प्रवचन—६

भाई-बहन उद्योग नहीं करते, इसमें तत्त्व क्या है? सार चीज क्या है? उस तरहसे मैं बात बताता हूँ, आप ध्यान देंगे। रुपयोंकी महत्ता बहुत बैठी हुई है। सब जगह ही है, पर यहाँ कुछ विशेष देखनेमें आती है। अब क्या करें? फिर कहता हूँ आप ध्यान दें। ध्यान देनेकी बात यह है कि हमारे मनमें रुपयोंकी इच्छा जोरदार होगी तब रुपये सुख देंगे। संसार जो सुख देता है वह संसार कोई सुख देनेका सामर्थ्य नहीं रखता है। हमारी इच्छा होनेसे संसार सुखदायी दीखता है। जिस विषयमें हमारी इच्छा नहीं है, उस विषयमें संसार सुख नहीं दे सकता। यह एकदम पक्‍की बात है। कृपा करके मेरी बात सुन लें। रुपयोंका लोभ मनमें न हो। रुपया मेरेको मिले, ऐसी तृष्णा न हो, उसको रुपया सुख नहीं दे सकता।

रुपयोंमें सुख नहीं

सुख देनेकी ताकत रुपयोंमें नहीं है, आपके लोभमें है। मेरी बातका मनन करते चले जायँ। इसे समझनेके लिये जितनी शंका करें उतनी बढ़िया है। आप गहरी रीतिसे शंका करोगे तो मेरे प्रसन्नता बहुत होगी। मेरेको आप भेंट-पूजा दे दो, भोजन, कपड़ा दे दो और कुछ दे दो उससे उतना मैं राजी नहीं होऊँगा। पक्‍की बात है। जितना इसविषयमें समझोगे तो मैं बड़ी भारी कृपा समझूँगा, मामूली कृपा नहीं, बड़ी भारी कृपा समझूँगा। इस बातको समझोगे तो। सीधी बात है बिना इच्छाके पदार्थ सुख दे सकता नहीं कभी भी। यह आपके जँचे या न जँचे, इसका तो पता नहीं, परंतु बात बिलकुल सोलह आना सच्ची है, इसमें किञ्चिन्मात्र भी इधर-उधर है नहीं। पक्‍की बात है। रुपयोंमें लगे हो, हाय रुपैया! हाय रुपैया! उसमें लगे हो। वह रुपया सुख देता है कब? जब आपके इच्छा होती है तब। इच्छा बिना सुख नहीं दे सकता रुपया। अगर सबको सुख दे तो कुत्तेको भी सुख देना चाहिये। रुपयोंकी थैली रख दो उसके सामने, वह पेशाब करके चला जायगा। रुपयेमें ताकत है तो कुत्तेको भी सुख मिलना चाहिये। अब आप कह सकते हो कि कुत्ता तो समझता नहीं, परंतु अब वह उदाहरण तो कैसे दूँ। सुनी हुई बात तो मैं कह दूँ, पर आपको समझानेकी मेरे पास ताकत नहीं है।

जिसके हृदयमें वैराग्य है, रुपयोंमें राग नहीं है, आसक्ति नहीं है, प्रियता नहीं है—ऐसे पुरुषोंको रुपया सुख नहीं दे सकता। अब कैसे समझाऊँ बताओ। आपको वैराग्य हो तब पता लगे। बिना वैराग्यकी बात भी मैं कह सकता हूँ। मेरे कहनेमें बहुत उत्साह है। आप थोड़ी कृपा करें। अधिक-से-अधिक लोभी आदमीको लो, जो रुपयोंके लिये कुएँमें पड़नेको तैयार। कहीं रुपये मिल जायँ, बस। ऐसा अधिक-से-अधिक लोभी, उसको लाकर हाजिर कर दो और उसके सामने कह दिया जाय और रुपयोंका ढेर लगा दो। एक-एक रुपया आप गिनते जाओ। जितने गिनोगे उतने आपके। गिनते ही जाओ। बन्द कर दिया तो फिर बन्द हो जायगा। वह कितनी देर गिन सकेगा? आठ पहर भी नहीं गिन सकता।

आप कहो कि भूख लगती है, प्यास लगती है, टट्टी-पेशाब लगती है। अच्छा छुट्टी दे देंगे। भोजन कर लो, पानी पी लो, फिर बैठ जाओ, टट्टी-पेशाब फिर आओ, फिर बैठ जाओ। तो क्या आठ पहर गिन सकोगे? है किसीकी ताकत? अभी मेरे पास रुपया नहीं है, नहीं तो अभी आपको करके बता दूँ। नहीं गिन सकोगे। नहीं रह सकोगे। टिक सकोगे नहीं। अब तो नींद आती है तो नहीं भाई, नींद नहीं लेना और तुम जो कुछ कर लो। नींद नहीं। नींद लोगे तो रुपया नहीं मिलेगा। रुपया छोड़ो मत। टट्टी-पेशाब भी जाओ तो हाथमें पकड़े जाओ। भोजन करो तो भी पकड़े रखो रुपयोंको। पानी पीओ तो रुपयोंको पकड़े ही पानी पी लो। नींदमें छूट जायगा। याद नहीं रहेगा। रुपये छूट जाते हैं तो इसका मतलब आप रुपयोंको नहीं चाहते हो! नहीं चाहते हो! नहीं चाहते हो! अगर चाहते ही हो तो रुपयोंको छोड़ो मत।

सज्जनो! रुपयोंकी चाहना आपके है नहीं। मूर्खतासे लोभ करके चाहना पैदा की गयी है। यह आपका काम नहीं है, नहीं है, नहीं है। भगवान‍्के साथ सम्बन्ध आपका छूट सकता नहीं। रुपयोंके साथ सम्बन्ध आपका रह सकता नहीं। इतने रुपये दूर हैं आपसे। सब भोगोंसे दूर हो जाते हो। अब जरा एक बातपर खयाल करके देखो। रुपयोंके, भोगोंके साथ रहते-रहते आपका बल, बुद्धि, आपका स्वास्थ्य ठीक रहता है या रुपये आदि छोड़कर जब नींद गहरी ले लो तब आपका स्वास्थ्य ठीक रहता है। बताओ, विचार करके बोले तब पता लगे।

