ़े बारह सेर होते थे। एक दिनमें १२॥ सेर रुपये लाये तो महीनामें कितना लाये? बारह महीनेमें कितना लाये? इतना ढोकर इकट्ठा कर लिया। रात्रिमें हार्ट फेल हो जाय, मर जाय तो क्या किया? १२॥ सेर बोझा लाये रोजाना, इस कमरेसे उस कमरेमें लाकर रख दिया। एक गधा कितना ढोता है पत्थर एक दिनमें? उसका हिसाब करो। अरे, वह पत्थर जैसे ही ढोना है क्या? कैसी बात करते हो? वह तो पत्थर ढोता है, हम रुपये लाये हैं। इसके मरनेके बाद पत्थरमें, रुपयोंमें क्या फर्क है साहब? बताओ। पत्थर ढोया तो रुपया ढोया तो क्या फर्क पड़ा? आपके साथ सम्बन्ध है क्या? अब।
अच्छे-अच्छे धनी आदमी हुए हैं, आचरण अच्छे नहीं थे तो भूत-प्रेत-पिशाच बन गये, घरमें नहीं आ सकते। घरमें आने देते नहीं उसको। मन्त्रोंसे कीला कर अलग ही रखते हैं कि यहाँ न आ जाय कहीं। वह धनी आ करके आडा (दरवाजा) खटखटावे कि मैं आ गया हूँ पीछा। ‘थांरे थान मकान, थांरे थान मकान अठे नहीं अठे नहीं।’ आप अपने स्थानपर रहो यहाँ नहीं, यह दशा है। वह कहता है मैंने घर बनाया है, मेरा रुपया है। यह दशा होगी। इसमें समझता है कि हमने इतना काम कर लिया। क्या काम आया, बताओ? धन आदिके लिये जो पाप किये हैं वे पाप ऐसा नहीं कहेंगे कि थाँरे थान मकान। वह तो कहेंगे अठि आओ, चौरासी लाख योनिमें पधारो।
यहाँ किये हैं कर्म निशंक मानी,
वहाँ जाब कछु नहीं आयेगा जी।
जब पूछेंगे हिसाब हजूर वांही
तब लेखा दिया नहीं जायेगा जी॥
पता लगेगा कब उसका फल निकलेगा तब और यह भोगना पड़ेगा भाई। उससे बच नहीं सकते आप। आज चाहे दुनियाको धोखा दे दें, परंतु वहाँ धोखा नहीं होगा।
एक घटना हमने श्रीजयदयालजीके मुखसे सुनी। सेठजी श्रीजयदयालजी गीताप्रेसके संस्थापक, संचालक और संरक्षक थे, सब तरहसे उसको जन्म देनेवाले। वे चूरूके रहनेवाले थे। चूरूकी बात बताते थे कि जब हम आठ-दस वर्षके थे विश्वेश्वरलालजी खेमका जो अब नहीं हैं, मेरेसे मिले हुए हैं, मेरेसे बातें हुई हैं तो वे वृद्ध थे। एक लड़का महेश्वरियोंका बीमार हो गया ज्यादा। अधिक बीमार हो गया तो रात्रिमें कई लोग इकट्ठे हो गये। रात शायद ही निकाले मर जायगा, इस वास्ते बहुत-से लोग जग रहे थे। रात्रिमें बहुत ज्यादा बीमार हुआ, मरणासन्न हुआ तब उसका बाप रोने लग गया। यह बात बिलकुल बीती हुई है। बापको रोता देखकर बीमार पड़ा हुआ छोरा कहता है—अब रोनेसे क्या हो? काम करते समय सोचते तो आज यह दिन क्यों देखनेको मिलता? परन्तु उस समय तो सोचा नहीं अब रोनेसे क्या हो? वहाँ पासमें कई बैठे थे, बात क्या थी। उसने कहा कि यह इसी जन्मकी बात है, पुराने जन्मकी नहीं है। क्या बात है? तो कहने लगा कि देखो! पिताजीकी तरफ इशारा करके कहता है—अमुक संवत् में ये यहाँसे बम्बई गये थे; बीचमें एक स्टेशनपर मैं भी उतरा। दस हजार रुपये मेरे पासमें थे। बंगाली अपना नाम बताया, वहाँका मैं था ही तो हम साथ हो गये दोनों ही। हम उतरे तो भड़भुंजारीके यहाँपर हम दोनों रात्रिको ठहरे। रात्रिको रुपये मेरे पास थे। भुंजारीने और इसने मिलकर मार दिया और रुपये ले आये तो मेरेको मारकर यह आया है।
वे लोग पासमें बैठे इधर-उधर देखने लगे कि बात तो ठीक दीखती है। यह उस समय गया था बम्बई (कर्जा था)। पीछे जल्दी लाकर उतार दिया तो आश्चर्य आया कि इतनी जल्दी कर्जा कैसे उतारा? तो वहम लोगोंके था ही। बात मिल गयी। वह बोला—इस वास्ते मैं आया हूँ बदला लेनेके लिये। इतना रुपया इसका खर्च हो गया है मेरे जन्ममें, इतना विवाहमें और इतना कुछ बाकी रहा है। एक बार और आऊँगा। अब ये रोवे, अब रोनेसे क्या हो? ऐसा बदला लेनेवाला लड़का था वह। पासमें बैठे लोगोंने पूछा—इसने तो इतना अन्याय, अत्याचार किया पर इस बणियेकी बेटीने क्या खराब काम किया जो यह विधवा हो गयी? गुस्सेमें आकर बोला, यह वही राँड भुंजारी है। दोनोंने मिलकर मारा था मेरेको, अब रोती रहेगी उम्रभर। उसका बाप बोला कि यह सन्निपातमें आ गया। सन्निपातमें आनेपर बादीमें बकता है। यह ऐसे ही बकता है, प्रलाप करता है। वायुका जोर है। उसने कहा कि ‘वायुका जोर नहीं है, मैं सन्निपातमें नहीं हूँ। अमुक सेठकी हवेलीके दक्षिणकी तरफ चार चोर भीत फोड़कर भीतर घुस रहे हैं और वे चोरी करेंगे। जाकर देख लो, अगर यह बात सच्ची तो मेरी बात भी सच्ची। वह बात झूठी तो मेरी बात भी झूठी।’ उस समय तो वहाँ कोई गया नहीं। बात सबके सामने हो गयी और वह मर गया। लोगोंने सुबह देखा कि बात सच्ची है। भीत तोड़ी हुई है, चोरी हो गयी तो यह बीती हुई घटना है भाई! यहाँ जो काम करते हो राई-राईका लेखा होगा।
जब हक पूछे हिसाब मांही तब लेखा दिया नहीं जायगा रे सेवग साहब सो चोर.......जम के हाथ बिकायगा रे
शीघ्र चेत करो ! मौत नजदीक आ रही है।
यह दशा होगी। इस वास्ते भाई ये किये कर्म जरूर भोगने पड़ते हैं। आपको इस जन्ममें कर्म बिगड़नेकी एक बात बतायी, सच्ची घटना है। ऐसी घटनाएँ मैंने सुनी हैं। ऐसा होता है और भोग भोगना पड़ता है। इस वास्ते मनुष्यको बड़ी सावधानी रखनी चाहिये।
डरते रहो यह जिन्दगी बेकार न हो जाय।
सुपने में किसी जीवका अपकार न हो जाय॥
पाप, अन्याय करके नरकोंके दु:खोंकी तैयारी कर लेना, कितनी बड़ी हानिकी बात है। मानव-शरीर मिला भगवान्की कृपासे। प्रभुकी प्राप्ति कर लो, तत्त्व-ज्ञान प्राप्त कर लो, जीवन्मुक्ति कर लो, मुक्त हो जाओ—ऐसा सुन्दर मौका मिला है। ऐसे मौकेको खो करके पाप-संग्रह कर लिया।
सा हानिस्तन्महच्छिद्रं सा चान्धजडमूढता।
यन्मुहूर्तं क्षणं वापि वासुदेवं न चिन्तयेत्॥
जिस क्षणमें, मुहूर्तमें भगवान्का चिन्तन नहीं हुआ वह बड़ी हानि है। ‘महत् छिद्रम्’ बड़ी गलती हुई, ‘अन्धता’ मूढ़ता—बड़ी भारी नीची-से-नीची बात है कि भगवान्का चिन्तन नहीं किया। भगवान्के चिन्तनके लिये, उस तत्त्वकी प्राप्तिके लिये ही मानव-शरीर मिला है। यह धन कमानेके लिये, भोग भोगनेके लिये शरीर नहीं है। जैसा बाल्यावस्थामें ब्रह्मचर्याश्रम है, वह केवल विद्याध्ययन करनेके लिये है। उम्रभरमें वह विद्याध्ययनका मौका है, ऐसे चौरासी लाख योनियोंमें एक ब्रह्म-विद्याका अध्ययन करो। उसके लिये यह मानव-शरीर है। उस मानव-शरीरको ऐसे ही खो देना, कितनी बड़ी हानिकी बात है और वह समय है आपके पास। अभी हम जी रहे हैं।