नींद आती है गहरी। उस समय पदार्थ, रुपये, भोग याद नहीं रहते। उससे शरीरको शक्ति मिलती है, स्वास्थ्य बढ़ता है। मनमें, बुद्धिमें, इन्द्रियोंमें स्फूर्ति आती है, स्वच्छता आती है, निर्मलता आती है, ताकत आती है। इनके संगसे ताकतका नाश होता है। इस बातको खूब विचार करो आप। आपको खुराक रुपये, पैसे नहीं दे सकते, जितना इनका वियोग आपको शक्ति देगा। रुपयोंका, संसारके पदार्थोंका, व्यक्तियोंका वियोग आपको जो सुख देगा—वह सुख इनका संयोग नहीं दे सकता। मैं बड़े जोरसे कहता हूँ। मेरेसे बुद्धिमान् आदमी एकान्तमें मिलें और बात करें। हमारी बात कभी फेल हो नहीं सकती। इतनी पक्‍की और सच्ची बात है। ठोस बात है। हमारे पीछे भगवान्, शास्त्र, धर्म, ऋषि-मुनि सब हमारे साथ हैं। आपके साथ लोलुप हैं। नारकीय जीव हैं और कोई नहीं है आपके साथ।

अनुभवका आदर करो

गाढ़ी नींदमें क्या होता है? रुपये छूटते हैं। रुपये याद नहीं रहते। परिवार याद नहीं रहता? भोग याद नहीं रहता। गाढ़ी नींद आ जाती है। अन्त:करण स्वच्छ होता है। इन्द्रियोंमें, मनमें, बुद्धिमें, सबमें शक्ति आती है। स्फूर्ति आती है, बल आता है। इधर इनके संयोगसे शक्ति नष्ट होती है। पतन होता है। रोग पैदा होते हैं और गाढ़ी नींदसे रोग दूर होते हैं। पदार्थोंके छूटनेसे जो सुख है, पदार्थोंके साथ मिलनेसे वह सुख नहीं है। यह आपका अनुभव है। इतनेपर भी आप छोड़ते नहीं, अब क्या बताएँ? जहाँ इनका संग छूटा कि वहाँ परमात्माका संग है। परंतु वह नींदमें है, बेहोशीमें है। बेहोशीका संग भी शान्ति देनेवाला है। होशपूर्वक संग हो तो निहाल हो जाओगे आप। यह कहते हो कि अनुभव नहीं है। पर आपको अनुभव है इस बातका। पर आप अनुभवका आदर नहीं करते हो। इस तरफ ध्यान नहीं देते हैं। कृपा करो, ध्यान दो थोड़ा-सा। एक कल्पना करो।

मेरे मनमें लग गयी कि यह घड़ी हमारेको मिल जाय—ऐसा विचार हुआ। ऐसा विचार होनेसे क्या हुआ है कि यह घड़ी मेरे मनमें बस गयी, अब मनसे छूटती नहीं। चलते-फिरते याद आती है कि घड़ी एक बढ़िया हमारे हाथ आ जाय। ऐसी मनमें बस गयी, अब घड़ी मिल गयी। किसी रीतसे घड़ी मिल गयी। मिलते ही सुख होता है, घड़ी मिल गयी। मिलते ही सुख क्या हुआ कि भीतरके मनसे घड़ी छूटी है, घड़ीके मिलनेका वह सुख नहीं हुआ है सज्जनो! मनसे घड़ी निकली है उसका सुख हुआ। इस बातको आप समझें। कृपा करें, इतनी मेहरबानी करें। ध्यान दें।

मनसे घड़ी निकल गयी, सुख हो गया। घड़ीमें अगर ताकत हो तो इसको पकड़े रहो, हरदम अगर सुख हो जाय। शर्त कर लो, होड़ लगा लो, कभी सुख नहीं हो सकता। घड़ी मिलनेसे ही अगर सुख होता हो तो घड़ीको पकड़े ही रहो, सुख होना चाहिये। कभी नहीं होगा। मनसे घड़ी निकलते ही सुख होगा। मेरे मनसे जो बात निकले वही बात है। मारवाड़ीमें ऐसी कहावत है—तू भी थारे मन री काढ़ ले—निकाल ले मनकी। मनकी निकालता है और कुछ नहीं है संसारका सुख।

जो आप कहते हो संसारसे सुख मिलता है। भगवान‍्से सुख मिलता नहीं। यह गलत है आपकी बात। संसारका सुख मिलता कहाँ है? मनकी निकलती है। वह सुख दीखता है। वियोगमें सुख है, रुपयोंके वियोगमें सुख है, घड़ीके वियोगमें सुख है, पदार्थोंके वियोगमें सुख है। इनके मिलनेसे सुख नहीं होता। आप विचार नहीं करते। मूर्खताके कारण मान लेते हो कि घड़ी मिलनेसे सुख हुआ। घड़ी मिलनेसे सुख नहीं हुआ है। घड़ी भीतरसे निकल गयी, उसका सुख हुआ है।

आपको संसारके वियोगमें सुख है। संसारके संयोगमें सुख नहीं है। बिलकुल पक्‍की बात है। आप समझें चाहे न समझें। इस बातमें फर्क नहीं है। हमने अच्छे-अच्छे पुरुषोंसे सुना है। अच्छी-अच्छी पुस्तकोंमें पढ़ा है और विचारमें आती है मेरे ये बात। इसमें संदेह नहीं है। जिस किसी चीजके मिलनेसे सुख मानते हो यह बिलकुल गलत है, बिलकुल गलत है। जिसका आपके मनमें ज्यादा आग्रह है, प्यार है, स्नेह है, राग है, वह चीज मिलनेसे मनसे निकलती है। उसका सुख होता है। वस्तुओंका सुख नहीं होता। अगर वस्तुका सुख हो तो वस्तु पासमें रहनेसे दु:ख नहीं रहना चाहिये। उन चीजोंके रहते हुए ही दु:ख होता है तो उस चीजमें सुख कहाँ है?