अभी धौंकनी चल रही है, आँखें टिमटिमा रही हैं। अभी चेत करें तो अभी काम कर सकते हैं। कितना कर सकते हैं कि पूरा-का-पूरा। भगवद्गीता कहती है मूर्ख-से-मूर्ख परमात्माकी प्राप्ति कर ले। पापी-से-पापी हो तो परमात्माकी प्राप्ति कर ले। थोड़े-से-थोड़े समयमें प्राप्ति कर ले। ये तीनों बातें याद कर लो। आप योग्य नहीं हैं, पढ़े-लिखे नहीं हैं, महान् मूर्ख हैं तो परमात्माकी प्राप्ति हो सकती है। भगवान्ने दसवें अध्यायमें कहा—
मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम्।
कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥
(गीता १०। ९)
मेरेमें तो मन लगा दे और मेरे लिये ही जीवन धारण कर। प्राणोंका उपयोग मानो भगवान्के लिये ही हम जीते हैं और कोई काम नहीं करना है। न संग्रह करना है, न भोग भोगना है। यश, प्रतिष्ठा, मान कुछ भी प्राप्त नहीं करना है। भगवान्को प्राप्त करना है। ऐसे विचार करके ‘मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम्।’आपसमें मिले तो भगवत्सम्बन्धी बात चलावे, भगवत्सम्बन्धी बात ही सुने, वही बात छेड़े। ‘कथयन्तश्च मां नित्यम्’ सुननेवाले हों तो मेरी बात ही कथन करे औरोंको सुनावे। ‘तुष्यन्ति च रमन्ति च’ इसमें ही सन्तोष लाभ करते हैं। जितना समय भगवच्चरणोंमें बीत गया, भगवान्के चरणोंमें समय लगा वही सफल है।‘जो दिन जाय भजन के लेखे सो दिन आसी गिणती में।’ आपकी गिनतीमें वही समय आयेगा जो भगवान्के भजनमें बीता। कौशल्या माँने कहा राम! तुम्हारे बिना जो हमारे दिन बीते, ब्रह्माजी उन दिनोंको हमारी उम्रमें न गिनें। यह मनुष्य-शरीरका समय नहीं है। हमारा तो समय जो रामलला सामने रहे वही मनुष्य-जन्मका समय है। भजनके बिना जो समय गया वह निरर्थक गया, उसकी पूर्ति नहीं हो सकती। आज दिनतक जो निरर्थक समय गया है उसकी पूर्ति जन्म-भरमें नहीं हो सकती कभी। अगर हम अब तत्त्वकी प्राप्ति कर लें, भगवान्के दर्शन कर लें तो भी जो समय खाली गया, वह तो हानि ही हो गयी। समय खाली नहीं जाता तो उसी समय प्राप्त कर लेते कि नहीं? तो उतना समय खाली गया उसकी हानि हो गयी, उसकी पूर्ति कैसे हो? ‘गया वक्त आवे नहीं पीछा।’ आज दिनतकका समय चला गया, अवस्था चली गयी, वह दिन पीछा आ सकता है क्या? वह तो गयी। गयी नहीं रही हुई भी जा रही है। रहा हुआ समय भी जा रहा है।
तज के सन्तोष सठ दीनन को मोस
मोस सब आने भरी खोस है।
गयो परदादे दादे पितु मातु राह जाय,
रहये रात दिन देखे निशी डोल रहे॥
तोऊ नहीं हीश कोउ कहे काहु करत।
रोष बिन जाने देत दोष है।
ओस अम्बु को सो क्षण भंगुर शरीर यह,।
अमर करनो चाहे यही अफसोस है॥
‘ओस अम्बु को सो’—जैसे ओसका पानी कितनी देर ठहरता है। क्या कहें? बड़े दु:खकी बात है ऐसे शरीरको रखना चाहते हैं। सब शरीरधारी संसारसे मर गये पर हम तो रहेंगे ही—तो तुम कैसे रहोगे? तुम्हारा मसाला और तरहका है क्या? अमुकका हार्ट फेल हो गया तो तुम्हारा फौलादका है क्या? कितने दिन ठहरोगे भाई। उसी मिट्टीसे ये बने हुए शरीर हैं। जिस मसालेसे वे मरनेवाले बने थे उसी मसालेसे ये बने हुए हैं और यह मृत्युलोक है मरनेवालोंका लोक है। यहाँ सब मरने-ही-मरनेवाले रहते हैं। ऐसे शरीरमें निश्चिन्त कैसे बैठे हो? कहाँ हो? किस देशमें हो?