सत्संगसे शान्ति

परमात्माके मिलनेपर दु:ख कभी भी आयेगा ही नहीं। आपको ही नहीं परमात्माके सुखमें सुखी रहनेवालोंके दर्शनोंसे शान्ति मिलेगी। रुपयोंके, भोगोंके याद करनेसे जलन पैदा होगी। जितना-जितना इनका चिन्तन होगा उतनी हृदयमें आग लगेगी। अशान्ति पैदा होगी। ह्रास होगा, पतन होगा, रोग होंगे, शोक होगा, चिन्ता होगी, भय होगा, उद्वेग होगा। मार आफत-ही-आफत होगी। भगवान‍्की याद करते ही शान्ति, आनन्द, प्रसन्नता, मस्ती आवेगी भीतरसे।

कंचन खान खुली घट माँही।

रामदास के टोटो नाँही॥

भीतरसे आनन्दकी खान खुल जायगी। ऐसे पुरुषके कहीं दर्शन मिल जायँ तो आपको शान्ति मिलेगी, आपका पाप कटेगा। महान् शान्ति मिलेगी, वह किसी भोगसे नहीं मिल सकती। शास्त्रोंमें आता है—येषां संस्मरणात् पूत: सद्य: शुद्धॺन्ति वै गृहा:।

उन महापुरुषोंके याद करनेसे घर-के-घर पवित्र हो जाते हैं। जिनके हृदयमें भोगोंका राग नहीं है, जो पदार्थोंके गुलाम नहीं हैं, भोगोंके, रुपयोंके दास नहीं हैं—ऐसे पुरुषोंके दर्शनसे शान्ति मिलती है, पाप दूर होता है। कोई भोग नहीं है, न शब्द है, न स्पर्श है, न रूप है, न रस है, न गन्ध है, न मान है, न बड़ाई है, न आराम है—ये आठ चीजें खींचनेवाली हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध—ये पाँच विषय और मान, बड़ाई और आराम ये तीन—कुल आठ हैं। इन आठ चीजोंसे सुख होता है। खूब याद कर लो।

सत्संगमें शान्ति मिलती है कि नहीं। आपने अगर सत्संग किया है मन लगा करके, तो आप नट नहीं सकते। सच्चर्चा होती है, रामायणका पाठ हो रहा है, उस पाठमें क्या रुपये मिलते हैं? क्या भोग मिलते हैं? क्या मान मिलता है? क्या बड़ाई मिलती है? क्या शरीरमें आराम ज्यादा मिलता है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धमेंसे क्या है? आठों बातें नहीं हैं और सुख मिलता है तो वह किस चीजका सुख है—बताओ?

कहते हैं—भगवान‍्का सुख मिलता नहीं। आप उसका तिरस्कार करते हो, अपमान करते हो, मिले बिना कोई रह नहीं सकता। पारमार्थिक सुखके बिना कोई जी नहीं सकता। जीनेका केवल अगर कोई स्रोत है तो परमात्मा है। उसीसे ही आप जी रहे हो नहीं तो मर जाओगे। आपकी दृष्टि भ्रष्ट हो गयी, बुद्धि भ्रष्ट हो गयी। अकलको बेच दिया रुपयोंमें, टक्‍कोंमें। अकलका टका हो गया कैसे बतावें? अब बोलो, आपने रामायणका पाठ किया सामने, आपने देखा। उस रामायण-पाठमें रुपये मिले हैं क्या? फिर भी लोग खिंचते हैं, पढ़ते हैं, क्या सुख है यह। परमात्मसुख मिला नहीं तो यह क्या मिला है?

‘राम, राम, राम’ कितनी दुर्दशा हो रही है, उन चीजोंकी दासतामें। कष्ट भोगना पड़ता है, अपमान भोगना पड़ता है, निंदा भोगनी पड़ती है, दु:ख भोगना पड़ता है। चौरासी लाख योनिका दु:ख भोगना पड़ता है और यहाँ रहते हुए भी कितना अपमान, कितनी निंदा, कितना नीचा देखना पड़ता है। भीतरसे गरज चली जाय तो महाराज—चाह गयी चिन्ता मिटी, मनवा बेपरवाह। जिनके कछू न चाहिये सो साहनपत साह॥ बादशाहोंका बादशाह है वह, जिसके भीतर गुलामी नहीं है। ऐसी बातमें संदेह नहीं है केश-जितना भी—रत्तीमात्र सन्देह नहीं है। ऐसी सच्ची बात है।

आप चेतन होकर, परमात्माके साक्षात् अंश होकर नित्य-निरन्तर रहते हो। बालकपनसे आप वही हो, पदार्थोंका आपके साथ संयोग हुआ, वियोग हुआ, उत्पन्न हुआ और नष्ट हो गया। ऐसा है फिर भी उत्पन्न और नष्ट होनेवालोंकी गुलामीमें लग रहे हो। कुछ होश आना चाहिये न। आप वे ही रहते हो, ये पदार्थ बदलते हैं। जो बदलते हैं उनके पीछे पड़े हो। वे साथ रहते नहीं। मर जाओगे तो साथ रहेंगे नहीं?

जिन्दगी भी साथमें नहीं, बालकपनमें खिलौनोंसे बड़ा सुख मिलता था। अब खिलौना कितना सुख देते हैं? जरा बात याद करो। कागजके टुकड़े—काले, पीले, सफेद, कंकड़ उनको पकड़ लेते थे, उनसे सुख लेते थे। आज वह सुख दीखता है क्या? ऐसे ही आज इन पत्थरोंके टुकड़ों—हीरे, मानिक, पन्ना आदि रत्नमें इन कागज (रुपयों)-में बैठे हो। आप क्या जान सकते हो? माया को मजूर बन्दो कहा जाने बन्दगी— वह क्या जाने इस बातको। थोड़ा-सा विचार करो तो आपके लिये असंभव नहीं है। कारण कि आपने डेढ़ महीनेसे ऊपर सत्संग किया है। सत्संग करके देखा है, उन भाई-बहिनोंको समझाना कठिन नहीं है। जिसने कभी सत्संग किया ही नहीं, उसको समझाना कठिन है। इस वास्ते मारवाड़ीमें कहावत है—‘मूर्ख ने मारणू सौरो समझावणू दोरो’ वे नहीं समझ सकते इस बातको।

शंका—परमात्माका सुख मिले तो छोड़ दें।

समाधान—अभी व्याख्यानके बाद सौ-दो-सौ, पाँच सौ, तैयार हो जाना कि हम पारमार्थिक सुख जानते ही नहीं। सिद्ध करना इस बातको। सिवाय पारमार्थिक बातके यहाँ क्या मिलता है, बताओ? जिसमें माताएँ-बहनें भागी-भागी आती हैं, भाई लोग भागे-भागे आते हैं, सुनते हैं, बैठते हैं। क्यों आते हो? क्या संसारका सुख मिलता है? अब मैं समझानेमें अपनेको इतना समझदार नहीं मानता हूँ। परंतु मेरे समझमें आती है कि संसारका जो सुख मिलता है सब-का-सब परमात्माका ही है। संसारका है ही नहीं। जैसे यह चीज मिल जाय तो सुख हो जाय। सुख क्यों हुआ कि चीज मिलते ही मनसे वह निकल गयी। अब वह निकल गयी तो परमात्मा रह गये। संसार छूटा और परमात्मा पहलेसे तैयार। परमात्मा छूटता नहीं है। परमात्मा हरदम रहते हैं। आप विमुख होते हो। परमात्मा विमुख नहीं होता है। आप पदार्थोंकी चाहना करते हो इससे परमात्मासे विमुख होते हो और इस वास्ते रोते हो।

जहाँ चीज मिली, मनसे छूटी तो चट परमात्मा तैयार। वह जो आनन्द मिलता है वह परमात्माका है, इसका नहीं है। आप कहते हो कि यही है। कुत्ता हड्डी चबाता है और हड्डी भींचनेसे दाँत टूट जाता है। मुखमेंसे खून निकलता है। वह समझता है हड्डीमेंसे आ रहा है। ऐसे आप पदार्थोंसे लेते हैं, हड्डी चूसते हो। आप सोचते हो कि यह सुख पदार्थोंसे आ रहा है? यह नहीं आ रहा है। इसमें है ही नहीं रस। आवे कहाँसे? अगर इनमें रस होता तो अच्छे-अच्छे बुद्धिमान् विरक्त त्यागी हुए हैं। वे सफा मूर्ख थे क्या? जो सफा छोड़ दिया परवाह नहीं की। बेसमझ थे सफा?

परमात्मसुखमें स्वतन्त्रता

राजा भर्तृहरि हुए हैं उज्जैनमें। बहुत अच्छे विद्वान् थे। बड़े नीतिज्ञ थे। उन्होंने कई तरहके काम किये हैं। राज्य किया है और भोग भी भोगे हैं। महारानीके साथ रहे तो भाई ही राज करता था। वे तो महलोंमें ही रहते हरदम। ऐसे भोग भोगकर भी देखे हैं। परंतु न रुपयोंके साथ टिके, न राज्यके साथ टिके, न भोगोंके साथ टिके। वैराग्य हुआ तो वहाँसे खसके ही नहीं। गये नहीं कहीं भी। यह सुख मिल जायगा, तब आपको पता लगेगा। स्वतन्त्र सुख है बिलकुल, किसीकी पराधीनता नहीं है। संसारका सुख कभी स्वतन्त्रतासे मिल ही नहीं सकता। मैं जोरसे कहता हूँ। कोई भाई-बहन इसको सिद्ध करना चाहे तो करे। किसी-न-किसीके संगसे सुख मिलेगा। अकेला स्वतन्त्रतासे सुख नहीं ले सकता। परमात्माके सुखमें परतन्त्रता है ही नहीं। ‘पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं’ संसारका सुख बिना पराधीनताके मिलता ही नहीं। कोई सिद्ध करना हो तो करो। पराधीन होनेसे ही सुख मिलेगा। भोगोंसे मिलेगा तो भोगोंके पराधीन होगा। किसी व्यक्तिसे सुख मिलेगा तो व्यक्तिके पराधीन होगा। रुपयोंसे सुख मिलेगा तो रुपयोंके पराधीन। राज्यसे मिले तो राज्यके पराधीन। पदसे मिले तो पदके पराधीन। बिना पराधीनताके संसारका सुख नहीं मिल सकता। परमात्मामें आप चलोगे, इसमें आप लग जाओगे तो स्वतन्त्रतासे मिलने लगेगा।

पहले इसमें भी सत्संग, स्वाध्याय, सत्पुरुष, सत्-शास्त्र आदिके संगसे पता लगेगा। कारण कि संग-ही-संगमें आप रात-दिन रहे हो। इस वास्ते आपको असंगताका पता नहीं है। इस वास्ते संगसे छूटनेके लिये संग करना होगा। सर्वथा असंगता हो जायगी तो किसीकी जरूरत नहीं है।