कोई आज गया कोई काल गया
कोई जावनहार तैयार खड़ा,
नहीं कायम कोई मुकाम यहाँ
चिरकाल से यही रिवाज रही,
जाग मुसाफर देख जरा तेरे
कूच की नौबत बाज रही,
सिर कूच की नौबत बाज रही......।
थारे माथे नगारा बाजे मौत ना रे,
तू तो जाने छे माने मरणो नथी रे।
मरणो पड़सी के आज के काल,
थांरे माथे नगारा बाजे मौत ना रे॥
मृत्युके दिन नजदीक आ रहे हैं भाई! आप-हम यहाँ आकर बैठे उस समय उमर जितनी बाकी थी उसमेंसे उतना समय हमारा बीत गया है। एक घण्टा कम हो गया है जीनेमें, मौत नजदीक आ गयी है। आ गयी नहीं है आ रही है, प्रतिक्षण नजदीक आ रही है और निश्चिन्त बैठे हैं! कौन रहने देगा यहाँ? समय आयेगा उसी क्षण चलना पड़ेगा।
हाकम आये हवालदार छोड़ नगरी,
छोड़ नगरी रे हंसा छोड़ नगरी।
हाकम आये हवालदार छोड़ नगरी।
दोय घड़ी ठहरो यमराजा।
माया पड़ी है मेरी बिखरी,
माया पड़ी है मेरी बिखरी।
तो इकट्ठी करके क्या निहाल हो जायगा। थोड़ा काम बाकी रह गया। वहाँ तो एक नहीं सुनेंगे एक, उसी क्षण चलो फिर देरी नहीं होगी। वह दिन आ रहा है, उसका खयाल ही नहीं है। उस संसारमें है जहाँ मौत होती है, सबकी मृत्यु आती है और वह पता नहीं कब आ जाय? जन्मसे लेकर सौ वर्षकी उम्रतक कोई वर्ष आपने सुना कि इस वर्ष मौतका कोई भय नहीं है। एक वर्ष, दो वर्ष, दसवाँ, पचासवाँ कोई ऐसा वर्ष है कि अब तो निश्चिन्त रहो कि इस उम्रमें तो कोई मरता नहीं है। ऐसा देखा कभी। सबके लिये सौ-के-सौ वर्ष मौतके लिये खुले हैं। वर्षभरमें कोई महीना आपने देखा कि यह तो मलमास लग गया है तो अब इस महीनेमें मरेगा नहीं कोई। अमुक महीना आ गया है, ऐसा कोई महीना देखा जिसमें मरता नहीं। बारह महीना मौतके लिये खुला। महीनेमें ३०-३१ दिन होते हैं। कोई दिन देखा कि आज रविवार आ गया आज तो मरनेकी छुट्टी है। सब दिन खुले हैं। २४ घण्टे खुले हैं। यह नहीं कि इस एक घण्टामें कोई नहीं मरेगा। सब मिनट, सेकेण्ड मौतके लिये खुले हैं भाई! जीनेका भरोसा नहीं है मौत हरदम तैयार है। ऐसे खतरेमें हैं—और निश्चिन्त बैठे हैं। मानो वह काम कर लिया। जिस कामके लिये आये हो, वह काम किया कि नहीं? वह तो किया ही नहीं। फिर क्या किया तुमने? इतना धन कमा लिया, इतना यह कर लिया तो क्या काम आवेगा-सा? आज अगर मर जाओ तो क्या काम आवेगा? जितना भजन-स्मरण किया है, जितना अन्त:करण शुद्ध कर लिया है वह पूँजी साथ चलेगी। वह न करके और क्या किया तुमने?