सङ्ग: सर्वात्मना त्याज्य: स चेत् त्यक्तुं न शक्यते।

स सद्भि: सह कर्त्तव्य: सतां सङ्गो हि भेषजम्॥

‘सङ्गो हि बाध्यते लोके’—बँधता है वह जो संगी होता है। संग यदि छोड़ नहीं सकते तो सन्तोंका संग करो। ‘सतां सङ्गो हि भेषजम्’ वह संग छुड़ानेमें औषध है, दवाई है। रोगीको दवाई लेनी पड़ती है। रोग मिट जायगा फिर किसीके संगकी जरूरत नहीं है। ‘कंचन खान खुली घट माँहीं’ भीतरसे ही आनन्द आने लगेगा। जिसे शीतज्वर चढ़ता है तो भीतरसे आता है, रोंगटे खड़े हो जाते हैं। वह भीतरसे निकलता है। बाहरकी रजाइयोंसे बन्द नहीं होता। भीतरसे गर्म-गर्म पानी पिला दिया जाय तो शान्ति मिलेगी। ऐसे भीतरसे आनन्द आने लगता है, भीतरसे।

एक सन्तके पास कोई गया। बाबाजी अकेले ही बैठे हो? अरे भाई, तेरे आनेसे ही अकेला हो गया। इतनी देर तो अकेला नहीं था। संसारकी बात याद आते ही भगवान् छूट जाते हैं। वह संसार मिलकर क्या निहाल करेगा बताओ! संसारकी याद आते ही आफत आ जाती है। संसारका चिन्तन करते ही दु:ख आयेगा। संताप आयेगा, जलन होगी, आफत होगी। अभावका अनुभव होगा। यह नहीं है, यह नहीं है, यह नहीं है। नहींका अनुभव होगा आपके। थोड़ा-सा विचार कर आप देखें। आपके पासमें जितनी सामग्री है, मेरे पासमें उसकी अपेक्षा कुछ सामग्री नहीं है। आपके भाई-बन्धु हैं, कुटुम्बी हैं, बेटा है, बेटी है। आपके इतने हैं। मेरे अभाव-ही-अभाव है। न छोरा है, न छोरी है, न रुपया है, न घर है, न कुछ और है, न हमारे पासमें कोई पद है।

अगर आपकी तरह मैं चाहना करूँ तो रात-दिन रोऊँ। मेरी अपेक्षा तो आप बड़े भारी ठीक हो। एक भाईने कहा था—स्वामीजी, पूँजीवादका नाश कैसे हो? मैंने कहा—पूँजीवादका नाश चाहते हो तो पहले तुम मेरे समान बन जाओ। एक पैसा भी अगर तुम्हारे पास है तो मेरेसे तो तुम पूँजीवाले हो कि नहीं। पूँजीपति हो कि नहीं। लाखों-करोड़ों रुपया पूँजी है तो एक पैसा पूँजी नहीं है क्या? अगर पूँजीवादका नाश चाहते हो तो पूँजीका त्याग करो। नहीं तो पूँजीवादका नाश नहीं चाहते, पूँजीका परिवर्तन चाहते हो कि उनकी पूँजी मेरे पास आ जाय। मुँहमेंसे लार टपकती है धनी आदमियोंको देखकर। पूँजीवादका सिद्धान्त कहाँ सोचते हो?

इनके पास धन है वह मेरे पास आ जाय। नीयत खोटी है तुम्हारी। अगर पूँजीवाद खराब है तो पैसा छोड़ दो। पूँजी हम नहीं लेंगे। हम तो पूँजीवाद खराब समझते हैं, ऐसा कहना नीयत खोटी दिखती है। पदार्थोंके मिलनेसे सुख होवे तो आपको बहुत बड़ा भारी सुख मिलना चाहिये और बड़ा भारी दु:ख मेरेको होना चाहिये; क्योंकि पदार्थोंका अभाव है। बहुत-सी चीजें नहीं हैं मेरे पास।

सर्वत्र परमात्मसुख

भाई! पदार्थोंके अभावसे जो सुख होता है वह सुख परमात्माका है। भोगनेसे जो सुख होता है वह परमात्माका है। परमात्माके बिना सुख है ही नहीं। संसारसे विमुख होनेसे ही सुख होता है। संसारसे संसारका सुख नहीं होता, पर थोड़ी-सी बारीक बात है। किसी भोगको भोगो। उससे अलग होओगे तब सुख होगा। अलग होते ही सुख होता है। भोजनका सुख भी कब होगा? भोजनकी भूख जोरदार लगी है उसके मिलनेसे सुख होता है तो एक-एक ग्रास लेनेसे भूख मिटती जाती है और सुख चला जाता है। सुख तो अभावके अनुभवमें हुआ। उसे भोजनमें सुख कहाँ है? भोजन कर लिया, अब तृप्ति हो गयी। अब नहीं चाहिये बस। अब दु:ख मिट गया। दु:ख मिट नहीं गया है। खा नहीं सकते। थक गये हो। खानेकी ताकत मिट गयी आपकी। किसी भोगको भोगते-भोगते थक गये, उस थकावटको कहते हो सुख मिल गया।

‘आयो चौरासी भुगत कर, फिर जावण ने त्यार’॥

संसारके भोगसे थकावट होती है उसको आप सुख कहते हो। भोगनेकी शक्ति नष्ट हो गयी अब सुखी हो गये साहब! फिर शक्ति आ गयी। फिर दु:खी हो गये। जब सुखी हो गये फिर दुबारा क्यों जाओ वहाँ। परमात्मामें सच्चे हृदयसे लगनेवाले फिर लौटकर नहीं जाते। भर्तृहरि फिर नहीं गये। जिस दिन वैराग्य हुआ और लग गये तो फिर लग ही गये। भर्तृहरिकी दो तरहसे मैंने कथा सुनी है। एक तो अमर फल ‘स्त्रीको दिया’ और एक दूसरी कथा और सुनी है। कहाँतक सच्ची है भगवान् जानें। सुनी हुई जरूर है।

राजा भर्तृहरिकी कथा

राजाकी अपनी रानीमें बहुत आसक्ति थी। बहुत ही ज्यादा पड़े रहते रनिवासमें। इतनी ज्यादा आसक्ति थी। वह मर गयी। उसके मरनेपर बड़ा भारी दु:ख हुआ। उसको जलानेके लिये गये तो मैं तो आप साथ ही जलूँगा। सती होती है ऐसे मैं ‘सता’ होऊँगा। ऐसी स्त्री मर गयी, मैं साथमें मरूँगा। बड़े-बड़े एहलकार, मन्त्री आदि समझाते हैं। नहीं साहब! ऐसी स्त्री चली गयी। मैं उसके बिना जी नहीं सकता। साथ ही होम कर दूँगा अपनेको। इतनेमें गोरखनाथजी आ गये। लोगोंने कहा सन्त आ रहे हैं। तो कहा—थोड़ा ठहरो बाबा, वे हाँडी हाथमें लिये आ रहे थे। थोड़े पासमें आये कि हाँडी हाथसे छूट गयी, हाँडी फूट गयी और अब लगे रोने जोर-जोरसे। हाय मेरी हाँडी, हाय मेरी हाँडी, रोएँ जोर-जोरसे। राजाने पूछा क्या बात है? तो कहा—एक साधु दु:खी हो रहा है। तो भर्तृहरिने कहा—ठहरो भाई। अभी तो मैं जीता हूँ। मेरे राज्यमें साधु, गौ, ब्राह्मण दु:खी हों, यह मैं नहीं सह सकता। मैं जाऊँगा। जाकरके पूछा बाबाजी! क्या हुआ? वे लगे जोर-जोरसे रोने। हाय, हँडिया! हाय, हँडिया! बाबाजी क्या हो गया? क्या-क्या हो गया? दीखता नहीं, अन्धा है तूँ? मेरी हाँडी फूट गयी। ऐसी क्या हाँडी थी। तुम क्या हाँडी समझते हो? कैसी क्या थी? तुम्हारेको होश नहीं। तुम समझते नहीं। हमारे तो सर्वस्व हाँडी ही थी। वह आज फूट गयी बस। अब क्या करूँ? और रोएँ जोर-जोरसे।

क्या हुआ महाराज? देखो। हमारे रसोईघर भी यही था, पहिडा पानीका भी यही था। इसमें ही रोटी खाता था। इसमें ही पानी भर लेता था। इसीसे शौच जाया करता। इसीसे स्नान कर लेता था। अब स्नानघर गया, हमारा रसोईघर गया, हमारा जलपात्र गया, हमारा भोजनपात्र गया। कितना नुकसान हो गया। बहुत बड़ा नुकसान हो गया। हाँडी फूट गयी। वर्षा आती तो कपड़ा इसमें रख देता, उलटी कर देता। सब सूखा-का-सूखा रह जाता। वर्षा बन्द होते ही पहन लेता। हमारा घर-का-घर नष्ट हो गया। अब बताओ, काहेमें रहूँगा मैं। कोई पुस्तक है, कपड़ा है भींग जायगा। इसीको सिरहाना देकर सो जाता खूब मौजसे। अब वह सिरहाना कहाँसे लाऊँ? ऐसे कहने लगे। मेरा तो सब कुछ चला गया। घर-बार-मकान, ओढ़ना, बिछौना, सब-का-सब खत्म हो गया, सर्वस्व नष्ट हो गया।

राजाने कहा—आप रोते क्यों हैं? हाँडी दूसरी मिल जायगी। दूसरी नहीं, मेरी बढ़िया हाँडी फूट गयी। उमरभरकी साथी बढ़िया हाँडी फूट गयी। महाराज! दूजी हाँडी मिल जायगी, यों रोते क्यों हो? तो तू रानीके लिये रोता है। क्या और सब रानियाँ बाँझ हो गयीं? अब दूसरी मिलेगी नहीं क्या? मैं तो रोनेसे काम चलाता हूँ। तूँ तो जलनेको तैयार है। मेरी हाँडी फूट गयी ऐसे ही तेरी एक हाँडी फूट गयी। तो फिर रोवे क्यों बता? तेरे मकान तैयार, तेरे कपड़ा तैयार, तेरे रसोईघर तैयार, तेरे स्नानघर तैयार, तेरे सब चीज तैयार है। मेरा तो सर्वस्व नष्ट हो गया। तेरे तो एक लुगाई मर गयी। मेरेको समझाता है। राजाको अकल आ गयी कि बात तो ठीक है।

अब राजाने कहा—‘अब नहीं रोएँगे बस, अब न सता होवेंगे। तुमलोग जाओ, तुम्हारा राज्य करो! अब महाराज। मैं तो आपके साथ रहूँगा। चलो, अपने यहाँ बड़ा दरबार है; क्योंकि माँगेंगे और खायेंगे। कौन-सा बड़ा खर्चा लगता है। बिलकुल आजादी है ठीक तरहसे। रोटी मिलती है, कपड़ा मिलता है, सब मिलता है। राजा फिर साधु हो गये और चल दिये।

भर्तृहरि कहते हैं—रात्रिको आग सुलगती है। घासपर रहनेवाले जन्तु स्वाहा हो जाते हैं, पता नहीं है उन्हें कि हम जल जायँगे, मर जायँगे। इस वास्ते वे आगमें पड़ जाते हैं। मछलीको पकड़ते हैं तो काँटेमें मांसका टुकड़ा डालकर पकड़ लेते हैं। वह काँटेको निगल जाती है। काँटा अड़ जाता है तो वह मर जाती है। मछलीको ज्ञान नहीं है कि इसको खानेसे मर जाऊँगी। ये कीट-पतंग, मछली, जानवर बेचारे अनजानेपनसे मर जाते हैं। आप जो जितने सुख भोगते हो, उसमें कितना दु:ख होता है, कितना सन्ताप होता है, कितनी जलन होती है, कितनोंसे छिपाव करना पड़ता है, कितना झूठ, कपट, बेईमानी करनी पड़ती है और कितनी-कितनी आफत भोगनी पड़ती है? जगह-जगह मामूली आदमी, जिनसे बात नहीं करनी पड़े, ऐसे आदमियोंकी गुलामी करनी पड़ती है आपको रुपयोंके लिये। जिनका मुंडा देखनेसे पाप लगे, ऐसे आदमियोंकी गुलामी करनी पड़ती है। बोलो, गुलामी करनी पड़ती है कि नहीं रुपया कमानेमें?