मारहि काल अचानक चपेटहि,
होई घड़ीक में राख की ढेरी।
ये मेरे देश विलायत है ये मेरे गज ये मेरे हाथी।
ये मेरी कामिनी केलि करे नित ये मेरे सेवक हैं दिन राती।
ये मेरे मात पिता पुनि बाँधव ये मेरे पुत्र अरु नाती।
सुन्दर ऐसे ही छाड़ चलेगो तेल जल्यो बुझी जैसे बाती॥
अब खत्म हो गया बस। ऐसे ही उमर खत्म होनेपर उसी क्षण जाना पड़ेगा। ये मेरे-मेरे कहलानेवाले काम नहीं आयेंगे। कोई स्नेह करनेवाला है नहीं। थोड़ा-बहुत कोई स्नेह करनेवाला होगा तो रो देगा बस। और वह क्या करेगा? बताओ कोई सहायता कर सकता है? कोई बचा सकता है। हृदयसे सहायता करनेवाला कोई नहीं है। कोई हो तो करे क्या? बस चलता नहीं किसीका। आज आप स्वतन्त्र हो अपनी करनी ऐसी कर लो—
कबिरा सब जग डरपे मरण से, मेरे मरण आनन्द।
कब मरिये कब भेटिये, पूरण परमानन्द॥
लोग तो मरनेसे डरते हैं, मेरे मरनेका आनन्द है, मौज हो गयी अपने तो बस मर जायँ तो ठीक है। लेना कुछ नहीं रहा, करना कुछ नहीं रहा। ‘रज्जब धोखा को नहीं फल दे सूखा खेत॥’ अब सूख जाय तो क्या हर्ज हुआ? ऐसे मनुष्य-शरीरको सफल बना लिया जाय तो बड़ी अच्छी बात है। अगर अभी करना और जानना बाकी है तो जानना स्वयंके जाननेसे पूरा होगा। करना—उपकार करनेसे, दूसरोंके लिये ही करनेसे करना बाकी नहीं रहेगा। अपने लिये करनेसे तो करना बाकी ही रहेगा; क्योंकि करनेसे जो मिलेगा वह नाशवान् मिलेगा। वह तो खत्म हो जायगा, फिर करना बाकी रह गया तो रहे रीते-के-रीते ही। करते-करते उमर बीत गयी पर करना बाकी तो कई जन्म बीत जायँगे फिर भी करना बाकी रहेगा। घांणीका बैल उमरभर चलता है पर वहाँ-का-वहाँ ही रहता है। एक कदम इधर-उधर नहीं जाता, रहता है वहाँ ही। एक बार मर गये फिर जन्मो, फिर मरो। अब यह चक्करका अन्त आयेगा कभी। वह करना सही करना नहीं है भाई! दूसरोंके लिये करना है, हमारे लिये कुछ करना नहीं है। ‘कृत्यकृत्य’ हो जायँगे। परमात्माको अगर प्राप्त नहीं करोगे तो प्राप्त करना बाकी रहेगा। परमात्माकी प्राप्ति होनेके बाद फिर ‘नानवाप्तमवाप्तव्यम्’ फिर प्राप्तव्य बाकी नहीं रहेगा।
मानव-जीवनका खास काम
तीन शक्तियाँ हैं—जाननेकी, करनेकी और पानेकी। स्वयंको जाननेसे आप ज्ञात-ज्ञातव्य हो जायँगे, केवल दूसरोंके लिये करनेसे कृतकृत्य हो जायँगे और भगवान्की प्राप्ति होनेसे प्राप्त-प्राप्तव्य हो जायँगे। सज्जनो! इनमेंसे एक चीज पूरी कर लो तो तीनों चीजें हो जायँगी। ऐसी विलक्षण बात है। ज्ञात-ज्ञातव्य हुए तो प्राप्त-प्राप्तव्य और कृतकृत्य भी हो जायँगे। कृतकृत्य होते ही ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जायँगे। ऐसे प्राप्त-प्राप्तव्य हो जाओगे तो ज्ञात-ज्ञातव्य और कृतकृत्य हो जाओगे। एक करनेसे तीनों काम सिद्ध हो जाते हैं ऐसी बात है। उसको प्राप्त करनेका अधिकार सबको है। मनुष्यमात्र उसको प्राप्त कर सकता है, कारण कि यह मनुष्य-शरीर परमात्माकी प्राप्तिके लिये ही मिला है। इसमें अगर नहीं होगा तब कब होगा? कई लोग कहते हैं—हम तो ऐसे-ऐसे