ऐसे दु:खोंको देखते हुए भी हमलोग जानकार हैं अच्छी तरहसे। अहो! मोहकी बड़ी भारी महिमा है जो मूढ़ताके बीच इतने फँसे हुए हैं कि कभी होश नहीं आता है। दु:खोंके महान् घर। ‘दु:खालयमशाश्वतम्’—संसारको दु:खालय कहा है। औषधालय, पुस्तकालय, वस्त्रालय होता है ऐसे दु:खालय है। वह मोहके कारणसे छूटती नहीं। दु:ख पा रहे हैं फिर जा रहे हैं। मिर्ची खाते हैं, आँखमें, नाकमें पानी पड़ता है, सिसकारे करते हैं फिर भी खा लेते हैं। अब क्या वहम रह गया बाकी? अब छुड़ाओ कोई मिर्ची खानेवालेको। छोड़ नहीं सकता, पसीना आ जाता है शरीरका। अब बोलो कैसे समझावें? ‘विजानन्तोऽप्येते विपज्जालजटिलान्’ भोगमें महान् विपत्ति-ही-विपत्ति भरी हुई है। ऐसेको भी छोड़ते नहीं।

सुख केवल भगवान‍्की ओर

गधेकी दशा है भाई! लगे दुलत्ती, फिर भी उधर ही चले। तिरस्कार, अपमान, दु:ख-संताप तरह-तरहसे सहते हो। फिर भी थोड़ा लोभ, कुछ-कुछ मिल जायगा। मिल जायगा माजना। क्या मिल जायगा? आनन्द-ही-आनन्द भगवान‍्की तरफ चलो तो। गृहस्थमें बैठे हुए भी आप भगवान‍्की सेवा करो, कुटुम्ब भगवान‍्का है, सब भगवान‍्के हैं। ऐसे सेवा करो तो निहाल हो जाओगे। वही कुटुम्ब वही आप। वही घर आपका। केवल भाव बदल दो कि भगवान‍्का घर है। वे भगवान‍्के जन हैं। भगवान‍्की आज्ञासे सेवा करनी है। कोई मर गया तो मर गया। सेवा करनी है उसकी। घरमें बैठे मौज हो जायगी। मौज कब होगी? जब आपके हृदयकी गुलामी मिट जायगी, लालसा मिट जायगी। हृदयमें गुलामी रहे, भोगोंकी, पदार्थोंकी, रुपयोंकी तो कभी सुख नहीं मिलेगा। साधु बाबा बन जाओ भले ही। वहीं बैठे-बैठे रोओगे कि रुपया नहीं मिला, आदर नहीं मिला। यह जबतक गुलामी रहेगी तो साधु हो, चाहे गृहस्थ हो, पढ़ा-लिखा हो, चाहे अपढ़ हो। कोई फर्क नहीं है। जब हृदयसे निकल जाय यह तृष्णा फिर मौज ही है। आनन्द-ही-आनन्द है। इसके त्यागनेमें आप स्वतन्त्र हो, परतन्त्र नहीं हो। संग्रहमें तो परतन्त्र हो पर हृदयसे मोह छोड़नेमें आप पराधीन नहीं हो। आप अपात्र नहीं हो। आप अयोग्य नहीं हो। आप साक्षात् परमात्माके अंश हो। नित्य-निरन्तर रहनेवाले आपने नित्य-निरन्तर वियुक्त होनेवालेकी गुलामी स्वीकार की। बताओ, इसमें झूठ है क्या? नित्य-निरन्तर वियोग हो रहा है आपके साथ शरीरका, पदार्थोंका, कुटुम्बियोंका, घरका, आप नित्य-निरन्तर रहनेवाले हो। आप नष्ट नहीं होनेवाले। ऐसे नष्ट नहीं होनेवाले। उनके गुलाम बन गये। शर्म नहीं आती। अक्ल नहीं आती क्या? कुछ सोचते नहीं।

नित्य आप रहनेवाले अनित्यके गुलाम हो गये। अनित्य वस्तुओंका उपयोग करो। धन कमाओ, अच्छे काममें लगाओ। उत्साहसे, प्रसन्नतासे पर मोह मत करो। रुपयोंको भी सँभाल कर रखो। हिसाब करो पैसे-पैसेका, पाई-पाईका। पर हृदयमें महत्त्व नहीं देंगे। सब-का-सब चला जाय तो मौज, सब रह जाय तो मौज। कुटुम्बी रहे तो मौज। सब-के-सब चले जायँ तो मौज। अपनी मौज उनके अधीन नहीं है। ऐसी मौज आपको मिल जायगी। थोड़ा-सा त्याग करो भीतरसे। बाहरसे भले ही गृहस्थ बने रहो, जहाँ हो वहीं बने रहो। भीतरसे बेपरवाह करो। देखो, आनन्द मिलता है कि नहीं। संसार आपकी गरज करेगा। आप गरज करोगे तो संसार ठुकरायेगा, तिरस्कार करेगा, अपमान करेगा। आपके हृदयसे वैराग्य हो फिर आपका कोई तिरस्कार नहीं कर सकता। अपमान कोई नहीं कर सकता। आप ही अपमान करवाते हो बुलावा देकर। क्यों अपनी बेइज्जती करवाओ भगवान‍्के अंश होकर। इस वास्ते सुख तो केवल परमात्मामें है।