हैं। तुम कैसे ही हो चाहे। परमात्माकी प्राप्तिके अधिकारी हो, संसारका अधिकार बराबर दो को भी नहीं मिलता। मिल जाय तो सर्वोपरि नहीं हो सकता। एकको सर्वोपरि पद मिला—दूसरा भी सर्वोपरि हो गया तो वह पद सर्वोपरि नहीं रहा न? धनियोंमें भी सबसे बड़ा धनी बने तो एक हो सकता है। संसारभरमें एक धनी हो सकता है। दो हो गये तो सर्वोपरि नहीं हुआ। परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होनेपर सर्वोपरि हो जायगा। सभी सर्वोपरि, सब ही महापुरुष, जीवन्मुक्त, तत्त्वज्ञ, भगवत्स्वरूप। सब-के-सब सर्वोपरि हो जायँ, ऐसा पद मिल सकता है। कोई मूर्ख-से-मूर्ख हो उसको बुद्धियोग मैं देता हूँ, जिससे मेरी प्राप्ति हो जाय। देदीप्यमान ज्ञान-दीपकके द्वारा उनके अज्ञानान्धकारका नाश मैं कर देता हूँ। (गीता १०। ११) इससे बहुत जल्दी प्राप्ति हो जायगी मेरी। पहले तो मूर्ख-से-मूर्खका बताया। अब पापी-से-पापी, अन्यायी-से-अन्यायी, दुष्ट-से-दुष्टके लिये बताते हैं। ‘भजते माम् अनन्यभाक्’ उसने अब दृढ़ निश्चय कर लिया कि मैं भगवान्का भजन ही करूँगा निरन्तर, भजनके सिवाय और कुछ नहीं करूँगा। संसारका काम करूँगा तो भगवान्की प्रसन्नताके लिये करूँगा। गृहस्थका काम करूँगा तो गृहस्थ मेरा नहीं है ठाकुरजीका है। ठाकुरजीपर अहसान करता है कि आपका काम करता हूँ। आपका पालन-पोषण करता हूँ, आपके बच्चोंका पालन-पोषण करता हूँ। सभी मर जायँ तो रोएँ ठाकुरजी मैं क्यों रोऊँ? मैं तो काम करनेवाला हूँ। मेरा कोई है ही नहीं। काम करूँगा, सेवा करूँगा। ऐसे अनन्यभाक् मेरा भजन करता है। पापी-से-पापी जब अनन्यतासे लग जाता है अब पाप नहीं करूँगा तो ‘रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की। (मानस १। २९। ५) उसके हृदयका भाव है उसको भगवान् आदर करते हैं। पाप सब नष्ट हो जायँगे। पापी-से-पापी भी बहुत जल्दी ‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’ देरीका काम नहीं। कितनी विलक्षण बात है। ‘शश्वच्छान्तिं निगच्छति’, ‘कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्त: प्रणश्यति॥’ (गीता ९। ३१) मेरे भक्तका विनाश नहीं होता। पापी-से-पापी तथा मूर्ख-से-मूर्ख थोड़े-से समयमें उसको प्राप्त कर सकता है ‘अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्॥’ अन्तकालमें मर रहा है, अन्तिम श्वास जा रहा है। ‘स्थित्वा स्याम् अन्तकालेऽपि’ अन्तकालमें भी भगवान्की याद कर ले तो ‘अन्तमति सो गति’ उसे प्राप्ति हो जाय। थोड़े-से-थोड़े समयमें मूर्ख-से-मूर्खको, पापी-से-पापीको, परमात्माकी प्राप्ति हो जाय, कल्याण हो जाय, उद्धार हो जाय।
यह मनुष्य-जन्म सफल हो जाय उसके लिये इतना समय दिया, साठ वर्षतककी उम्र दी। अगर भगवत्प्राप्ति करते तो बहुत जल्दी हो जाती, पर उधर तो गये ही नहीं आप। यह तो किया ही नहीं। एक परिवार गया प्रयागराज कुम्भ-मेलेमें। भीड़ ज्यादा देखकर, जंगलमें बाहर ठहर गये। धनी आदमी थे पहरा लगा दिया। दूध लाना पड़ता गाय ही खरीद ली, रसोई बनती है, भोजन करते हैं, आरामसे रहते हैं। तम्बू लगा दिये। रहे महीना भर माघमें फिर आये पीछा। उनको पूछा कहाँ गये थे? प्रयागराज! वहाँ त्रिवेणी नहाये कि नहीं? नहीं, हम तो बाहर रहते थे, प्रबन्ध हमारे बहुत बढ़िया था। वहाँ नौकर-चाकर सब काम करते थे। वहीं रहते रात-दिन। बड़ा अच्छा प्रबन्ध था, सब चीज मँगा लेते, सब होता था। ऐसे रहे वहाँ तो तब प्रयागराज क्यों गये? त्रिवेणीजी देखी ही नहीं, उसमें स्नान तो किया ही नहीं।
ऐसे मानव-शरीर प्राप्त किया, धन कमा लिया, बेटा-बेटीकी शादी कर दी, मकान बना लिये, बहुत-से मुकदमोंमें हम जीत गये। जीत करनेके लिये गये थे क्या मनुष्य-शरीरमें? मनुष्य-शरीर इसके लिये मिला था क्या? सब काम कर लिये। अरे, भजन किया कि नहीं। यह तो नहीं किया यह तो भूल गये और बताओ कोई कमी हो तो और सब कर लिया काम।
एक टोली आ रही थी पूछा क्या है? बरात-है-बरात। अच्छा तुम्हारेमें दूल्हा नहीं दीखता है, दूल्हा कहाँ है? नहीं लाये क्या? नहीं लाये सा, आपसमें पूछने लगे वह तो वहीं भूल गये। बड़े कामोंमें कोई-न-कोई भूल रह जाती है। बड़ा काम है जिसमें कसर रह जाती है। ‘बींद (दूल्हा) बिहुणी जान कहो कुण काम की’ सन्तोंने कहा है कि भजन नहीं किया तो क्या काम किया मनुष्य-शरीर ले करके? एक ही भूल हो गयी। बरात जा रही है बिना दूल्हाके तो रोटी भी कौन खिलायेगा? साथमें दूल्हा तो है ही नहीं। बींद (दूल्हा) तो है ही नहीं और बताओ। जेवर, गहना, रुपये, पैसे हमारे पास कितना है? सब सामग्री हमारी तैयार है सा। एक भूल हो गयी। बींद (दूल्हा) भूल गये। ऐसे मानव-शरीर प्राप्त किया जिसमें भजन करना तो भूल गये और सब काम ठीक कर लिया। यह तो भूल हो गयी। यह काम तो और जगह हो जाता। एक सुअरनीके ग्यारह बच्चे देखे हैं। यह कौन-सा काम बाकी रहता। और जगह ही हो जायगा खाना, पीना, सोना आदि ‘खादते मोदते नित्यं कूकर: सूकर: खर:। तेषामेषां को विशेषो वृत्तिर्येषां तु तादृशी॥’ यह तो वहाँ ही हो जायगा भाई! भजन कहाँ होगा? परन्तु इधर तो ध्यान ही नहीं, खयाल ही नहीं है। यह होश कब होगा भाई! होश होनेपर क्या होगा? समय निरर्थक न जाय, अच्छे-से-अच्छे, ऊँचे-से-ऊँचे काममें समय लगाया जाय।
मानव-शरीरका समय है सज्जनो! यह उमर बड़ी भारी कीमती है। इसमें बड़ा भारी काम किया जा सकता है। वह समय खराब कर दिया केवल पापोंमें, खाने-पीनेमें, ताश-चौपड़में। खेल देखते हैं, तमाशा देखते हैं, वाइस्कोप देख लिया, थियेटर देखने गये थे। अरे! समय बरबाद कर दिया तुमने। क्या फायदा निकला बताओ? आपने बहुत सिनेमा देख लिया, हमने नहीं देखा, दोनोंका मिलान करो। क्या आपमें विलक्षणता आ गयी? क्या विचित्रता आ गयी? भोग भोगनेसे क्या विचित्रता आ गयी? धन कमा लिया, भोग भोग लिया तरह-तरहके। जिसने नहीं भोगा उसे मिलान करके देखो क्या फर्क आता है? मेरे तो ऐसी बात आयी है पहले। मूर्खताकी बात बतावें।