ना सुख काजी पंडिताँ, ना सुख भूप भयाँ।

सुख सहजाँ ही आवसी, तृष्णा रोग गयाँ॥

न सुखं देवराजस्य न सुखं चक्रवर्तिन:।

यत्सुखं वीतरागस्य मुनेरेकान्तशालिन:॥

देवराज इन्द्रको वह सुख नहीं। चक्रवर्तीको वह सुख नहीं। धनी आदमीको वह सुख नहीं है जो सुख राग मिट जाय, भीतरसे गुलामी मिट जाय। संग्रह और भोग ये दो मिट जायँ। भोग भोगनेकी और संख्या बढ़ानेकी धुनमें लगे हैं। धन बढ़ा लें। धन इकट्ठा कर लें। धनी हो जायँ। यह भावना मिट जाय। इकट्ठा रखो। धन आप लाखों रुपया रखो पर गुलामी मत रखो। भैया, गुलामी मत रखो। मालिक बनकर रहो धनके। मालिक बननेका अर्थ क्या है? सब-का-सब धन चला जाय तो हमारे क्या चला गया। गुलामी होगी तो लाखों रुपये जमा हैं और एक लाख खर्च हो जाय तो मनमें खनखनाहट होती है कि मूलधन खर्च हो गया। मूलधनका क्या करोगे? मूलधन खर्च नहीं होना चाहिये। अरे छोरा! अक्ल नहीं है मूलधन खर्च करते हो। मूल किस वास्ते है साहब! खर्च तो कर नहीं सकते। जैसे कोई कर्जा सिरपर आ जाय उसका दु:ख होता है। ऐसे मूलधन खर्च होनेका दु:ख होता है। मूलधन खर्च नहीं करना। कमाओ-खाओ, पर पूँजी बढ़ाओ कुछ तो। वर्षमें पाँच, दस, हजार पूँजी पैदा होनी ही चाहिये।

यह दशा रहेगी नहीं। इसमें शर्म आनी चाहिये। आ जाय तो लाखों, करोड़ों आ जाय और चला जाय तो चला जाय। कहते तो यह हैं कि ‘रुपयो तो हाथ रो मैल है।’ पर मैल है कि कालजे री कोर है। अब आ गया तो क्या? चला गया तो क्या? नफा हो गया तो क्या? नुकसान हो गया तो क्या? अपने काम करो। नफा-नुकसानको समझो, व्यापारमें उद्योग करो, नौकरी करो, जो कुछ करो आप उत्साहपूर्वक करो। पर गुलामी क्यों रखो? बहुत आनन्द होगा। बड़ी मस्ती होगी, बड़ा सुख होगा।

रुपयोंकी गुलामीके कारणसे मनुष्योंका तिरस्कार हो रहा है। मैंने कहा—भाई! रुपये तो काम आते हैं वस्तुओंके द्वारा। स्वयं काम नहीं आते। अन्न, जल, वस्त्र, मकान स्वयं काम आते हैं। रुपये स्वयं काम नहीं आते। रुपयोंसे बढ़कर वस्तुएँ हैं, वस्तुओंसे बढ़कर व्यक्ति। आज दहेजप्रथा इतनी बढ़ गयी कि रुपया दो तो कन्याका सम्बन्ध हो। कन्याका तो तिरस्कार और रुपयोंका सत्कार? रुपयोंको तो बड़ा समझते हैं। कन्या बैठी है घरपर, उसको लेते नहीं हैं। रुपया लेंगे।

यहाँतक मैंने सुना है, अखबारमें भी आया है—दहेज कम आया इस कारण उस छोरीको मार दिया। यह मर जाय तो दूसरा ब्याह करेंगे जिससे दहेज अधिक आयेगा। कितनी रुपयोंकी गुलामी हो गयी। तिरस्कार करते हैं उस बहूका जिसके दहेज कम आया है। देवराणी, जेठानी, सास, ननद सब उसे तंग करते हैं। तुम्हारे बापने दिया क्या? घर-का-घर बिक जाय तो भले ही बिक जाय, पर हमें तो रुपया दो। इतनी गुलामी तुम्हारे भीतर, इस प्रथाको शुद्ध करो भाई! कन्या देखो, जिससे सदा उमरभर काम है। रुपया तो आते-जाते रहते हैं। रुपयाके लिये इतना तिरस्कार। इतना अपमान नारी-जातिका। बातोंमें कह दिया कि नारी-जातिका तिरस्कार नहीं होना चाहिये, आदर होना चाहिये। विधवा ब्याह करो साहब! अब कुँवारीको तो वर मिला ही नहीं, विधवा वर रोक लेगी तो क्या दशा होगी।

अरे भाई! अक्लसे काम लो। यों समाजका सुधार होता है क्या? शूरवीरतासे कहना चाहिये कि कुंकुम कन्या हमें तो लेना है क्योंकि लड़का है हमारे। ब्याह करना है, इस वास्ते कन्यादान लेना है। दान भैया! रुपया-पैसाका दान भी खराब जिसमें कन्याका दान बड़ा पाप है परंतु करें क्या? लड़का ब्याहना है इसलिये कन्यादान लेना पड़ता है। हमारेको कन्या भगवान् देंगे तो हम भी कन्यादान करेंगे। ऐसे करो तो समाज कुछ ठीक हो, पर रुपयोंकी गुलामीसे ऐसा नहीं होगा।

मनुष्य हो, भगवान‍्के अंश हो। रुपया आने-जानेवाली चीज है। कृपा करो।

भगवन्नाम लेते जाओ। असली धन है।

कबिरा सब जग निरधना धनवन्ता नहीं कोय।

धनवन्ता सोई जाणिये जाके रामनाम धन होय॥

(दिनांक १७ अगस्त, १९८२)