एक आदमीको देखा, उनके भोग-सामग्री बढ़िया थी। मनमें आया कि इसके तो भोग-सामग्री है हमारे नहीं है। फिर विचार किया कि भोग भोगनेवालेमें और हम न भोगनेवालेमें अन्तर क्या है? इसमें क्या विलक्षणता है? विलक्षणता हमें मिली नहीं। नहीं तो हम भी विचार करते कुछ। नशा पता करनेवालोंमें देखा तो उनमें भी कुछ विचित्रता नहीं है। गोरखपुरमें मैंने व्याख्यानमें कह दिया था—ये नशा पता जितना करते हैं। अधिक-से-अधिक नशा करनेवाला आ जाओ मेरे सामने, मेरे-जितना बोल दो, मेरे-जितना चलो, मैंने उद्दण्डता कर दी कि कुश्ती आ जाओ मेरेसे भले ही। मैंने नशा पता नहीं किया, आपने बहुत किया है। आपमें क्या विलक्षणता आयी? समय बरबाद कर दिया, जीवनके बदलेमें आपने हासिल क्या किया? मानव-शरीर मिला है न। मानव-शरीर प्राप्त करनेपर कुछ अलौकिकता प्राप्त हो जाय तब तो उसकी महिमा है।
बड़ें भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥
(मानस ७। ४३। ७)
लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसम्भवान्ते।
मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीर:॥
तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु यावन्-
नि:श्रेयसाय विषय: खलु सर्वत: स्यात् ॥
(भागवत ११। ९। २९)
एकादश स्कन्धमें कहते हैं ‘‘सुदुर्लभम्’’ महान् दुर्लभ।
दुर्लभं त्रयमेवैतद्देवानुग्रहहेतुकम्।
मनुष्यत्वं मुमुक्षुत्वं महापुरुषसंश्रय:॥
(विवेकचूड़ामणि ३)
भगवत्कृपा ही जिनकी प्राप्तिका कारण है वे मनुष्यत्व, मुमुक्षुत्व (मुक्त होनेकी इच्छा) और महान् पुरुषोंका संग—ये तीनों ही दुर्लभ हैं। ऐसा ‘दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।’ ऐसी दुर्लभ चीज सुलभतासे मिल गयी। ‘पाइ न जेहिं परलोक सँवारा॥’ ऐसा समय मिल गया है, ऐसा मौका मिल गया है। सज्जनो! गीता-जैसा ग्रन्थ मिल गया, अच्छे-अच्छे सन्त महापुरुषोंकी वाणी मिल गयी।
उन लोगोंने कहा—वह मार्ग हम कुछ जानने लग गये, हमारी थोड़ी बहुत दृष्टि उधर चली गयी। सत्संग भी करते हो तो यह करनेका क्या असर हुआ? क्या किया? अगर इस काममें सच्चे हृदयसे नहीं लगे तो क्या किया? समय मिला हुआ है वह जा रहा है। प्रतिक्षण जा रहा है।
भजन बिना दिन जावे,
अरे मन तूँ गोविन्द क्यूँ नहीं गावे?
भजन बिना दिन जावे, दिन जावे॥
पल पल करते छिन छिन बीते,
छिन से घड़ी हो जावे।
फिर घड़ी घड़ी करते पहर बदीती
आठ पहर घुल जावे।
भजन बिना दिन जावे।
मन तूँ गोविन्द क्यूँ नहीं गावे?।
अब सावधान होओ,
अब गयी सो गयी राख रही को,
मनवा अजहूँ मान सही रे।
पुत्र कलत्र सुमित्र चरित्र,
धरा धन धाम हैं बन्धन जीव को।
बारहिं बार विषय फल खात,
अघात न जात सुधा रस पी को॥
आन अज्ञान तजो अभिमान,
कहि सुन कान भजो सिय पी को।
पाय परंतप हाथ सुं जात,
गयी सो गयी अब राख रही को॥
अब जितना समय बच गया है वह लगा दो।
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।
कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ॥
(मानस ७। ४३)
इस वास्ते भाई! अभी मौका मिल गया है। अपना समय सब लगा दो भगवान्के भजनमें।
(दिनांक १२ अगस्त, १९८१)